सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

इकतीसवीं पुतली ३१ ( १८७

इकतीसवीं पुतली ३१ ( १८७
इकतीसावीं पुतली-
बोली-कि, सुन राजा भोज ! तू बडा मूर्ख है कि, हमारा
कहा नही मानता और साहसको तू सहजकर जा--
नता है. कंचनकी बराबरी पीतल नहीं कर सकता
और हीरेके बराबर सीसा नहीं होता. और चंदनके
गुणको नीम नहीं पाता. इससे तू हजार बेर अपने जीमें मनसूबा
किया कर लेकिन राजा बीर विक्रमादित्यके बराबर तू नहीं हो
सकता और इस सिंहासनपर बैठते हुए तुझे शर्म नहीं आती ?
इतनी बात उस पुतलीकी सुनतेही राजा भोज अपने जीमे बहुतसा
लजाया और राजाने अपना जतिव धिकार कर माना. फिर
इतनी बात कह पुतलीने कहा कि, सुन राजा भोज ! मैं एक दिन
की बात राजा वीरविक्रमादित्यकी तेरे आगे कहती हूं सो तू मन लगा
कर सुन. हे राजा भोज ! जब राजा बीरविक्रमादित्यके मरनेके दिन
बहुत नजदीक आ गये तब राजाको मालूम हुआ और मालूम करके
नगरके बाई और गंगातीरपर एक मंदिर बनवाया जब वह मंदिर
बनचुका तब आपभी वही जा उसमें रहने लगा. और तमाम
मुलकमें ढंढोरा पिटवा दिया कि, जो कोई दान लिया चाहे सो यहां
आकर ले जावे. और जितने ब्राम्हण, पंडित, भाट, भिकारी
राजाके पास आये तिन्होंने मुंह मांगा दान राजा वीर विक्रमा-
दित्यसे पाया यह खबर देवताओके जा मालूम पढी तब बहुतसे
देवता स्वरूप बदल दान लेनेका बहाना कर राजाका सत देखनेके

१८८ ) सिंहासनबत्तीसी.
लिये वहां आय. और आ आकर जो जो जिसके जीमें आया सो
सो उसके पास मांगने लगे. और राजानेभी सबोका मांगा पदार्थ
दिया. जब दान ले चुके तब राजाके सामने खडे हो आशीश
दे कहने लगे कि, धन्य है राजा विक्रम, तेरे तईं और धन्य
है तेरे मातापिताको तूने ऐसा शक बांधा कि तीनों लोकोंमें
तेरी निशानी रहेगी. सत्य युगमें जैसा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र,
और त्रेतामें जैसा दानी राजा बलि हुवा, और द्वापरमें जैसा
राजा युधिष्ठिर हुआ तैसा कलियुगमें तू राजा वीर विक्रमादित्य
है. जैसे चारों युगोंमें तुम धर्मात्मा राजा हुए तैसे ओर
न हुए न होंगे. इस तरह राजासे कह देवता तो बिदा होगये.
इतनी बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! देवता
तो सब बिदा हो गये. और राजा जाकर झरोखेमें बैठा.
इतनेमें एक राजाको किसी ऋषिने शाप दियाथा सो
सोनेका हिरन बनकर राजा वीर विक्रमादित्यके सोही आया.
राजाने देखतेही उसको मारनेके धनुष्य और तीर उठाय.
राजाने चाहा बाण मारैं. इतनेमें हिरन बोला कि, मैं
जन्मका ब्राह्मण हूं. मारे भूखके दिन रात फिरता हूं,
सिद्धसे मैंने अपनी मांग थी. सो उसने मुझे शाप
हिरन किया .फिर मैंने उस सिद्धसे कहा कि, महाराज ?
मुझे हिरन तो बनाया है पर मेरी गति आगे किस तरहसे होगी
सो मुझे बता दो. उस ऋषिने मुझसे कहा कि, कलि-