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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

दूसरी पुतली २. ( ३१ )

दूसरी पुतली २. ( ३१ )
राज्यकी रखवाली करनेके वास्ते भेजा है. राजाने पूछा-भर्तृहरिको
क्या हुआ ! उसने जवाब दिया भर्तृहरिको कोई यहांसे छलकर
लेगया यह बात सुनकर राजा हँसा और उसे कहा-वह तो मेरा
छोटा भाई है. फिर देव बोला, मैं नही जानताहूं कि तुम कौन हो
और जो तुम निकम इस देशके राजा हो तो मुझसे लडो और
मुझे मारकर जाओ बिना लडे मैं तुझे शहरमें पैठने न दूंगा.
यह सुन राजा बिगडके बोला-तू मेरे तईं क्या डरता है ? और
जो लडा चाहे तो मैं तय्यार हूं. इस तरह दोनों बातें कर तैयार
हो लडने लगे और राजा उस देवको पछाड़कर छातीपर चढ़
बैठा. तब वह बोला-राजा ! तू मुझसे वर माँग, मैं तुझे दूंगा. यह
बात उसकी सुनकर राजा हसकर बोला-मैने तुझे पछाड़ा है
और चाहे तो तुझे मार डालूं-तू मुझे वरदान क्या देगा ?
तब वह बोला-राजा ! तू मुझे छोड़दे मैं तेरे आगे इसका सब
ब्यौरा कहताहूं. तेरे राज्यकी धूम सब देशमें है और सब राजा
तुझसे डरतेहैं पर मैं जो बात कहूं सो तू कान देकर सुन. तेरे
शहरमें एक तेली है और एक कुम्हार सो तुझको मारनेको
फिक्रमं है पर तुम तीनोंमेंसे जो दोनोंको मारेगा वही अचल राज
करेगा. तेली तो पातालका राज करताहै और वह कुम्हार योगी
बना हुआ जंगलमें तपस्या अपने जीमें लाकर करताहै. दिल्लमें
कहताहै कि, राजाको मारके तेलीको तेलके जलते कडाहमें

( ३२ ) सिंहासनबत्तीसी.
डालूं, और देवीको बलि देकर मैं निश्चिंत राज्य करूं ओर तेली
कहता है कि, राजा और योगीको मारके त्रिलोकीका राज्य मैं
करूं और तू इस बातको न जानता था, मैंने इसवास्ते तुझे खबर-
दार किया, तुम इनसे बचे रहना, ओर आगे जो मै कहताहूं सो
तुम ध्यान लगाकर सुनो. योगीने आज उस तेलीको मारकर अपने
बश किया है सो तेली एक सिरीसके वृक्षपर रहा है. अब वह
योगी तुमको न्योता देनेको आवेगा. छल करके तुझे ले जायगा.
तू न्योता लेकर वहां जाइयो. जब वह कहे कि, तू दंडवत् कर,
तब तू कहियो-मैं दंडवत करना नहीं जानता. मेरैतईं एक
जहान दंडवत् करता है. जो तुम गुरु हो और मैं चला तो मुझे
दंडवत् करना बताओ और उसी तरहसे मैं दंडवत करूं ! जब
वह शिर निहुरावे तब तू खांडा मार कि, उसका शिर जुदा
हो जावे और वहां कडाह जो देवीके आगे तेलका खौलता
होगा उसमें उसको और वृक्षसे तेलीको उतारके दोनोंको
उसी कडाहमें डाल देना. यह मेरी बात तू गांठ बांध. इसे हर
गिज कभी न भूलना. यह बात कहकर वह देव चलागया
और राजा अपने महलमें आया भोर हुए सारे नगरमें खबर
हुई कि, राजा विक्रमादित्य आए. दिवान मुत्तसदी और सब अह-
लकार नजर लाए. तमाम शहरमें आनंद होगया. घर घर
मंगलाचार होने लगे. यहां तो खुशीके नगारे बज रहेथे इतनेमें