सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
[Header] बारह्वीं पुतली १२. ( ८३ )
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तुमसे प्रतिज्ञा की थी कि, मैं तुम्हारी मुश्किलके वक्त काम
आऊंगा. सो मेरा बचन क्या आप भूल गये ! मेरे आगे
अपनी सब अवस्था ब्योरेवार कहिये. तब राजा बोला कि-
मैं तेरे आगे क्या अपनी बात कहूँ ? पर एक मेरे जीमें है कि,
अब अपना प्राणघात करूंगा. विक्रमने कहा-पृथ्वीनाथ ! एक
बेर मेरे आगे अपने मनकी व्यथा कहिये और पीछे अपने
मनमें जो करना होय सो करो. राजाने कहा-एक देवी मेरे
पास थी सो मैं नहीं जानता वह कहां गई ? लाख रुपये रोज
वह मुझे देतीथी. और वे लाख रुपये मैं नित्य दान पुण्य
करताथा. और अब मुझे बड़ा कष्ट हुआ है मेरी नित्यक्रिया
निबहेगी नहीं. इसवास्ते अब मैं जान दूंगा. और ऐसा मैं
किसीको नहीं देखता कि जिससे मेरा नित्यनेम चले और
जो धर्म पुण्य न रहेगा तो मेरा जीना संसारमें अकारण है.
यह बात उसकी विक्रम सुनतेही बोला-ऐसा काम मैं
करूंगा. ऐसा बोलकर वह थैली हाथमें दी. और कहा-महा-
राज ! स्नान ध्यान कर नित्यधर्म कीजिये और थैलीसे
जितने रुपये चाहोगे वे खर्च करोगे. कम कभी न होंगे. यह
बात सुनतेही राजा खुश होकर उठ बैठा और थैली हाथमें
ले प्रधानको बुला उसमेंसे रुपये निकाल प्रधानको दिये और
खर्च करनेका हुक्म किया. और कहा कि-जितने ब्राह्मण
( ८४ ) सिंहासनबत्तीसी.
सदा दान पाते हैं उन्होंको उसी तरहसे दो. दीवान मुवाफिक
हुकमके अपने काममें मशगूल हुआ. और राजा बीर विक्रमा-
दित्यने कहा—महाराज ! मुझे आज्ञा दीजिये तो मैं अपने
देशको जाऊं. बहुत दिन गुजरे हैं तब वह राजा बोला-हम
तुम्हारे कहांलक गुण मानेंगे ? तुमने हमें जीवदान दिया है.
फिर कहा—जो तुम अपने देश पहुँचोगे. तब संदेसा हमें भेज
देना कि, हम क्षेम कुशलसे पहुँचे. और ठीक अपना ठिकाना
बता जाओ, जो हमारा पत्र तुम्हारे पास पहुँचे. तब
उसने कहा कि-हे राजा ! मैं राजा बीर विक्रमादित्य हूं,अंबा
वती नगरीमें राज्य करता हूं. तुम्हारा नाम और यश सुनकर
दर्शनके लिये आयाथा. सो तुम्हें देखा और मेरा चित्त
प्रसन्न हुआ. तुम अच्छी तरहसे राज करो और हमें विदा दो.
तुम्हारा साहस बल धर्म हमने देखा. यह सुनतेही वह राजा
उसके पाँओंपर गिरपड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा कि—
महाराज ! बड़ा अपराध हुआ . मैंने तुम्हारा मर्म न जाना.
तुमने मेरी सेवा की सो तुम अपने जीमें कुछ न लाना. और
जैसा धर्म मैंने आपका सुनाथा वैसा ही देखा. और धन्य हैं
तुम्हारे तांई और तुम्हारे धर्म साहस और पराक्रमको.
यह कह राजाको तिलक दे विदा किया. राजा बीरोंको—बुला
सवार हो अपने नगरमें आया. इतनी बात कीर्तिवती पुतली
कहकर राजा भोजको समझाने लगी कि-सुन राजा भोज
राजा बीर विक्रमादित्यका साहस ! ऐसी वस्तु पाकर देते
कुछ बिलंब न लाया और अपने जीमें न पछताया. और जैसा
साहस राजाने किया वैसा सुनकर कोई न करता;
किस गिनतीमें है ? यह बात सुन राजा भोज चुप हो रहा
पुनि दूसरे दिनके प्रभात समयमें राजा उठ, तैयार हो, सिंहासन
पर बैठनेको गया. और मनमें इरादः बैठनेका करताथा फिर
झिझक कर रह जाताथा इतनेमे त्रिलोचनी -
तेरहवीं पुतली-
बोल उठी-सुन राजा भोज ! एक पुरातन कथा मैं तुँ
सुनाऊँ कि, इस सिंहासनपर वही चढ़ेगा, जो राजा वि
क्रमके समान पराक्रम करेगा. तब राजाने कहा-कह
सुंदरी ! बिक्रमका बल और कथा सुननेको मेराभी म
चाहता है. पुतली बोली-राजा ! कान देके सुन' एक दिन राज
बीर विक्रमादित्य शिकार खेलनेको चला. और साथमें जित
मुसाहिब रजपूत बली थे वेभी सजकर तैयार हो आये और ए
एककी सवारीमें हजार हजार कोसके धावेका तुरंग था. राजा अप
घोड़ेपर सवार था. और बह गोया छलावा था. राजकुमार अपने
शिकारी जानवर बाज, बहरी, जुर्रा, शाहीन, कूही, करगा
भँगवा भँगवा अपने अपने हाथोंपर ले ले साथ हुए अ
( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी.
राजानेभी एक बाज अपने हाथपर बिठा लिया. मीरशिकारोंके
हुक्म पहुँचा कि, जिस जिसके पास जो जो शिकारी जानवर
तैयार हैं सो लेकर रिकाबमें हाजिर होवें. इस तरह बन उसने
एक बनकी राहली और वहां जाकर किसीने बाज और
किसीने बहरी और किसीने कुही, किसीने शाईन उड़ाई और
अपने अपने जानवरोंके पीछे घोड़े बढ़ाये. और उधर राजा-
नेभी जितने मीर शिकार थे उन्हें हुक्म किया कि, इस जंगलमे
सब शिकार करो, मैं तमाशा देखूंगा. जो शिकार कर लावेगा
वह इनाम पावेगा. और जो शिकार न कर लावेगा सो नौक-
रीसे दूर होवेगा. यह बात सुनतेही जितने मीरशिकार थे उन
सबोंने उस बनमें चारों तरफ जानवर छोड़े और उधर हुकुम
बहेलियोंको किया कि, तुमभी शिकार करो. इस तरह सब
शिकार करते थे और लालाके राजाको गुजराते थे वह खडा
तमाशा देख रहथा. फिर उसने एक मरिंदापर बाज उड़ाया
और आप उसके पीछे लगा. जिधर जिधर वह बाज जाताथा
राजाभी पीछा किये जाताथा. इसमें कोसों निकल गया. देखो
तो शाम होगई तब याद आई और फिरकर पीछे देखा तो
वहां कोई आदमी नज़र न आया. और वह तमाम फौज राजाकी
शाम हुएपर राजाको ढूँढ़ शिकार लेले आनकर नगरमें दाखिल
हुई और वहां सूने जंगलमें राजा भटकता फिरता था. कहीं रहा