शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
घटने का निश्चय कर तदनुसार उसकी चिकित्सा करनी
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण है:
द्वादशोऽध्यायः] शोणितस्रावविधिः 273
वक्तव्य—उक्त लक्षणों को देखकर रक्त के बिगड़ने तथा
घटने का निश्चय कर तदनुसार उसकी चिकित्सा करनी
चाहिये।
वातदूषित रक्त के लक्षण
अरुणं फेनिलं रूक्षं परुषं तनु शीघ्रगम्।
अस्कन्दि सूचिनिस्तोदि रक्तं स्याद् वातदूषितम्।। 8 ।।
वायु से दूषित रक्त अरुण (कालापन लिये लाल), फेनिल
(झागवाला), रूक्ष (उचित स्निग्धता से रहित), परुष
(खरखरा), तनु (पतला), शीघ्रगामी (अधिक गतिशील),
अस्कन्दी (देर से जमने वाला) तथा सूची निस्तोदी (सुई के
चुभने की-सा पीड़ा करने वाला) होता है।
पित्तदूषित रक्त के लक्षण
पित्तेन पीतं हरितं नीलं श्यावं च विस्रकम्।
अस्कन्द्युष्णं मक्षिकाणां पिपीलानामनिष्टकम् ।। 9 ।।
पित्त से दूषित रक्त पीला हरा नाला काला दुर्गन्धियुक्त न
जमने वाला, उष्ण तथा चींटियों तथा मक्खियों का अप्रिय
होता है।
कफदूषित रक्त के लक्षण
शीतलं बहलं स्निग्धं गैरिकोदकसंनिभम्।
मांसपेशीप्रभं स्कन्दि मन्दगं कफदूषितम् ।। 10 ।।
कफ से दूषित रक्त शीत (इसमें रक्त का ताप सौ 100
डिग्री से घट जाता है), बहल (गाढ़ा), स्निग्ध (अधिक
स्निग्ध), गेरू घुले हुये जल जैसा, मांसपेशियों जैसा, शीघ्र
जमने वाला तथा मन्दगामी होता है।
द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रक्त के लक्षण
द्विदोषदुष्टं संसृष्टं त्रिदुष्टं पूतिगन्धकम्।
सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं च जायते।। 11 ।।
दो-दो दोषों से दूषित रक्त में दो-दो दोषों के सम्मिलित
लक्षण पाये जाते हैं, तीन दोषों से दूषित रक्त अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त
तथा सभी दोषों के उक्त लक्षणों से युक्त तथा काँजी जैसा
होता है।
वक्तव्य—यहाँ दो-दो दोषों का नामतः उल्लेख नहीं
किया गया है, अतः आप रक्त परीक्षणकाल में दोषों का
नाम-निर्धारण स्वयं कर लें।
विषदूषित रक्त के लक्षण
विषदुष्टं भवेच्छ्यावं नासिकोन्मार्गरं तथा।
विस्रं काञ्जिकसङ्काशं सर्वकुष्ठकरं बहु ।। 12 ।।
विष से दूषित रक्त काला, नाक से निकलने वाला,
दुर्गन्धियुक्त, काँजी जैसा, सभी प्रकार के कुष्ठों का उत्पादक
तथा मात्रा में अधिक होता है।
शुद्ध रक्त के लक्षण
इन्द्रगोपप्रभं ज्ञेयं प्रकृतिस्थमसंहतम्।
बीरबहूटी की कान्ति वाला तथा असंहत (तरल या
ग्रन्थियों से रहित) रक्त शुद्ध होता है।
वक्तव्य—यहाँ पर शुद्ध रक्त के लक्षणों की परिचायिका
एक पंक्ति इस प्रकार उपलब्ध होती है। यथा—'गुञ्जाफलसवर्णं
पद्मालक्तकसन्निभम्'। अर्थात् गुंजाफल के सदृश वर्ण वाले,
लाल कमल तथा लाक्षारस के समान वर्ण वाले रक्त को
प्रकृतिस्थ (शुद्ध) समझना चाहिये। विशेष अध्ययन के लिये
देखे-च० सू० अ० 24 तथा सु० सू० अ० 14 ।
रक्तस्राव के योग्य रोग
शोथे दाहेऽङ्गपाके च रक्तवर्णेऽसृजः स्रुतौ ।। 13 ।।
वातरक्ते तथा कुष्ठे सपीडे दुर्जयेऽनिले।
पाणिरोगे श्लीपदे च विषदुष्टे च शोणिते ।। 14 ।।
ग्रन्थ्यर्बुदापचीक्षुद्ररोगरक्ताधिमन्थेषु ।
विदारीस्तनरोगेषु गात्राणां सादगौरवे ।। 15 ।।
रक्ताभिष्यन्दतन्द्रायां पूतिघ्राणास्यदेहके।
