सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
१४४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
और देवी देव हू उपासना अनेक भांति,
शक सब दूरि करि तिनतै न डरि हैं ॥
सब ही के सीस पर पाव दे मुकति होइ,
सुन्दर कहत सो तौ जनमै न मरि हैं ।
मन बच काय करि अंतरि न राखै कछु,
सतनि की सेवा करै सोई निसतरि है ॥३०॥
॥ इति साधु को अंग सम्पूर्ण ॥
(३०) मुकति-मुक्त । अन्तर-भेद, फर्क ।
॥ भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ॥ [ १४५
अथ भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग
॥२१॥
बैठत राम हि ऊठत राम हि,
बोलत राम हि राम कह्यौ है ।
जीमत राम हि पीवत राम हि,
घीमत राम हि राम गह्यौ है ॥
जागत राम हि सोवत राम हि,
जोवत राम हि राम लह्यौ है ।
देतहु राम हि लेतहु राम हि,
सुन्दर राम हि राम कह्यो है ॥१॥
श्रोत्रहु राम हि नेत्रहु राम हि,
वक्त्र हु राम हि राम हि गाजै ।
शीशहु राम हि हाथहु राम हि,
पांव हु राम हि राम हि साजै ॥
पेटं हु राम हि पीठ हु राम हि,
रोम हु राम हि राम हि वाजै ।
अन्तरि राम निरतर राम हि,
सुन्दर राम हि राम विराजै ॥२॥
(१-२) घीमत-ध्यान करते हुए । वक्त्र-मुख ।
१४६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
भूमिहु राम ही आपहु रामै हि,
तेज हु राम हि वायु हु रामै ।
व्योमहु राम हि चदहु राम हि,
सूरहु राम हि शीत न घामै ॥
आदिहु रामहि अतहु राम हि,
मध्य हु राम हि पु स न बामै ॥
आजहु रामहि कालहु राम हि,
सुन्दर रामहि म्हा महि थामै ॥३॥
देख हु राम अदेख हु राम हि,
लेख हु राम अलेख हु रामै ।
एक हु राम अनेक हु राम हि,
शेषहु राम अशेष हु तामै ॥
मौन हू राम अमौनहु राम हि,
गौनहु राम हि भौनहु ठामै ।
बाहिर राम हि भीतर राम हि,
सुन्दर रामहि है जग जामै ॥४॥
(३) पुस-पुरुष। वामै-स्त्री। म्हामहि-हम सब मे।
थामैं-तुम सब मे।
॥ भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ॥ [ १४७
दूरि हु राम नजीक हु राम हि,
देश हु राम प्रदेश हु रामै ।
पूरब राम हि पच्छिम राम हि,
दक्षिण राम हि उत्तर धामै ॥
आगैहु राम हि पीछैहु राम हि,
व्यापक राम हि है वन ग्रामै ।
सुन्दर राम दसौं दिसि पूरन,
सुरगहु राम पतालहु तामै ॥५॥
आप हु राम उपावत राम हि,
भंजन राम सवारन रामै ।
दृष्टि हु राम अदृष्टि हु राम हि,
इष्ट हु राम करै सब कामै ॥
वर्ण हु राम अवर्ण हु राम हि,
रक्त न पीत न श्वेत न श्यामै ।
सुनिहु राम अमुनि हु राम हि,
सुन्दर राम हि नाम अनामै ॥६॥
॥ इति भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ॥
(५) सुरग-स्वर्ग । (६) उपावत-उत्पन्न करने वाले ।
भंजन-मिटाने वाले । सवारन-सुधारने वाले, रक्षा करने
वाले ।
१४८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ विपर्यय शब्द को अंग ॥२२॥
सवैया छंद
श्रवनहु देखि सुनै पुनि नैनहुं,
जिव्हा सूंधि नासिका बोल ।
गुदा खाइ इन्द्रिय जल पीवै,
बिनही हाथ सुमेर हि तोल ॥
ऊंचे पाइ मूड नीचे कौ,
बिचरत तीनि लोक मैं डोल ।
सुन्दरदास कहै सुनि ज्ञानी,
भलीभाति या अर्थ हि खोल ॥१॥
अंधा तीनि लक कौ देखै,
बहिरा सुनै बहुत बिधि नाद ।
नकटा बास कमल की लेवै,
गूंगा करै बहुत सबाद ॥
टूटा पकरि उठावै पर्वत,
