सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
यह बातें कह लीलावती पुतलीने फिर कहा कि-राजा भोज !
( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी.
समें रहने लगे. और नौजवानीकी ऐश करने. हर एक तरहका
लुत्फ उठाने लगे और सखियांभी खिदमतमें हाजिर थीं. और
मानिंद चकोरके चांदसा राजाका मूँह देखतीथीं चंदमुद्दत
राजाको इसी तरह गुंजरी. अपने राजकी सुध कुछ न रही.
यह बातें कह लीलावती पुतलीने फिर कहा कि-राजा भोज !
जैसा राजाने बल किया वैसाही विधाताने उसको सुख दिया.
किस्मतने यह तमाशा दिखाया. फिर कहने लगी कि, उन सखि-
योंमेंसे एक सखीसे राजा विक्रमादित्यकी बहुतसी प्रीति हुई और
वह राजाकी दया विचार वहाका भेद कहनेलगी. ऐ राजा ! तुम
यहां आन फंसेहो जीते यहांसे कभी न निकलोगे. तुम्हारा नाम
सुनकर और तुम्हारे राजका ध्यान करके मुझको रहम आता है,
क्योंकि तुम्हारे सरीखे धर्मात्मा दयावंत, दाता, परोपकारी
होकर यहां रहना इसमें तुम्हारा भला नहीं है. उधर लाखों आदमी
तुझबिना दुःख पाते होंगे. उस सखीकी बात सुनकर राजाको
ज्ञान हुआ और अपने राजका ध्यान आया. तब सखीसे पूछा-
यहांसे जानेका भेद मुझे बताओ तब वह बोली-एक घोडी इस
राजकन्याकी घुडसालमें है, सो उदयसे अस्ततलक जा सक-
तीहै. यह बात सुनकर दूसरे दिन राजा रानीको अपने साथ
लेकर टहलता हुआ अश्वशालामें जा निकला. घोडोंको देख
कर तारीफ करने लगा. रानी बोली-जो तुझे शौक होय तो