यकृत्प्लीहविसर्पेषु विद्रधौ पिटिकोद्गमे ।। 16 ।।
कर्णौष्ठघ्राणवक्त्राणां पाके दाहे शिरोरुजि।
उपदंशे रक्तपित्ते रक्तस्रावः प्रशस्यते ।। 17 ।।
शोथ (व्रणशोथ), दाह, अंगपाक (किसी अवयव का
पाक होना) रक्तवर्ण के रक्तस्राव (लोहितस्राव में नहीं),
वातरक्त कुष्ठ पीड़ायुक्त दुःसाध्य वातरोग, पाणिरोग (बाहुरोग),
श्लीपद, विषदूषित रक्त, ग्रन्थि, अर्बुद, अपची तथा क्षुद्र
रोगों, रक्तजनित अधिमन्थ (नेत्ररोग विशेष), विदारी (प्लेग
की ग्रन्थि), स्तन रोगों की शिथिलता तथा भारीपन, रक्तजनित
अभिष्यन्द (दुःखती आँख), तन्द्रा, नाक, मुख तथा शरीर से
दुर्गन्धि आने पर, यकृत् विकार, प्लीहावृद्धि, विसर्प विद्रधि,
फुन्सियों के उत्पन्न होने, कान, ओठ, नाक एवं मुखपाक,
दाह, शिरोरोग, उपदंश तथा रक्तपित्त में रक्तस्राव कराना प्रशस्त
(हितकर) है।
वक्तव्य—उक्त पाठ में दाह शब्द दो बार आया है। अतः
एक दाह का अर्थ विदाह है, देखें—'विदाहश्चान्नपानस्थः'
च० सू० अ० 24 श्लोक 13। उक्त श्लोकों को च० सू० अ०
24 तथा सु० सू० अ० 20 में देखें।
274 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
[वाम स्तम्भ]
रक्तस्राव की विधियाँ
एषु रोगेषु शृङ्गैर्वा जलौकालाम्बुकैरपि।
अथवाऽपि शिरामोक्षैः कुर्याद् रक्तस्रुतिं नरः।। 18 ।।
उक्त रोगों में शृंग (सिंगी) से, जलौका (जोंक) से, अलाबु (तुम्बी या गिलास) से अथवा सिरावेध से रक्तस्राव करें।
किनका रक्त नहीं निकालना चाहिये
न कुर्वीत सिरामोक्षं कृशस्यातिव्यवायिनः।
क्लीबस्य भीरोर्गर्भिण्याः सूतिकापाण्डुरोगिणाम् ।। 19 ।।
पञ्चकर्मविशुद्धस्य पीतस्नेहस्य चार्शसाम्।
सर्वाङ्गशोथयुक्तानामुदरश्वासकासिनाम् ।। 20 ।।
छर्द्यतीसारदुष्टानामतिस्विन्नतनोरपि ।
ऊनषोडशवर्षस्य गतसप्ततिकस्य च ।। 21 ।।
आघातस्रुतरक्तस्य शिरामोक्षो न शस्यते।
एषां चात्यायिके रोगे जलौकाभिस्तु निर्हरेत् ।। 22 ।।
तथा च विषदुष्टानां शिरामोक्षोऽपि शस्यते।
निम्नलिखित व्यक्तियों का शिरावेध (शिरामोक्ष) नहीं करना चाहिये-कृश, अतिमैथुनशील, नपुंसक, भीरु (डरपोक), गर्भवती, प्रसूता, पाण्डुरोगी जो पञ्चकर्म (वमन, विरेचन, नस्य, निरूहण, अनुवासन) से शुद्ध हो चुका है जिसने स्नेहपान किया है, जो अर्शारोग, सर्वाङ्गशोथ, उदररोग, श्वास, कास, कै एवं अतिसार से पीड़ित हो, जिसको अत्यन्त स्वेदन हो चुका हो, जिसकी अवस्था सोलह से कम और सत्तर से अधिक हो और जिसका चोट लगने के कारण रक्त निकल गया हो। यदि इन रोगियों का रक्त निकालना अत्यन्त आवश्यक हो तो इनका रक्त जोंक से निकालना चाहिये और यदि ये लोग विष से पीड़ित हों तो ‘सिरावेध’ भी प्रशस्त है।
**वक्तव्य—**जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि उक्त व्यक्तियों का ‘सिरावेध’ करना उचित नहीं है, तथापि विशेष परिस्थत में इनका भी जोंक द्वारा रक्त निकाला जा सकता है और विष-विकारों में तो सिरामोक्ष भी किया जा सकता है।
रक्तस्रावण यन्त्र
गोशृङ्गेण जलौकाभिरलाबुभिरपि त्रिधा ।। 23 ।।
वातपित्तकफैर्दुष्टं शोणितं स्रावयेद् बुधः।
द्विदोषाभ्यां तु सन्दुष्टं त्रिदोषैरपि दूषितम् ।। 24 ।।
शोणितं स्रावयेद् युक्त्या शिरामोक्षैः पदैस्तथा।
विद्वान् चिकित्सक वायु से दूषित रक्त को गोशृंग (सिंगी)...