पगुल करै नृत्य अहलाद ।
जो कोऊ याकौ अर्थ बिचारै,
सुन्दर सोई पावै स्वाद ॥२॥
कुंजर कौ कीरी गिलि बैठी,
सिंघ हि खाइ अघानौ श्याल ।
इस पृष्ठ/छवि पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है (यह पूरी तरह रिक्त/सफेद है)।
१५० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
देव माहि तैं देवल प्रगट्यौ,
देवल मैं तैं प्रगट्यौ देव ।
सिष गुरु ही उपदेशन लागौ,
राजा करै रंक की सेब ॥
बंध्या पुत्र पंगु एक जायौ,
ताकौ घर खोवन की टेव ।
सुन्दर कहै सु पण्डित ज्ञाता,
जो कोऊ याकौ जानै भेव ॥१६॥
कमल मांहि तैं पानी उपज्यौ,
पानी मंहि तै उपज्यौ सूर ।
सूर मांहि शीतलता उपजी,
शीतलता में सुख भरपूर ॥
ता सुख को क्षय होइ न कबहू,
सदा एकरस निकट न दूर ।
सुन्दर कहै सत्य यह यौ ही,
यामैँ रती न जानहु कूर ॥१७॥
हंस चढ्यौ ब्रह्मा के ऊपर,
गरुड चढ्यौ पुनि हरि की पीठि ।
बैल चढ्यौ है शिव के ऊपर,
सो हम देख्यौ अपनी दीठि ॥
देव चढ्यौ पाती के ऊपर,
जरख चढ्यौ डाषनि परि नीठि ।
इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य/टेक्स्ट मौजूद नहीं है (पृष्ठ पूरी तरह से रिक्त/सफेद है)।
१५२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
पुरुष एक पांनी महि प्रगट्यौ,
ता निगुरा की कैसी जाति ।
सुन्दर सोई लहै अर्थ को,
जो नित करै पराई ताति ॥११॥
उनयौ मेघ घटा चहु दिस तें,
बर्षन लग्यौ अखंडित धार ।
बूड्यौ मेर नदी सब सूकी,
झर लाग्यौ निस दिन इकसार ॥
कांसा पर्यौ बीजली ऊपरि,
कीयौ सब कुटुम्ब संहार ।
सुन्दर अर्थ अनूपम याकौ,
पण्डित होइ सु करै बिचार ॥१२॥
बाडी मा हैं माली निपज्यौ,
हाली मा हैं निपज्यौ खेत ।
हंस हि उलटि श्याम रंग लागौ,
भ्रमर उलटि करि हूवो सेत ॥
ससिहर उलटि राहु की ग्रास्यौ,
सूर उलटि करि ग्रास्यौ केत ।
सुन्दर सगुरा कौं तजि भाग्यौ,
निगुग सेती बाध्यौ हेत ॥१३॥
॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५३
अगिन मथन करि लकरी काढी,
सो वह लकरी प्रान अधार ।
पांनी मथि करि घीव निकाल्यौ,
सो घृत खाइये बारम्बार ॥
दूध दही की इच्छा भागी,
जाकौ मथत सकल संसार ।
सुन्दर अब तौ भये सुखारे,
चिंता रही न एक लगार ॥१४॥
पात्र मांहि झोली गहि राखै,
योगी भिक्षा मागन जाइ ।
जागे जगत सोवई गोरख,
ऐसा शब्द सुनावै आड ॥
भिक्षा फुरै बहुत करि ताकौ,
सो वह भिक्षा चेलहि खाइ ।
सुन्दर जोगी जुग जुग जीवै,
ता अवधू की दूरि बलाइ ॥१५॥
निर्दय होइ तिरै पशु घातक,
दयावंत बहै भव मांहि ।
लोभी लगै सर्वानि कौ प्यारो,
निर्लोभी कौ ठाहर नांहि ॥
मिथ्यावादी मिले ब्रह्म कौ,
सत्य रटै सो जमपुर जाहि ।
१५४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुन्दर धूप माहिं शीतलता,
जलत रहै जे बैठे छाहि ॥१६॥
माइ बाप तजि धी उमदानी,
हरषत चली खसम के पास ।
बहू विचारी बड बखतावरि,
जाके कहे चलत है सास ॥
भाई खरौ भलौ हितकारी,
सबै कुटुम्ब कौ कोयो नास ।
ऐसी बिधि घर बस्यौ हमारौ,
कहि समुझावै सुन्दरदास ॥१७॥
परधन हरै करै पर निंदा,
पर धी कौ राखै घर माहि ।
मास खाइ मदिरा पुनि पीवै,
ताहि मुक्ति कौ संशय नाहिं ॥
अकर्म ग्रहै कर्म सब त्यागै,
ताकी संगति पाप नसाहिं ।
ऐसी करै सु सत कहावै,
सुन्दर और उपजि मरि जाहिं ॥१८॥
