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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

उन्तीसवीं पुतली २९. ( १७९

उन्तीसवीं पुतली २९. ( १७९

बोला कि, मैने जिस जगहको स्वप्नमें देखा है तुम मुझे वहां
ले चलो. राजाकी यह बात सुनतेही वीर उठाकर ले उडे और
पलक मारते वहा जाकर पहुंचे. राजाने वहांसे नीचे उतर वीरोंको
रुखसत किया. और आप उस बगीचेमें जा उस मकानकी
तैयारी देखतेही मनमें भौचक हो अपने मनमें कहने लगा
कि, यह मकान किसने बनाया है ? आदमीका तो मगदूर
नहीं चाहिये तो ब्रह्माने अपने हाथसे चित्त देके रचा है. फिर उस
मंदिरके अंदर जा राजा खडा हुआ इतनेमें वहां जो रंडिया
बैठी गाय रहींथी सो राजाको देख अपने मनमें डर चुप हो
रहीं और उस सिद्धका स्मरण किया उसने तुर्त आके दर्शन
दिया. और वह विक्रमको देख क्रोध कर बोला कि, अभी मैं
तुझे शाप देता हू कि, तू जलकर भस्म. होजाय किस लिये मेरे
स्थानपर आया है ? सुखसे ये स्त्रियां बैठी राग आलाप कर
रहींथीं. इतनेमे तूने आकर उनका रंग भंग किया---यह सुन-
कर राजा हाथ जोड बिनती करके बोला कि ? महाराज मैं
अनजान यहां आया हूं तुम्हारे दर्शनकी इच्छा थी पर
तुम्हारे क्रोधकी आंचको कौन सह करता है ? मैं आपका
दास हूं चुक मेरी माफ काजिये. यह सुन वह योगी बोला कि,
सुन बिक्रम ! तूने सच कहा. मुझे बडा क्रोध हुआ था. पर जो तू
मेरे सम्मुख न होता तो मैं तुझे शाप देता और अब मैं
तेरी बात सुन प्रसन्न हुआ तू मुझसे मांग जो चाहिये. राजाने
कहा कि-महाराज ! मैं क्या मांगू आपके प्रसादसे मेरे यह

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सब कुछ है. अन्न, धन, हाथी, घोडे किसी चीजकी कमताई
नहीं. पर एक वस्तु मात्र मांगनेके लिये मैं आपके पास आया हूं
जो कृपाकर दीजिये तो मैं मांगूं. यह सुन योगीने कहा कि,
राजा ! जो तू मांगेगा सो मैं दूंगा. यह बात सुनतेही विक्रमने
कहा-महाराज ! यह मंदिर मुझे दीजिये. योगीने सुन कुछ
बिलंब न किया. तुर्त वह मंदिर राजाको दिया. और अपना
योगरूप धर वहांसे तीर्थब्रत करनेको गया. राजाने जब वह
महल पाया तब प्रसन्न हो गद्दीपर जाकर बैठा और वे सब
रंडियां जैसे योगीके आगे गातीथी वैसेही तहासे राजाके पास
गाने लगी राजाभी उस मंदिरमें खुशीसे रहने लगा. वहा
अनेक अनेक प्रकारके संभोग करने लगा. इतनी बात कह
वैदेही नाम पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! इस रीतिसे
राजा विक्रमादित्य तो वहा बैठकर आनंद करने लगा और
योगी तीर्थ तीर्थ फिरकर रहता था. और जो कोई सिद्ध मिलता
था उससे अपना दुःख कहता था- इस तरहसे किसी और
तीर्थमें जाकर पहुंचा आर वहां एक यतीसे अपने जीके दुःखका
ब्योरा सब कहने लगा. उसने उसको कहा कि तू अपने स्थानको
जा और भेष धरके राजा विक्रमसे जाकर सवाल कर वह तो
बडा धर्मात्मा है. जभी तू वह मकान मांगेगा तभी तुझे हवा
ले कर देगा. तू आपके मनमें चिंता मत कर. यहु योगी उसकी
सीख मान एक अति बूढे ब्राह्मणका भेष धर उस मंदिरके निकट
आन पहुँचा. और उसके द्वारपर जा ताली दी. तालीकी