सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५३
अगिन मथन करि लकरी काढी,
सो वह लकरी प्रान अधार ।
पांनी मथि करि घीव निकाल्यौ,
सो घृत खाइये बारम्बार ॥
दूध दही की इच्छा भागी,
जाकौ मथत सकल संसार ।
सुन्दर अब तौ भये सुखारे,
चिंता रही न एक लगार ॥१४॥
पात्र मांहि झोली गहि राखै,
योगी भिक्षा मागन जाइ ।
जागे जगत सोवई गोरख,
ऐसा शब्द सुनावै आड ॥
भिक्षा फुरै बहुत करि ताकौ,
सो वह भिक्षा चेलहि खाइ ।
सुन्दर जोगी जुग जुग जीवै,
ता अवधू की दूरि बलाइ ॥१५॥
निर्दय होइ तिरै पशु घातक,
दयावंत बहै भव मांहि ।
लोभी लगै सर्वानि कौ प्यारो,
निर्लोभी कौ ठाहर नांहि ॥
मिथ्यावादी मिले ब्रह्म कौ,
सत्य रटै सो जमपुर जाहि ।