सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१४८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ विपर्यय शब्द को अंग ॥२२॥
सवैया छंद
श्रवनहु देखि सुनै पुनि नैनहुं,
जिव्हा सूंधि नासिका बोल ।
गुदा खाइ इन्द्रिय जल पीवै,
बिनही हाथ सुमेर हि तोल ॥
ऊंचे पाइ मूड नीचे कौ,
बिचरत तीनि लोक मैं डोल ।
सुन्दरदास कहै सुनि ज्ञानी,
भलीभाति या अर्थ हि खोल ॥१॥
अंधा तीनि लक कौ देखै,
बहिरा सुनै बहुत बिधि नाद ।
नकटा बास कमल की लेवै,
गूंगा करै बहुत सबाद ॥
टूटा पकरि उठावै पर्वत,
पगुल करै नृत्य अहलाद ।
जो कोऊ याकौ अर्थ बिचारै,
सुन्दर सोई पावै स्वाद ॥२॥
कुंजर कौ कीरी गिलि बैठी,
सिंघ हि खाइ अघानौ श्याल ।