सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

कहकर राजा भोजको समझाने लगी कि-सुन राजा भोज
राजा बीर विक्रमादित्यका साहस ! ऐसी वस्तु पाकर देते
कुछ बिलंब न लाया और अपने जीमें न पछताया. और जैसा
साहस राजाने किया वैसा सुनकर कोई न करता;
किस गिनतीमें है ? यह बात सुन राजा भोज चुप हो रहा
पुनि दूसरे दिनके प्रभात समयमें राजा उठ, तैयार हो, सिंहासन
पर बैठनेको गया. और मनमें इरादः बैठनेका करताथा फिर
झिझक कर रह जाताथा इतनेमे त्रिलोचनी -

तेरहवीं पुतली-

बोल उठी-सुन राजा भोज ! एक पुरातन कथा मैं तुँ
सुनाऊँ कि, इस सिंहासनपर वही चढ़ेगा, जो राजा वि
क्रमके समान पराक्रम करेगा. तब राजाने कहा-कह
सुंदरी ! बिक्रमका बल और कथा सुननेको मेराभी म
चाहता है. पुतली बोली-राजा ! कान देके सुन' एक दिन राज
बीर विक्रमादित्य शिकार खेलनेको चला. और साथमें जित
मुसाहिब रजपूत बली थे वेभी सजकर तैयार हो आये और ए
एककी सवारीमें हजार हजार कोसके धावेका तुरंग था. राजा अप
घोड़ेपर सवार था. और बह गोया छलावा था. राजकुमार अपने
शिकारी जानवर बाज, बहरी, जुर्रा, शाहीन, कूही, करगा
भँगवा भँगवा अपने अपने हाथोंपर ले ले साथ हुए अ