सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५६
सुक के वचन अमृतमय ऐसे,
कोकिल धार रहे मन माहिं ।
सारी सुनै भागवत कबहौ,
सारस तीऊ पावै नाहि ॥
हंस चुगै मुक्ताफल अर्थहिं,
सुन्दर मानसरोवर न्हाहि ।
काक कवीश्वर विपई जेते,
ते सब दौरि करक हि जाहि ॥३०॥
नष्ट होहिं द्विज भ्रष्ट क्रिया करि,
कष्ट किये नहि पावै ठौर ।
महिमा सकल गई तिनि केरी,
रहत पगन तर सब सिरमौर ॥
जित तित फिरहि नही कछु आदर,
तिनको कोउन घालै कौर ।
सुन्दरदास कहै समुझावै,
ऐसी कोउ करौ मति घोर ॥३१॥
सास्त्र वेद पुरान पढै किनि,
पूनि व्याकरन पढै जे जोर ।
नाना तर्क सु पढ लखै त्रि,
सूत्र पद जानि विचारै नोर ॥