सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
इक्कीसवीं पुतली-
( १२८ ) सिंहासनबत्तीसी.
इक्कीसवीं पुतली-
बोली-हे राजा ! क्या तू अपनी बड़ाई करता है ? और
इस अनीतिकी कौनसी बड़ाई है ? पहले मुझसे बात
सुन के पीछे उसपर बैठ, माधवनाम एक बड़ा गुणी
ब्राह्मणथा. उसकी तारीफहो नहीं सकती जो मैं करूं
वह योगी होकर तमाम पृथ्वीमें फिर कर आया कहीं ठहरकर रहने
न पाया. मानो वह कामदेवकाही अवतार था, स्त्री देखतेही उसे मोहित
हो जाती थी. ए राजा ! वह सब विद्या पढ़ा था और अति चतुर
था. मर्त्यलोकमें वैसे मनुष्य कम पैदा होते हैं. जिस राजाका
सेवा करनेको जाता था वहां पहले तो उसका आदर मान होता था
और जब वह अपने गुणको प्रकाश करता तब वह राजा उसकी
देशसे निकाल देता. इस तरहसे देश देश भटकता दुःख पाता फि
रताथा. कई एक दिनमें वह कामा नगरीमें आन पहुँचा, उस नग-
रीका राजा कामसेन नाम था. उसके यहां कामकंदला नाम एक
रंडी थी. वह गोया उर्वशीकाही अवतार थी. गंधर्वविद्यामें वह
चतुर थी. माधवभी उसी राजाके द्वारपर जा पहुँचा. द्वारपालोंसे
कहा राजाको जाकर हमारा समाचार कहो, आपके दर्शनको
एक ब्राह्मण आया है. ड्योढ़ीदार उसकी बात सुनी अन-
सुनी करगया. वह ब्राह्मण वहीं बैठ गया. ज्यो ज्यो वहांसे मृदं-
गवा आवाज और गानेकी ध्वनि आती थी, त्यों त्यों यह शिर
धुन २ कर कहताथा कि, राजा भी मूर्ख है और उसकी सभा
भी मूखोंकी है जो बिचार नहीं करती. यही बात पांच सात दफे
कही. द्वारपाल खफा हो ब्राह्मणको देख राजाके डरो कुछ
कह तो न सके पर राजाके सम्मुख जा हाथ जोडकर खडे
हुए. महाराजने जो उनकी तरफ देखा तब उन्होंने
विनती करके कहा कि,-महाराज ! द्वारपर एक ब्राह्मण विदेशी
दुर्बल आन बैठा है! शिर डुला डुलाकर बैठा है और कहता
है कि, वह राजा और उसकी सभाके लोग अति मूर्ख हैं,
जो गुण विचार नहीं करते. तब राजाने उन द्वारपालोंसे कहा
कि, जाकर उसे पूछो उनको मूर्ख तूने किस लिये कहा ? उन्होंने
राजाके आज्ञा पाय पौरपर आय ब्राह्मणसे पूछा-महाराजने
आज्ञा की है कि, उनके गुणमें दोष कौनसा है ? वह तुम बताओ
तो हम तुम्हारी बात सच जाने. उसने कहा-बारह आदमी
चार चार तीन तरफमें खडे हुए जो मृदंग बजाते हैं
तिनमेंसे पूर्व मुखवालोंमें एक मृदंगीके अँगूठा नहीं है इसके
समपर थाप हलकी पडती है इससे मैने सबको झूठ कहा
है. न मानो तो तुम जाकर यह सच है या नहीं सो देखो वे
दौडे हुये राजाके पास आये और सब बाते राजासे सुनाई.
