सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ ) सिंहासनबत्तीसी.
लिये वहां आय. और आ आकर जो जो जिसके जीमें आया सो
सो उसके पास मांगने लगे. और राजानेभी सबोका मांगा पदार्थ
दिया. जब दान ले चुके तब राजाके सामने खडे हो आशीश
दे कहने लगे कि, धन्य है राजा विक्रम, तेरे तईं और धन्य
है तेरे मातापिताको तूने ऐसा शक बांधा कि तीनों लोकोंमें
तेरी निशानी रहेगी. सत्य युगमें जैसा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र,
और त्रेतामें जैसा दानी राजा बलि हुवा, और द्वापरमें जैसा
राजा युधिष्ठिर हुआ तैसा कलियुगमें तू राजा वीर विक्रमादित्य
है. जैसे चारों युगोंमें तुम धर्मात्मा राजा हुए तैसे ओर
न हुए न होंगे. इस तरह राजासे कह देवता तो बिदा होगये.
इतनी बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! देवता
तो सब बिदा हो गये. और राजा जाकर झरोखेमें बैठा.
इतनेमें एक राजाको किसी ऋषिने शाप दियाथा सो
सोनेका हिरन बनकर राजा वीर विक्रमादित्यके सोही आया.
राजाने देखतेही उसको मारनेके धनुष्य और तीर उठाय.
राजाने चाहा बाण मारैं. इतनेमें हिरन बोला कि, मैं
जन्मका ब्राह्मण हूं. मारे भूखके दिन रात फिरता हूं,
सिद्धसे मैंने अपनी मांग थी. सो उसने मुझे शाप
हिरन किया .फिर मैंने उस सिद्धसे कहा कि, महाराज ?
मुझे हिरन तो बनाया है पर मेरी गति आगे किस तरहसे होगी
सो मुझे बता दो. उस ऋषिने मुझसे कहा कि, कलि-