सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२५
अथ ज्ञानी को अंग ॥२७॥
इन्दव छंद
जाकै हृदै महिं ज्ञान प्रकासत
ताकौ सुभाव रहै नहिं छानौ ।
नैन मैं बैन मैं सैन मै जानिये,
ऊठत बैठत है अलसानौ ।
ज्यौ कछु भक्ष किये उदगारत,
कैसैं हुं राखि सकै न अघानौ ।
सुन्दरदास प्रसिद्धि दिखावत,
धान कौ खेत पयार तैं जानौ ।:१॥
ज्ञान प्रकाश भयौ जिनकै उर,
वे घट क्यूं हि छिपे न रहैगे ।
भोड्ल मांहि दुरै नहि दीपक,
यद्यपि वे मुख मौन गहेगे ।
ज्यूं घनसार हि गोप छिपावत,
तौहि सुगंधि सु तज्ञ लहैगे ।
सुन्दर और कहा कोऊ जानत,
बूंठे को बात बटाऊ कहैगे ॥२ ।
(१) पयार-प्याल, चावल का डठल ।
(२) घनसार-कपूर । तज्ञ-तत्वज्ञ, समझने वाले ।
दुरै-छिपता है । बूंठेकी-यात्री की ।