[दक्षिण स्तम्भ]
...से, पित्त से दूषित रक्त को जोंक से तथा कफ से दूषित रक्त को अलाबु (तुम्बी) से निकालें और द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रोगियों का युक्तिपूर्वक सिरामोक्ष अथवा पद (पच्छ) से रक्तस्राव करें।
शृंग आदि द्वारा रक्तस्रावण
गृह्णाति शोणितं शृङ्गं दशाङ्गुलमितं बलात् ।। 25 ।।
जलौका हस्तमात्रं तु तुम्बी च द्वादशाङ्गुलम्।
पदमङ्गुलमात्रस्य शिरा सर्वाङ्गशोधिनी ।। 26 ।।
शृंग (सिंगी) दस अंगुल तक के रक्त को, जोंक एक हाथ (24 अंगुल) तक के रक्त को, तुम्बी बारह अंगुल तक के रक्त को तथा पद (पच्छ) एक अंगुल तक के रक्त को निकाल देता है और सिरावेध सम्पूर्ण शरीर को शुद्ध कर देता है अर्थात् सम्पूर्ण शरीर के अशुद्ध रक्त को निकाल देता है।
**वक्तव्य—**रक्तस्राव के सिंगी, जोंक, तुम्बी आदि साधनों द्वारा शरीर के उन-उन अवयवों से जो रक्तविकार से पीड़ित हैं रक्त निकलवाना चाहिये और सम्पूर्ण शरीरगत रक्तविकार ये सिरावेध कराना आवश्यक है। शरीर के भीतरी अवयवों (हृदय, मस्तिष्क आदि) जिनमें उक्त साधन प्रयुक्त नहीं किये जा सकते हैं, उनमें सिरावेध का ही प्रयोग करना चाहिये।
रक्तस्राव के अयोग्य काल एवं रोगी
शीते निरन्ने मूर्च्छायां तन्द्राभीतिमदश्रमौः।
युतानां न स्रवेद् रक्तं तथा विण्मूत्रसङ्गिनाम् ।। 27 ।।
शीतकाल में, भोजन न करने पर अर्थात् भूखे मनुष्य का, मूर्च्छा में और तन्द्रा, भय, मद तथा श्रम (थकावट) से युक्त मनुष्यों का, पुरीष तथा मूत्र के निरोध से पीड़ित मनुष्यों का रक्त उचित रूप से नहीं निकलता है।
रक्तस्रावकारक उपाय
अप्रवर्तितरक्ते च कुष्ठत्रिकटुसैन्धवैः।
मर्दयेद् व्रणवक्त्रं च तेन सम्यक् प्रवर्तते ।। 28 ।।
यदि उचित रूप से रक्तस्राव न हो तो व्रण (घाव जो कि रक्तस्राव कराने के लिए किया गया है) के मुख को कूठ, त्रिकटु एवं सेंधा नमक के चूर्ण से मर्दन करें। ऐसा करने से रक्त भली-भाँति निकलने लगता है।
रक्तस्राव का समय
तस्मान्न शीते नात्युष्णे न स्विन्ने नातितापिते।
पीत्वा यवागूं तृप्तस्य स्रावयेच्छोणितं बुधः।। 29 ।।
इसलिए न शीतकाल, न अत्यन्त उष्णकाल, न स्वेदन...
