सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २२१
एक घर दोइ घर तीन घर चार घर,
पंच घर तजै तब छठी घर पाइ है ।
एक एक घर कै आधार एक एक घर,
एक घर निराधार आपु ही दिखाइ है ॥
सो तौ घर साक्षीरूप घर घर मैं अनूप,
ताहू घर मधि कोऊ दिन ठहराइ है ।
ताकै परै साक्षी न असाक्षी न सुन्दर कछु,
बचन अतीत कछू आइ है न जाइ है ॥२८॥
एक तौ श्रवन ज्ञान पावक ज्यौ देखियत,
माया जल वरसत वेगि बूझि जातु हे ।
एक है मनन ज्ञान बिजुरि ज्यीं घन मधि,
माया जल वरसत तामैं न बुझातु है ।
एक निदिध्यास ज्ञान बडवा अनल सम,
प्रगट समुद्र माहि माया जल खातु है ।
आत्मा अनुभव ज्ञान प्रलय अगनि जैसे,
सुन्दर कहत द्वैत प्रपंच बिलातु है ॥२६॥
(२८) घर-शरीर आदि का घेरा, पञ्च कोष ।
(२६) पावक-अग्नि, आग । बिजुरि-बिजली । घन-
बादल । वडवा अनल-समुद्र की अग्नि । प्रपंच-विस्तार ।