बढई चरखा भलौ सवार्यौ,
फिरनै लाग्यौ नीकी भाति ।
बहू सास कौ कहि समुझावै,
पूनी घटै दिवस नहिं राति ।
॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५५
सुन्दर विधि मीं वुनै जुलाहा,
खासा निपजैं ऊंची जाति ॥१६॥
घर घर फिरै कुमारी कन्या,
जनै जनै मां करती सग ।
वेश्या सूं तौ भई पतिवरता,
एक पुरुष के लागी अंग ॥
कलिजुग मा हं सतजुग थाप्या,
पापी उदो धर्म की भंग ।
सुन्दर कहै सु अर्थ हि पावै,
जो नीके करि तजै अनंग ॥२८॥
विप्र रसोई करने लाग्यौ,
चौका भीतरि बैठो आउ ।
लकरी मा हं चूल्हा दीनो,
रोटी ऊपर तवा चढ़ाउ ।
खिचरी माहे हुंडिया राधी,
सालन आक धतूर गाउ ।
सुन्दर जीमत अति सुख पायौ,
सबहौ भोजन दियो पचार ॥२१॥
बेंस उड़टि नाहर कौं गाह्यौ,
दन्त मारि भरि गोति पसार ।
भली भांति सौं सीदा कीनो,
फाडू सिवार का हनार ॥
१५६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
नाइकनी पुनि हरषत डोलै,
मोहि मिल्यौ नीकौ भरतार ।
पूंजी जाइ साह कौं सौपो,
सुन्दर सिरतै उत्र्या भार ॥२२॥
बनिक एक बनजी कौं आयौ,
परै तावरा भारी भैंठि ।
भली बस्तु कछु लीनी दीनी,
खैचि गठरिया बांधी ऐठि ॥
सौदा कियौ चल्यौ पुनि घर कौ,
लेखा कियौ बरीतर बैठि ।
सुन्दर साह खुसी अति हूवा,
बैल गया पूंजी मैं पैठि ॥२३॥
पहरायत घर मुस्यौ शाह कौ,
रक्षा करनै लाग्यौ चोर ।
कोतवाल काठौ करि बाध्यौ,
छूटै नही साझ अरु भोर ॥
राजा गाव छोडि करि भागौ,
हूवो सकल जगत मैं शोर ।
परजा सुखी भई नगरी मैं,
सुन्दर कोई जुलम न जोर ॥२४॥
॥ विपर्यय यशब्द को अङ्ग ॥ [ १५७
राजा फिरै विपति कौ मार्यौ,
घर घर टुकरा मागै भीख ।
पाव पियादौ निसि दिन डोलै,
घोरा चाल सकै नहि वीख ॥
आक अरण्ड की लकरी चूपै,
छाडै बहुत रस हि भरे ईख ।
सुन्दर कोउ जगत मैं विरलौ,
या मूरख कौ लावै सीख ॥२५॥
पानी जरै पुकारै निसि दिन,
ताकौं अग्नि बुझावै आइ ।
हूं शीतल तूं तप्त भयौ क्यों,
बारवार कहै समझाइ ॥
मेरी लपट तोहि जो लागै,
तौ तूं भी शीतल ह्वै जाइ ।
कबहूं जरनि फेरि नहि उपजै,
सुन्दर सुख मैं रहै समाइ ॥२६॥
खसम पर्यो जोरु के पीछे,
कह्यौ न मानै भौंही रांट ।
जित नित फिरै भटङ्गी वोही,
मैं तौ त्रिये रकत के भांइ ॥
हौं हू भूख न भागी मेरी,
तूं निसि रोटी मागै काइ ।
१५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुन्दर कहै सीख सुनि मेरी,
अब तूं घर घर फिरबौ छाड ॥२७॥
पंथो माँहि पथ चलि आयौ,
सो वह पथ लख्यौ नहि जाइ ।
वाही पंथ चल्यौ उठि पंथी,
निर्भय देश पहूच्यौ आइ ।
तहा दुकाल परै नहिं कबहूं,
सदा सुभिक्ष रह्यौ ठहराइ ।
सुन्दर दुखी न कोऊ दीसै,
अक्षय सुख मैं रहै समाइ ॥२८॥
एक अहेरी बन मै आयौ,
खेलन लागौ भली शिकार ।
कर मैं धनुष कमर मै तरकस,
सावज घेरे बारवार ॥
मार्यौ सिंघ व्याघ्र पुनि मार्यौ,
मारी बहुरि मृगनि की डार ।
ऐसै सकल मारि घर ल्यायौ,
सुन्दर राज हे कियौ जुहार ॥२६॥
॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५६
सुक के वचन अमृतमय ऐसे,
कोकिल धार रहे मन माहिं ।
सारी सुनै भागवत कबहौ,
सारस तीऊ पावै नाहि ॥
हंस चुगै मुक्ताफल अर्थहिं,
सुन्दर मानसरोवर न्हाहि ।
काक कवीश्वर विपई जेते,
ते सब दौरि करक हि जाहि ॥३०॥
नष्ट होहिं द्विज भ्रष्ट क्रिया करि,
