सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५५
सुन्दर विधि मीं वुनै जुलाहा,
खासा निपजैं ऊंची जाति ॥१६॥
घर घर फिरै कुमारी कन्या,
जनै जनै मां करती सग ।
वेश्या सूं तौ भई पतिवरता,
एक पुरुष के लागी अंग ॥
कलिजुग मा हं सतजुग थाप्या,
पापी उदो धर्म की भंग ।
सुन्दर कहै सु अर्थ हि पावै,
जो नीके करि तजै अनंग ॥२८॥
विप्र रसोई करने लाग्यौ,
चौका भीतरि बैठो आउ ।
लकरी मा हं चूल्हा दीनो,
रोटी ऊपर तवा चढ़ाउ ।
खिचरी माहे हुंडिया राधी,
सालन आक धतूर गाउ ।
सुन्दर जीमत अति सुख पायौ,
सबहौ भोजन दियो पचार ॥२१॥
बेंस उड़टि नाहर कौं गाह्यौ,
दन्त मारि भरि गोति पसार ।
भली भांति सौं सीदा कीनो,
फाडू सिवार का हनार ॥