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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 190 में से

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पृष्ठ 35

( ३२ ) सिंहासनबत्तीसी.
डालूं, और देवीको बलि देकर मैं निश्चिंत राज्य करूं ओर तेली
कहता है कि, राजा और योगीको मारके त्रिलोकीका राज्य मैं
करूं और तू इस बातको न जानता था, मैंने इसवास्ते तुझे खबर-
दार किया, तुम इनसे बचे रहना, ओर आगे जो मै कहताहूं सो
तुम ध्यान लगाकर सुनो. योगीने आज उस तेलीको मारकर अपने
बश किया है सो तेली एक सिरीसके वृक्षपर रहा है. अब वह
योगी तुमको न्योता देनेको आवेगा. छल करके तुझे ले जायगा.
तू न्योता लेकर वहां जाइयो. जब वह कहे कि, तू दंडवत् कर,
तब तू कहियो-मैं दंडवत करना नहीं जानता. मेरैतईं एक
जहान दंडवत् करता है. जो तुम गुरु हो और मैं चला तो मुझे
दंडवत् करना बताओ और उसी तरहसे मैं दंडवत करूं ! जब
वह शिर निहुरावे तब तू खांडा मार कि, उसका शिर जुदा
हो जावे और वहां कडाह जो देवीके आगे तेलका खौलता
होगा उसमें उसको और वृक्षसे तेलीको उतारके दोनोंको
उसी कडाहमें डाल देना. यह मेरी बात तू गांठ बांध. इसे हर
गिज कभी न भूलना. यह बात कहकर वह देव चलागया
और राजा अपने महलमें आया भोर हुए सारे नगरमें खबर
हुई कि, राजा विक्रमादित्य आए. दिवान मुत्तसदी और सब अह-
लकार नजर लाए. तमाम शहरमें आनंद होगया. घर घर
मंगलाचार होने लगे. यहां तो खुशीके नगारे बज रहेथे इतनेमें