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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 190 में से

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पृष्ठ 69

( ६६ ) सिंहासनबत्तीसी.

हुए, भाट, भिकारी, सुनकर सब धाय धाय आए और,
देश देशके राजा अपने सब लोगोंको ले ले आये, और जितने
देवता थे वेभी सबके सब आये. राजा अपने आसनपर बैठा, यज्ञ
होने लगी, कि, एक बूढा ब्राह्मण उस समय आया. राजा अपने
यज्ञके मंत्र पढ़ता था. ब्राह्मणको दूरसे देखके मनमेही दंडवत् कि,
उस पंडितको आगमविद्यासे मालूम होगया इसवास्ते हाथ बढ़ा-
कर राजाको आसीस दी कि, चिरंजीव हो. जब राजाने मंत्रसे
फुर्सत पाई तब उस ब्राह्मणसे कहा कि-महाराज ! आपने
बहुत मंद काम किया कि, बिना प्रणाम मुझे आशीर्वाद
दिया “ जबतक पांव न लागे कोई । वह आशीष पापसम
होई ” तब ब्राह्मणने कहा-राजा ! जब तूने अपने मनमें
दंडवत् की तभी मैंने आशीष दी. यह बात सुन राजाने
लाख रुपये ब्राह्मणको दिये, तब ब्राह्मण हँसकर कहने
लगा कि-महाराज ! इतने रुपयोंमें मेरा निर्वाह न होवेगा.
ऐसा कुछ विचार कर दीजिये कि, जिसमें मेरा काम हो. तब
राजाने पांच लाख रुपये उसे दिये. वह लेकर अपने घरको
गया और जो जो ब्राह्मण उस यज्ञमें थे उनकोभी बहुत कुछ
दिया. इसवास्ते राजा भोज ? मैंने तेरे आगे यह बात कही
कि तू सिंहासनपर बैठनेके योग्य नहीं. सिंहकी बराबरी सियार
नहीं कर सकता और हंसकी बराबरी कौवेसे नहीं होसक्ती