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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पहली पुतली १. ( १९ )

पहली पुतली १. ( १९ )

विक्रमादित्यके पास चलो तो हम सबोंकी जान बचे तब लूतबरन
बोला-धन्य भाग जो तुम मेरे पास अपना मतलब समझकर
आयेहो. जो कुछ काम मुझसे होगा उसके लिये मैं कभी ना न
करूंगा. यह कहकर अपने राजाके पास आया और राजासे
हुक्म लेकर उनके साथ गया. जब सब कौवोंने उस दीवानको
देखा तब वे राजासे कहने लगे कि-महाराज ! आप जिसका
नाम लेतेथे वह यही आता है. राजाने देखकर उसे आदर करके
आधी गद्दीपर बिठाया और क्षेम कुशल पूंछी. वो आसीस
देकर बोला राजा ! किसलिये तुमने मुझे याद किया ! और
किसवास्ते इन सबको बंद किया ! जब लूतबरनने यह बात
पूछी तब राजा विक्रम कहने लगां-मैं एकदिन शिकारको
गयाथा. इत्तिफाकन जंगलमें राह भूलगया तब एक बरगदपर
चढकर चारों तरफ देखने लगा इतनेमें एक कौवेने मुझपर बीट
करदी. इसलिये मैंने सब कौवोंको बंद किया. जबतक इन-
मेंसे कोई सच न कहेगा तबतक एक कौवा इनमेंसे न
छोडूंगा. बल्कि जानसे इन सबको मारूंगा. फिर लूतबरन
बोला-महाराज ! यह काम सब मेरा है. जब तुम्हें मैंने मगरूर
देखा तब मेरे मनमें गुस्सा आया, और अकल मेरी उसवक्त
जाती रही. यह सुनकर राजा हँसा. और बिगड़कर कहने
लगा. मुझे मगरूर क्यों न हो ? राजा मैं हूं, दाता मैं हूं, सिपाही

[header] ( २० ) सिंहासनबत्तीसी.
मैं हूं. और कौनसी बात मुझमें नहीं है? सो तुम कहो, तब
वह बोला-वह जो नगर तुमने नजर भरके देखा है उसका में
सब बयान करताहूं. राजा बाहुबल नाम वहांका कदीम राजा
है. और गंधर्वसेन बाप तुम्हारा उसका दीवान था. राजाको
उसकी तरफसे कुछ बेइतबारी हुई तब उसे छुड़ादिया. वह
नगर अंबावतीमें आया और उस जगहका राजा हुआ. उसका
बेटा तूं विक्रम है. तुझे जगमें कौन नहीं जानता? पर जबतक
राजा बाहुबल तुझे राजतिलक न देगा तबतक तेरा राज
अचल न होगा और वह जो यह तेरी ख़बर पावेगा तब वही
तेरेपर चढ़कर दौड़ेगा और तुझे आकर एक घड़ीमें राखके
बराबर करदेगा इस वास्ते तुझे जो मैं सलाह दूंगा उसे मान
और किसी तरहसे उस राजाके पास जाकर राजाको मोहबत
दिलाकर तिलक उससे ले, जिससे यहांका अचल राज तू करे.
राजा विक्रम बड़ा अकलमंद था, इसवास्ते इस बातपर
कायम रहा ऐसी बातें लतबरनसे सुनकर कुछ दिलमें न
लाया और हँसकर कानदे सब सुनी. फिर लतबरनने कहा-जो
तुम्हें चलना हो तो हमारे साथ चलो और पंडितोंसों अच्छी
साअत दिखाकर चलनेकी तैयारी करो. दूसरे दिन सुबहके
वक्त राजा लतबरन मंत्रीके साथ होकर चला और राजा
बाहुबलके नगरमें जाकर पहुंचा तब उस दीवानने राजा विक्रमसों

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:

कहा-यहां बैठो और मैं अपने राजाको तुम्हारे आनेकी
खबर दूं. यह बात राजासे कहकर लूनबरन अपने राजाके मंदिरमें
गया उसको प्रणाम किया. और सब समाचार और अपनी
हकीकतसमेत राजाका अहवाल कहने लगा-महाराज ? गंधर्व-
सेनका बेटा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. यह बात
बाहुबल राजाने सुनकर उसको तुरंत अंदर बुलाया. तब लूनब-
रन राजा विक्रमको लाया और अपने राजासे मिलाया. राजा
उससे उठकर मिला और आदर करके आधे आसनपर बिठाया
और क्षेम कुशल पूछी बाद उसके रहनेके लिये मकान बताया
राजा उठकर उस मकानमें आया, वहा रहने लगा. जब दस
पांच दिन बीतगये तब दीवानसे राजा विक्रमने कहा-हमें तुम
विदा करवा दो, तो हम अपने स्थानको जावें तब मंत्री कहने
लगा-हमारे राजाका यह स्वभाव है कि जो उनसे मिलनेको
आताहै उसे अपना रुखसत नहीं करते, तुम रुखसत मांगो
और जिस बातकी ख्वाहिश हो सो कहो, अपने जीमें कुछ शर्म
न करो. तब राजा बोला-मुझे कुछ नहीं चाहिये. जो कोई जो
बर चाहे सो मुझसे ले. तब दीवान बोला-राजा ! यह हमारी
बात सुनो. इस राजाके घरमें एक सिंहासन है सो वह सिंहासन
पहले महादेवजीने राजा इंद्रको दियाथा और इंद्र राजाने
इसको दिया. उस सिंहासनमें ऐसा गुण है कि, जो उसपर बैठे

( १२ ) सिंहासनबत्तीसी.
सो सात द्वीप और नौ खंड पृथ्वीका अजीत होकर राज करे
और बहुतसा जबाहिर उसमें जटा है. और उस सिंहासनमें
बत्तीस पुतलियांभी बनी हैं. अमृत देकर उनको सांचेमें
ढाला है. तुम रुखसत होते हुए वह सिंहासन राजाजी
मांगो कि उसपर बैठकर आनंदसे राज करेंगे. यह रातको
दीवाननें सलाह दी. और सुबहको राजाके दरबारमें दीवानने
जाके खबर दी कि, महाराज ! विक्रम रुखसत होताहै और आपके
पास आनेको बाहर खडा है. यह सुनकर राजा फिर फौरन
दरवाजेपर आया ओर विक्रमने देखकर अपना माथा नवाया
राजानें विक्रमसे कहा जो तुम्हारे जीमें आवे सो मांगो मैं
खुश होकर तुमको वही दूंगा तब विक्रम बोला-महाराज ! जो
आपने मुझपर दया की है, तो वह सिंहासन मुझे बकशो, जो
इंद्रने आपको दिया है. यह बात सुनकर राजा बोला-अच्छा,
सिंहासन तो हमने तुम्हें दिया, पर, यह काम मंत्रीका है, इसे
तुम नहीं जानतेथे. यह कहकर सिंहासन मँगाया और
पान तिलक देकर उस सिंहासनपर बिठाया और कहा
कि-तुम अजीत हुए. अब किसी बातकी चिंता मनमे न
करना, गंधर्वसेन मेरा बडा दोस्त था और तू उसके खान-
दानमें बडा नामवर हुवा. इस तरहसे राजा विक्रमको
आसीस देकर रुखसत किया. राजा वहांसे अपने घरमें आया.