द्वादशोऽध्यायः] शोणितस्रावविधिः 275
होने पर और न ही शरीर के अत्यन्त सन्तप्त होने पर रक्तस्राव
कराना उचित है। इससे विपरीत दशा में भी 'यवागू' पिलाकर
रक्तस्राव कराना चाहिये।
रक्तातिस्राव-परिहार
अतिस्विन्नस्योष्णकाले तथैवातिशिराव्यधात्।
अतिप्रवर्तते रक्तं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम्।।३०।।
अत्यन्त स्वेदन होने पर तथा उष्णकाल में तथा सिरा के
अधिक कट जाने से रक्त अधिक निकलने लगता है। ऐसी
स्थिति में निम्नलिखित प्रतिकार (उपाय) करना चाहिये।
रक्त की अतिप्रवृत्ति में चिकित्सा
अतिप्रवृत्ते रक्ते च लोध्रसर्जरसाञ्जनैः।
यवगोधूमचूर्णैर्वा धवधन्वन्गैरिकैः।।३१।।
सर्पनिर्मोकचूर्णैर्वा भस्मना क्षौमवस्त्रयोः।
मुखं व्रणस्य बध्वा च शीतैश्चोपचरेद् व्रणम्।।३२।।
विध्येदूर्ध्वं शिरां तां च दहेत् क्षारेण वाग्निना।
रक्त की अतिप्रवृत्ति होने पर लोध, राल और रसवत के
चूर्ण से अथवा जौ, तथा गेहूँ के चूर्ण से अथवा धाय के फल,
धामिन तथा गेरू के चूर्ण से अथवा साँप की केंचुली के चूर्ण
से अथवा रेशमी तथा सूती वस्त्र की भस्म से व्रण के मुख को
अवचूर्णित करें अर्थात् उक्त चूर्णों की व्रण पर बुरक दें अथवा
व्रण पर कपड़े की गद्दी रखकर बाँध दें अथवा शीतद्रव्यों
(शीतल जल तथा बर्फ आदि) से उपचार करें अथवा (इतने
पर भी रक्त न रुके तो) उसी। को थोड़ी दूर ऊपर से वेध दे
अथवा क्षार से या अग्नि से सिरा का दाह कर दें।
रक्त्तरोधन के उपाय
व्रणं कषायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम्।।३३।।
व्रणास्यं पाचयेत् क्षारो दाहः सङ्कोचयेच्छिराम्।
कषायरस (युक्त द्रव्य) व्रण का सन्धान (घाव को बन्द)
कर देता है, शीत द्रव्य रक्त को जमा देता है, क्षार व्रण के मुख
को पका देता है और दाह शिरा को संकुचित कर देता है। इन
क्रियाओं से रक्त रुक जाता है।
अग्निदाह-विधि
वामाण्डशोथे दक्षस्य करस्याङ्गुष्ठमूलजाम्।।३४।।
देहेच्छिरां व्यत्यये तु वामाङ्गुष्ठशिरां दहेत्।
शिरादाहप्रभावेण मुष्कशोथः प्रणश्यति।।३५।।
विषूच्यां पार्ष्णिदाहेन जायतेऽग्नेः प्रदीपनम्।
सङ्कुचन्ति यतस्तेन रसश्लेष्मबहाः शिराः।।३६।।
यदा वृद्धिर्यकृत्प्लीह्नोः शिशोः सञ्जायतेऽसृजः।
तदा तत्स्थानदाहेन सङ्कुचन्त्यसृजः शिराः।।३७।।
अण्डवृद्धि वाले रोगी के यदि बायें अण्डकोश में सूजन
हो तो दाहिने हाथ के अँगूठे के मूल की शिरा पर और यदि
दाहिने अण्डकोश में सूजन हो तो बायें अँगूठे के मूल की
शिरा पर दाहकर्म करें। सिरादाह के प्रभाव से शीघ्र ही
अण्डकोश का शोथ नष्ट हो जाता है। विसूची (हैजा) में
पार्ष्णि (एड़ी) में दाहकर्म करने से अग्नि दीप्त हो जाती है,
क्योंकि इससे रस तथा कफ के वहने वाली सिरायें संकुचित
हो जाती हैं। जब किसी बालक के यकृत् तथा प्लीहा रक्त के
दोष से बढ़ जाते हैं तो उस स्थान (यकृत् तथा प्लीहा) पर
दाहकर्म करने से रक्तवाही सिरा सकुचित हो जाती है। जिसके
कारण यकृत् और प्लीहा भी संकुचित होकर अपने वास्तविक
रूप को धारण कर लेते हैं।
वक्तव्य-आजकल बड़े-बड़े नगरों में चिकित्सा करने
वाले पढे-लिखे चिकित्सक भी दाह कर्म को नहीं कर रहे
