सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
इतनी बात कहकर पुतली कहने लगी कि-सुन राजा ! वीर
( ७८ ) सिंहासनबत्तीसी.
इतनी बात कहकर पुतली कहने लगी कि-सुन राजा ! वीर
विक्रमादित्यने सोच कुछ न किया और लाखों रुपयोंका दान
दहेज दे एक पलमें ब्राह्मणके हवाले किया. तू इस लायक
नहीं है इस सिंहासनपर बैठनेसे डर. ऐ राजा भोज ! तू गुण-
ग्राहक है, दानी और साहसी नहीं, नाहक हिर्स कर्ता है.
यह सुनकर राजा भोज मनमे पछताकर चुप हो रहगया.
दूसरे दिन सुबह होतेही फिर सिंहासनके पास आया और
बैठनेको तैयार हुवा. जब उसने पांव बढाया तब कीर्तिवती-
बारहवीं पुतली-
बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा वीरविक्रमा-
दित्य अपनी मजलिसमें बैठकर कहने लगा कि, कलि-
युगमें औरभी कहीं कोई दाता है ? ऐसी बात सुनतेही
एक ब्राह्मण बोला कि-सुन राजा ! प्रजाके हितकारी तेरे
बराबर साहसी और दानी कोई नहीं. पर एक बात मैं कहना
चाहताहूं शर्मसे कह नहीं सक्ता. राजाने कहा कि-सत्य बात
कहनेमें लाज काहेकी है? तुम हमारे आगे साफ कहो ? हम उस
बातको बुरा न मानेंगे वह ब्राह्मण बोला-एक राजा
समुद्रके किनारे रहता है और सदा धर्मकार्य कर्ता है. जब
वह सबेरे स्नान किया चाहता है तब लाख रुपये दान देता है
और जल पीता है यह तो मैंने एक उसके दानकी रीत कही