तब राजाने पूर्वमुखके चारों मृदंगियोंको बुला एक एकका
हाथ देखलिया उनमें एकका अँगूठा मोमका बनाकर
लगाया गयाथा, यह तमाशा राजा देख बहुत प्रसन्न हुआ और
ब्राह्मणको ऊपर बुलाया, वह जाकर सम्मुख हुआ तब राजाने
दंडवत् किया और उसने आशीष दी. फिर शिष्टाचार कर
गद्दीपर बिठाया, जैसे वस्त्र आभूषण आप पहने थे वैसेही
मँगवाकर ब्राह्मणको पहनाये और कामकंदलाको बुलाकर
आज्ञा की कि, यह महागुणी है इसलिये इसके आगे अपना गुण
तू प्रकाश कर कि जिससे यह प्रसन्न होवे. कामकंदला राजाकी
आज्ञा पाय अपना गुण जाहीर करने लगी. उसने संगीत
नृत्यका आरंभ किया. रंगके सीसे भरे हुए सीसपर धर मुँहसे
मोती पिरोती हुई हाथोंसे बले उछालती हुई और सब साज
स्वर मिलाये हुई नाचती थी. इसमें फूलोंकी और अतरकी
खुशबू पाकर एक भौंरा उडता हुआ आकार उसके कुचकी
विटनीपर बैठा और डंक मारा, उसके बदनमें पीर हुई
तब बिचारा कि, जो कुछभी हरकत करती हूं तो तालभंग
होगा और मेरे गुणकी हँसी हो जायगी. इतना जीमें सोच भें-
डार बिचारकर श्वास कुचकी राह निकाली. पवन लगतेही वह
भौंरा उड़गया. तब माधव उस गुणको देखतेही मोहित होकर
बोला कि,-हे सुंदरी ! धन्य है तुझे और तेरे करतबको. यह
कहके प्रसन्न होकर वस्त्र और आभूषण जो राजाने दियेथे वह
सब उतार उसको दिये यह देख राजा और मंत्री आपसमें
कहने लगे कि, देखो इस ब्राह्मणने क्या मूर्खता की है. इस
वेश्याको ये कपडे और तमाम जबाहिर एक आनमें बख्स दिया
यह जातका भिखारी यहा हमारे आगे सखावत दिखाता है.
तब राजाने खफा हो ब्राह्मणसे पूँछा कि-तू इसके किस गुणपर
रीझा वह मेरे आगे बयान कर. ब्राह्मणने कहा-सुन, राजा ! तूभी
मूर्ख है और तेरी सभाभी मूढ है. तेरी सभामें यह ऐसा गुण
प्रकाश करे सोभी कोई नहीं जानता; क्योंकि इसके कुचपर भौंरा
आन बैठाथा सो इसने अपनी श्वास रोक कुचकी राह निकाल
उसे उड़ा दिया. यह इसका चतुरताका काम देख सब कुछ
मैंने इसे बख्स दिया. माधवने जब यह बात कही तब राजा
लज्जित हो बोला कि-इसी समय मेरे नगरसे निकलजा
अब जो सुनूँगा कि तू इस नगरमें है तो मैं बँधवाकर दरियामें
डूबा दूंगा, तब माधवने कहा, महाराज ! मुझसे ऐसा क्या-
अपराध हुआ है ? जो आप मुझे देशसे निकाले देते हो. राजाने
कहा, मैंने जो कुछ तुझे दियाथा सो तूने मेरेही आगे दान कर
दिया. क्या मेरे पास देनेको कुछ तुझे न था, जो तूने दिया ? यह
सुनकर माधव मनमें मलीन हो राजसभासे निकल बाहर जा
एक वृक्षके नीचे व्याकुल खडा होकर अपने जीमें कहने
लगा कि, माता बेटेको विष दे और पिता पुत्रको बेंचे और
राजा सर्वस्व ले तो कोई शरण किसकी ले ? फिर कहने लगा
( १३२ ) सिंहासनबत्तीसी.
कि, राजाने मुझे निकाला अब मैं कहा रहूं, यों अनेक भाँतिकी
चिंताकर कामकंदलाका नाम लैले रोताथा. और इधर काम
कंदलाभी राजासे बहना करके बिदा हुई और एक आदमी
दौड़ाया कि यह ब्राह्मण बाहर जाने न पावे उसे ढूंढ ले
जाकर मेरे मकानमे बिठा, वह आदमी गया और ब्राह्मणको
ले जाकर कामकंदलाके मंदिरमे बिठा दिया. इधरसे यह भी
तुरत जा पहुंची. और वह दोनों आपसमें बैठकर प्रेमकी बाते
करने लगे तब उस ब्राम्हणने कहा-मुझे राजाने देशसे निकाल
दिया है और तूने अपने घरमे बुला बिठलाया; जो यह बात
राजा सुनेगा तो मेरा प्राण पहिलेही जायगा. इससे में तो
दुःखसे छुटूंगा पर तुझेभी राजा अतिकष्ट देगा इसमें ऐसी
बात करनी उचित नहीं है कि अपनी तो जान जाय और
जगमें हँसाई होय इसवास्ते प्रेम जो है सो दुःखकी खान
है, जिसने प्रेमके पँडेमें पाँव दिया उसने कभीही सुख न पाया.
ये बातें माधवके मुखसे सुनकर कामकंदलाने कहा कि, अब
तो मै इस पंथमे आई जो कुछ करे सो भगवान् है इतना कह
सब साज बाज घरसे मँगवाकर अपनी विद्या जाहीर करने लगी
जितनी विद्या उसे याद थी उतनी ही जब प्रकाश कर चुकी
तब माधवने उन्हें यंत्रोंके साथ अपने पास जो गुप्त था सोही
सब प्रकाश करके दिखाया. जब रात थोडीसी रहगई तब