हैं। उन्हें चाहिये कि चिकित्साशास्त्र के इस महत्त्वपूर्ण एवं
सुप्रसिद्ध कर्म को पुनः प्रारम्भ कर आयुर्वेद की इस देन का
यथासम्भव प्रचार करें। हर्ष का विषय है कि देहातों में रहने
वाले परम्परागत ग्रामीण वैद्य इस दाहकर्म को आज भी
सफलतापूर्वक करते हैं। इस अग्निकर्म को 'गुल लगाना' भी
कहते हैं। इसमें लोहे की सलाई अथवा ताँबे के पैसे अथवा
सोने की सलाई को तपाकर उचित स्थान पर लगा देते हैं,
जिससे फफोला उठता है और दो-तीन दिन में फूट कर
निकल जाता है और रोग शान्त हो जाता है। किन्तु इसके लिए
यथाविधि कर्माभ्यास अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिये। देखें-सु०
सू० अ० 12।
अधिक रक्तस्राव का निषेध
रक्ते दुष्टेऽवशिष्टेऽपि व्याधिर्नैव प्रकुप्यति।
अतः स्राव्यं सावशेषं रक्तं नातिक्रमो हितः।।३८।।
आन्ध्यमाक्षेपकं तृष्णां तिमिरं शिरसो रुजम्।
पक्षाघातं श्वासकासौ हिक्कां दाहं च पाण्डुताम्।।३९।।
कुरुतेऽतिस्रुतं रक्तं मरणं वा करोति च।
दूषित रक्त के कुछ अवशिष्ट रह जाने पर भी व्याधि का
प्रकोप (वृद्धि) नहीं होता है, इसलिये सावशेष (कुछ शेष
रखकर) रक्तस्राव कराना उचित होता है, क्योंकि रक्तस्राव
विधि में अतिक्रम (अतियोग) हितकर नहीं होता। रक्त के
276 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
[header]
276 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
[/header]
[बायाँ स्तम्भ]
अधिक निकल जाने से अन्धापन, आक्षेपक, तृष्णा, तिमिर
(धुन्ध), शिरोरोग, पक्षावात, श्वास कास, हिक्का, दाह एवं
पाण्डुरोग उत्पन्न हो सकता है अथवा मृत्यु भी हो जाती है।
वक्तव्य- रक्त को निकालते समय इस बात का ध्यान
रखना चाहिये कि वह मात्रा से अधिक न निकले। यदि थोड़ा
शेष भी रह जाता है, तो वह बाद में संशमन-क्रिया द्वारा शुद्ध
कर लिया जा सकता है। उसके अधिक निकल जाने पर उक्त
रोगों के होने की सम्भावना रहती है तथा मृत्यु भी हो सकती
है।
रक्त का महत्त्व
देहस्योत्पत्तिरसृजा देहस्तेनैव धार्यते।।40।।
विना तेन व्रजेज्जीवो रक्षेद् रक्तमतो बुधः।
रक्त से ही शरीर की उत्पत्ति होती है। रक्त से ही शरीर
का धारण तथा पोषण होता है। रक्त के बिना जीव भी चला
जाता है। इसलिये रक्त की रक्षा अवश्य करनी चाहिये।
वक्तव्य- महर्षि सुश्रुत ने तो रक्त को स्पष्ट शब्दों में
'जीव' कहा है। यथा-रक्तं जीव इति स्थितिः'। देखें-सु०
सू० अ० 14।
रक्तस्रावजनित दोष का प्रतिकार
शीतोपचारैः कुपिते स्रुतरक्तस्य मारुते।।41।।
कोष्णेन सर्पिषा शोथं सव्यथं परिषेचयेत्।
क्षीणस्यैणशशोरभ्रहरिणच्छागमांसजः ।।42।।
रसः समुचितः पाने क्षीरं वा षष्ठिका हिताः।
रक्त निकलने पर शीतक्रिया करने से वायु कुपित हो
जाता है, जिससे सिरावेध के व्रण में शोथ तथा पीड़ा उत्पन्न
हो जाती है। इस दशा में व्रण पर गुनगुने घृत का सेचन करना
चाहिये, इससे पीड़ा शान्त हो जाती है। क्षीण मनुष्य को
काला हरिण, खरगोश, उरभ्र (भेड़ा) हीरण तथा बकरे के
मांस का रस पीने के लिए देना चाहिये। अथवा इसमें दूध
तथा साठी के चावल भी लाभदायक होते हैं।
रक्तस्राव का फल
