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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

नववीं पुतली (६१)

नववीं पुतली (६१)

अबभी वह फल मेरे घरमें है. राजन कहा-वाह ! तूने सब
अच्छी बातें कहीं. अब तू ये लाल लेकर अपने घरको जा.
इस कोतवालने बहुत बुरा काम किया, जो बेतहकीक ही पकड़
लाया इनसे न्याय अब यह है कि, लाख रुपये कोतवाल
तुझे दंड दे. यह कह कोतवालसे लाख रुपये दिलवाये और
उसे घरको भेज दिया ये बातें कह फिर पुतली बोली-सुन
राजा भोज ! वीर विक्रमादित्यके गुण और धर्म. तू मूर्ख है.
कुछ उसकी हकीकत नहीं जानता. वैसे राजाको तू अपने आगे
हीन कर मानता है. और अपने ताईं मनमें तू अधिक समझता
है ये बातें पुतलीसे सुन राजा उस दिन योंही अउता पछता
रहगया. वह साअतभी जाती रही. सुबहको दूसरे दिन राजा
सिंहासनके पास खडा हुआ और पुतलीसे पूंछने लगा कि,
तू खुश तो है ? तुम्हारे मुँहसे कथा सुनकर मुझे निहायत खुशी
पैदा होती है. यह सुन मधुमालती-

नववीं पुतली ९-
बोली-सुन राजा भोज ! यहां बैठकर, मैं एक दिनकी
कथा राजा बीर विक्रमादित्यकी कहती हूं. एक दिन
राजाने होम करनेका आरंभ किया. जहांतक देशके ब्रा-
ह्मण थे, उन्होंको न्योता भेज बुलाया और जितने
उसके देशके राजा और साहुकार थे वेभी हाजिर
५

( ६६ ) सिंहासनबत्तीसी.

हुए, भाट, भिकारी, सुनकर सब धाय धाय आए और,
देश देशके राजा अपने सब लोगोंको ले ले आये, और जितने
देवता थे वेभी सबके सब आये. राजा अपने आसनपर बैठा, यज्ञ
होने लगी, कि, एक बूढा ब्राह्मण उस समय आया. राजा अपने
यज्ञके मंत्र पढ़ता था. ब्राह्मणको दूरसे देखके मनमेही दंडवत् कि,
उस पंडितको आगमविद्यासे मालूम होगया इसवास्ते हाथ बढ़ा-
कर राजाको आसीस दी कि, चिरंजीव हो. जब राजाने मंत्रसे
फुर्सत पाई तब उस ब्राह्मणसे कहा कि-महाराज ! आपने
बहुत मंद काम किया कि, बिना प्रणाम मुझे आशीर्वाद
दिया “ जबतक पांव न लागे कोई । वह आशीष पापसम
होई ” तब ब्राह्मणने कहा-राजा ! जब तूने अपने मनमें
दंडवत् की तभी मैंने आशीष दी. यह बात सुन राजाने
लाख रुपये ब्राह्मणको दिये, तब ब्राह्मण हँसकर कहने
लगा कि-महाराज ! इतने रुपयोंमें मेरा निर्वाह न होवेगा.
ऐसा कुछ विचार कर दीजिये कि, जिसमें मेरा काम हो. तब
राजाने पांच लाख रुपये उसे दिये. वह लेकर अपने घरको
गया और जो जो ब्राह्मण उस यज्ञमें थे उनकोभी बहुत कुछ
दिया. इसवास्ते राजा भोज ? मैंने तेरे आगे यह बात कही
कि तू सिंहासनपर बैठनेके योग्य नहीं. सिंहकी बराबरी सियार
नहीं कर सकता और हंसकी बराबरी कौवेसे नहीं होसक्ती