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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६१)

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६१)
ज्यों ज्यों वे प्यार करती थीं त्यों त्यों राजा मान करता था, फिर
राजा बोला सुनो-सुंदरियो ! मैं तुमसे हित करता हूं और तुम
मुझसे अनहित कर औरका ध्यान धरो यह तुम्हे उचित नहीं.
तब वे बोलीं कि, महाराज ! हमारे तो प्राणरक्षक तुम हो, तुम्हे
देखे बिना हम जीतीं नहीं तुम्हारा ध्यान हम आठो
पहर करती हैं जो कभी तुम कहीं बाहर जाते हौ तो हम
चकोरकी तरह तुम्हारे मुखचंद्रके देखनेको तरसती हैं. और
जैसे जल बिना मीन तडके तैसे हम व्याकुल रहती हैं और
क्षणभरके वियोगमें जलकमलकी तरह हम कुम्हला जाती
हैं.' यह सुन राजा क्रोधकर मुस्कुराया और बोला-सच है,
सुंदरियो ! हमने जाना तुम्हारा दिल मुझे नहीं छोडता जैसे
एक सिद्धके छह सिद्ध होगये और फिर वह एकही सिद्ध हो
गया. यह सुन रानियां एकदम चुप होकर बोलीं कि-महाराज !
ऐसी अचरजकी बात तुम कहते हो जो कभी न देखी न सुनी
और किसीको इतिवारभी जिसका न आवे. क्यों कर एक
देहकी छह देह होयं और इस बातको कौन मानेगा ? तब
राजाने कहा कि-चलो हम तुम्हें दिखादे तब छहोंको अपने
साथ ले उसी बाड़ीमें जा उस गुफाका मुँह खोल दिया. देख
कर वे शरमागईं और अपने मनमें जाना कि, राजाने हमारा
सब चरित्र देखा. फिर राजाने कहा कि, तुमने जाना या नहीं.
यह सुनकर उन्होंने नीच गरदनें कर जवाब कुछ न दिया.
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( १६२ ) सिंहासनबत्तीसी.

तब राजाने छहोंका शिर काट उस गुंफामें डाला और उसका
मुँह बंद कर चला २ मंदिरमें आया. और आतेही नगरमें ढँढोरा
फिरा दिया कि जितने ब्राह्मण और ब्राह्मणियां और ब्राह्म-
णोंकी कन्या हैं वे सब यहां आनकर हाजिर होवें. यह सुनकर
सब हाजिर हुई जितने रानियोंके गहने और वस्त्र थे सब
ब्राह्मणियोंको पहनाये. और एक एक ब्राह्मणको एक एक
गांव वृत्ति करदिया. और जितनी कन्या थीं उनको दान दहेज़
दे व्याह कर दिया. और आप राजकाज करने लगा. इतनी
बात कह पुतली समझाने लगी कि, सुन राजा भोज ! तू बड़ा
पंडित है पर इस आसनपर वह बैठेगा, जो विक्रमादित्यके
समान होगा. तब वह साअत गुजर गई. राजाभी वहांसे
उठकर अपने मकानको गया. रातको इसी सोचमें पडा रहा.
दूसरे दिन सुबहको फिर सिंहासनके पास आकर चढ़नेके
तयार हुआ तब जयलक्ष्मी-

पचीसवीं पुतली-

बोली-सुन, राजा भोज ! एक दिनकी बात मैं तेरे आगे
कहतीहूं एक भाट निपट दरिद्री खररावहक था. सब
पृथ्वीके राजाओंके पास फिर आयाथा. और एक कौ-