सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

( १२८ ) सिंहासनबत्तीसी.
इक्कीसवीं पुतली-
बोली-हे राजा ! क्या तू अपनी बड़ाई करता है ? और
इस अनीतिकी कौनसी बड़ाई है ? पहले मुझसे बात
सुन के पीछे उसपर बैठ, माधवनाम एक बड़ा गुणी
ब्राह्मणथा. उसकी तारीफहो नहीं सकती जो मैं करूं
वह योगी होकर तमाम पृथ्वीमें फिर कर आया कहीं ठहरकर रहने
न पाया. मानो वह कामदेवकाही अवतार था, स्त्री देखतेही उसे मोहित
हो जाती थी. ए राजा ! वह सब विद्या पढ़ा था और अति चतुर
था. मर्त्यलोकमें वैसे मनुष्य कम पैदा होते हैं. जिस राजाका
सेवा करनेको जाता था वहां पहले तो उसका आदर मान होता था
और जब वह अपने गुणको प्रकाश करता तब वह राजा उसकी
देशसे निकाल देता. इस तरहसे देश देश भटकता दुःख पाता फि
रताथा. कई एक दिनमें वह कामा नगरीमें आन पहुँचा, उस नग-
रीका राजा कामसेन नाम था. उसके यहां कामकंदला नाम एक
रंडी थी. वह गोया उर्वशीकाही अवतार थी. गंधर्वविद्यामें वह
चतुर थी. माधवभी उसी राजाके द्वारपर जा पहुँचा. द्वारपालोंसे
कहा राजाको जाकर हमारा समाचार कहो, आपके दर्शनको
एक ब्राह्मण आया है. ड्योढ़ीदार उसकी बात सुनी अन-
सुनी करगया. वह ब्राह्मण वहीं बैठ गया. ज्यो ज्यो वहांसे मृदं-
गवा आवाज और गानेकी ध्वनि आती थी, त्यों त्यों यह शिर