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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 190 में से

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पहली पुतली १. ( २३ )

और अपने जीमें बहुतसा खुश हुआ, और जितने उस राजाके
दुश्मन थे उनके जीमें रंज हुआ राजाके देशके लोगोंने बहुत
खुशीकी और सब द्वीपद्वीपके राजा खिदमतके वास्ते आये,
और जो राजा गरूर था उसका वहां जाकर राज छीन
लेलीया, और अपना राज करता, गरज उदयसे अस्ततक
खूब उसने अपना राज किया, सब रैय्यत आनंदसो उस
राजमें बसती थी, और जो क्षत्रिय थे सो सब उनको डरते थे
और जो कोई देश विदेश जाता था सो वहां विक्रमका धर्म
सुनता था, और सब मुल्क आबाद देखता था, कहीं दुःखी
उसे नजर न आता था, डाड और बांध उसके राजभरमे किसीने
कानसे न सुना, बल्कि घर घर आवाज वेद और पुराणकी
आती थी, और जितने लोग थे वे सब स्नान ध्यान करके तीनो
वख्त अपने भगवानकी यादमें रहते थे, अपने घरमें सब राजा
किसी सभा करके खुश रहते थे, राजा राजप्रजा सुखी, इसके
एक दिन राजा विक्रमादित्यने सभा की ओर सब पंडितोंको
बुलाया, और पंडितोंसे राजाने पूँछा कि--मेरे जीमें है कि अब
मै संवत बांधूं, सो तुमसो पूँछताहूँ कि, मै इसबातके लायक हूँ
कि नहीं हूं ? सो तुम शास्त्र देखकर मुझसे विचारके कहो,
सब पंडितोंने विचार करके राजासे कहा--महाराज ! अब जो
तुम्हारा प्रताप है सो तीनो भुवनोमें छाय रहाहै, इस वास्ते जो