सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विपर्यय यशब्द को अङ्ग ॥ [ १५७
राजा फिरै विपति कौ मार्यौ,
घर घर टुकरा मागै भीख ।
पाव पियादौ निसि दिन डोलै,
घोरा चाल सकै नहि वीख ॥
आक अरण्ड की लकरी चूपै,
छाडै बहुत रस हि भरे ईख ।
सुन्दर कोउ जगत मैं विरलौ,
या मूरख कौ लावै सीख ॥२५॥
पानी जरै पुकारै निसि दिन,
ताकौं अग्नि बुझावै आइ ।
हूं शीतल तूं तप्त भयौ क्यों,
बारवार कहै समझाइ ॥
मेरी लपट तोहि जो लागै,
तौ तूं भी शीतल ह्वै जाइ ।
कबहूं जरनि फेरि नहि उपजै,
सुन्दर सुख मैं रहै समाइ ॥२६॥
खसम पर्यो जोरु के पीछे,
कह्यौ न मानै भौंही रांट ।
जित नित फिरै भटङ्गी वोही,
मैं तौ त्रिये रकत के भांइ ॥
हौं हू भूख न भागी मेरी,
तूं निसि रोटी मागै काइ ।