कष्ट किये नहि पावै ठौर ।
महिमा सकल गई तिनि केरी,
रहत पगन तर सब सिरमौर ॥
जित तित फिरहि नही कछु आदर,
तिनको कोउन घालै कौर ।
सुन्दरदास कहै समुझावै,
ऐसी कोउ करौ मति घोर ॥३१॥
सास्त्र वेद पुरान पढै किनि,
पूनि व्याकरन पढै जे जोर ।
नाना तर्क सु पढ लखै त्रि,
सूत्र पद जानि विचारै नोर ॥
१६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
रासि काम तबही बनि आवै,
मन मैं सब तजि राखै दोइ ।
सुन्दरदास कहै सुनि पण्डित,
राम नाम बिन मुक्त न होइ ॥३२॥
॥ इति विपर्य शब्द को अग सम्पूर्ण ॥
॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६१
अथ आपने भाव को अंग ॥२३॥
इन्द्रव छंद
एकही आपुनो भाव जहां तहां,
बुद्धि के योग तैं विभ्रम भासै।
जो यह क्रूर तो क्रूर उहा पुनि,
यांकै मानै तैं उहा पुनि त्रासै ॥
जो यह साधु तो साधु उहा पुनि,
याके हासै तैं उहा पुनि हासै।
जैसो ई आपु करै मुख सुन्दर,
तैसो ई दर्पन मांहि प्रकासै ॥१॥
मनहर छंद
जैसे स्वान कांच के सदन मधि देखि धौन,
भोंकि भोंकि मरत करत अभिमान जु ।
जैसे गज पंडित फिना नी भाँति नींवै दंत,
ऐसे रिपु कूप मांहि झंपिक भुजान जु ॥
जैसे कोउ फेरी हाथ फिरत देखै जगत,
तैसे ही गूनर मत जैसो ई पहिचान जु ।
आप ही तैं आपन को दूसरो परापर होत,
भूलि तौ विचारै कोइ परखो न आन जु ॥२॥
सांझ समय सो भावता, सभी मुख विचार
कफ १ ।
१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
नीच ऊंच बुरौ भलौ सुजन दुर्जन पुनि, -
पंडित मूरख शत्रु मित्र रक राव है।
मान अपमान पुन्य पाप सुख दुख दोऊ,
स्वरग नरक बध मोक्ष हू कौ चाव है॥
देवता असुर भूत प्रेत कीट कुंजर ऊ,
पशु अरु पंखी श्वान शूकर बिलाव है।
सुंदर कहत यह एकई अनेक रूप,
जोई कछु देखिये सु आपुनौ ई भाव है ॥३॥
याहीकै जागत काम याहीकें जागत क्रोध,
याही कै जागत लोभ याही मोह मातौ है।
याकौ याही बैरी होत याकौ याही मित्र होत,
याकौ याही सुख देत याही दुख दातौ है॥
याही ब्रह्मा याही रुद्र याही विष्णु देखियत,
याही देव दैत्य यक्ष सकल संघाती है।
याही कौ प्रभाव सु तौ याही कौं दिखाई देत,
सुंदर कहत याही आत्मा विख्यातौ है ॥४॥
याही कौ तौ भाव याकौ शक उपजावत है,
याही कौ तौ भाव याही निशक करतु है।
याही कौ तौ भाव याकौ भूत प्रेत होइ लागौ,
याही कौ तौ भाव याकी कुमति हरतु है॥
॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६३
याही कौ नौ भाव याकौ बापु कौ बघग करे,
याही कौ तौ भाव याही चित्त के धग्तु है।
याही कौ नौ भाव याही धार में बहाइ देत,
सुंदर याही कौ भाव याही नै तरतु है ॥७॥
आपु ही कौ भाव मू तौ आपु ही प्रगट होत,
आपु ही आरोप करि आपु मन नायौ है।
देवी अन्य देव कोऊ भाव कौ उपासे ताहि,
गर्त मैं तौ फन धन उनही ने पायौ है ॥
जैसे श्वान काच कौ बनाइ करि मागे गोद,
आपु ही कौ मुख फेरि आप चार नायौ है।
जैसे ही गदह चर आप ही भैंसान चढ़ि,
मापन पछान करि और कौ नवायौ है ॥६॥
दृष्टांत
तीर्थ नै तीरथ रूप नै रूपहि,
पाने नै पाये हैं पीत न पीतौ ।
हरि नै हरि ब्यापि नै व्यापेहि,
ध्याता नै ध्याया है ध्यौत न ध्यौतौ ॥
चर्चित चर्चित चीन्हि अतीत,
भीतर भीतर है कौ नहीं ।
भीतर ही अपनो रूप नै रूपह,
पावै तौ पावै जो दीठि सुदीठौ ॥७॥