सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
पहली पुतली १. ( २३ )
पहली पुतली १. ( २३ )
और अपने जीमें बहुतसा खुश हुआ, और जितने उस राजाके
दुश्मन थे उनके जीमें रंज हुआ राजाके देशके लोगोंने बहुत
खुशीकी और सब द्वीपद्वीपके राजा खिदमतके वास्ते आये,
और जो राजा गरूर था उसका वहां जाकर राज छीन
लेलीया, और अपना राज करता, गरज उदयसे अस्ततक
खूब उसने अपना राज किया, सब रैय्यत आनंदसो उस
राजमें बसती थी, और जो क्षत्रिय थे सो सब उनको डरते थे
और जो कोई देश विदेश जाता था सो वहां विक्रमका धर्म
सुनता था, और सब मुल्क आबाद देखता था, कहीं दुःखी
उसे नजर न आता था, डाड और बांध उसके राजभरमे किसीने
कानसे न सुना, बल्कि घर घर आवाज वेद और पुराणकी
आती थी, और जितने लोग थे वे सब स्नान ध्यान करके तीनो
वख्त अपने भगवानकी यादमें रहते थे, अपने घरमें सब राजा
किसी सभा करके खुश रहते थे, राजा राजप्रजा सुखी, इसके
एक दिन राजा विक्रमादित्यने सभा की ओर सब पंडितोंको
बुलाया, और पंडितोंसे राजाने पूँछा कि--मेरे जीमें है कि अब
मै संवत बांधूं, सो तुमसो पूँछताहूँ कि, मै इसबातके लायक हूँ
कि नहीं हूं ? सो तुम शास्त्र देखकर मुझसे विचारके कहो,
सब पंडितोंने विचार करके राजासे कहा--महाराज ! अब जो
तुम्हारा प्रताप है सो तीनो भुवनोमें छाय रहाहै, इस वास्ते जो
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कुछ तुम्हें करना है सो कीजिये. दुश्मन तुम्हारा कोई नहीं
राजाने यह सुनकर पंडितोंसे कहा कि—अब तुम बताओ कि,
किस बुद्धीसे संवत् बांधू ? जो कुछ शास्त्रकी रीतिमे मुनासिब
हो तिस तरहसे हमें कहो ? तब पंडितोंने कहा—पहले तो तुम
अजीतमाल पहनो, फिर उसके बाद देश देशके ब्राह्मण और
जमीनदार, राजा और अपने सब कुटुंबके लोग बुलावो.
सवालाख कन्यादान सवालाख ब्राह्मणोंको करो. और
जितने ब्राह्मण तुम्हारे मुल्कके हैं उनकी वृत्ति करदो. एक
बरसका खजाना जमीदारोंको माफ करो और जो भूखा, कंगाल
इस बरसमें आवे उसको वृत्तिका हुक्म करो. इसी तौरसे
राजाने सब काम किया. और सिवा इसके जो जो दान
पुण्य किया उनका बयान किससे हो ? एक बरसतक राजा
अपने घरमें बैठे पुराण सुनता रहा और इस तरहसे संवत्
बांधा, कि तमाम दुनियाके लोक धन्य धन्य करतेथे. यह सब
अहवाल राजाको रत्नमंजरीने सुनाया और राजा विक्रमादि-
त्यका यश गाया. और कहा—राजा भोज ! जो तुम इतने हो तो
इस सिंहासनपर बैठो. सुनके राजाने कहा सच है जो कुछ
तूने कहा यह बात मुझेभी पसंद आई. इतना कहकर राजा
अपनी सभामें जाकर बैठा. और दीवान मुसदियोंको बुलाया
कि, तुम सब तैयारी संवत् बांधनेकी करो. इस दिनकी वह