पीडाशान्तिर्लघुत्वं च व्याधेरुद्रेकसङ्क्षयः।।43।।
मनःस्वास्थ्यं भवेच्चिह्नं सम्यग्विस्त्रावितेऽसृजि।
उचित रूप से रक्तस्राव हो जाने पर पीड़ा की शान्ति
शरीर में लघुता, व्याधि के उद्रेक (वृद्धि या दौरा) का क्षय
और मन को स्वस्थता (उन्माद आदि मानसिक रोगों की
शान्ति) ये लक्षण होते हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
[R1] रक्तमोक्षण में अपथ्य
[R2] व्यायाममैथुनक्रोधशीतस्नानप्रवातकान् ।।44।।
[R3] एकाशनं दिवास्वप्नं क्षाराम्लकटुभोजनम्।
[R4] शोकं वादमजीर्णं च त्यजेदाबलदर्शनात् ।।45।।
[R5] इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
[R6] शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे शोणितस्त्रावविधिर्नाम
[R7] द्वादशोऽध्यायः।।12।।
[R8] रक्तस्राव के पश्चात् जब तक स्वाभाविक बल उत्पन्न न
[R9] हो जाये तब तक व्यायाम, मैथुन, क्रोध, शितिल जल से
[R10] स्नान, प्रवात, एक समय का भोजन (दिनभर में केवल दो
[R11] समय खाना चाहिये), ये दिवास्वप्न (दिन में सोना) क्षार,
[R12] अम्ल तथा कटु पदार्थों का सेवन, शोक, वाद (अधिक
[R13] बोलना) तथा अजीर्ण का परित्याग करना चाहिये।
[R14] वक्तव्य- सिरावेध का विशद वर्णन सु०शा०अ० 8 में
[R15] किया गया है। उनमें से कतिपय बातें यहाँ कही जा रही हैं।
[R16] रक्तस्राव की सभी क्रियाओं को उन लोगों के सम्पर्क में
[R17] रहकर सीखना चाहिये जो इन क्रियाओं को सदैव किया करते
[R18] हैं। यथा-सिंगी या तुम्बी का प्रयोग प्रायः नीच जाति के लोग
[R19] सफलतापूर्वक करते हैं। सिरावेध में यूनानी-पद्धति के
[R20] चिकित्सक तथा प्रच्छन (पच्छ) लगाने में भारतीय नाई अधिक
[R21] कुशल देखे जाते हैं। सिंगी लगाने वाले गाय के सींग को
[R22] भीतर से साफ करके उसके शिर में एक छोटा-सा छिद्र बना
[R23] लेते हैं। इसको उचित स्थान पर रखकर मुख से चूसते हैं,
[R24] और तत्काल उस छिद्र को मकड़ी के जाला से बन्द कर उसे
[R25] 15-20 मिनट लगा रहने देते हैं, फिर हटा लेते हैं। इसी प्रकार
[R26] रुग्ण स्थान पर सिंगियों का प्रयोग किया जाता है। इसको
[R27] कच्ची सिंगी कहा जाता है। इस सिंगी से उक्त स्थान की
[R28] दूषित वायु खींच ली जाती हैं, जिससे वातजनित पीड़ा शान्त
[R29] हो जाती है। एक पक्की सिंगी होती है, इसमें पहले कच्ची
[R30] सिंगी लगाकर उस स्थान की वायु खींचकर फिर उस स्थान
[R31] पर उस्तरा से पच्छ लगा (छील) कर इस सिंगी द्वारा रक्त
[R32] निकाल लिया जाता है।
[R33] तुम्बी प्रयोग विधि- पीड़ा युक्त स्थान पर दीपक रख
[R34] कर और उसके ऊपर तुम्बी अथवा गिलास आदि का मुख
[R35] नीचे की ओर करके उसे गरम किया जाता है। जब पर्याप्त
[R36] गरम हो जाता है तो उसे हटा देते हैं। इस विधि से भी वेदना
[R37] का शमन तथा रक्तनिर्हरण किया जाता है।
जलौका प्रयोग-जौंक को पीड़ायुक्त स्थान में लगाया
द्वादशोऽध्यायः ] शोणितस्रावविधिः 277
जलौका प्रयोग-जौंक को पीड़ायुक्त स्थान में लगाया
जाता है। वह रक्त को चूस लेती है। जिससे वेदना शान्त हो
जाती है। देखें-सु० सू० अ० 13।
सिरावेध-इसके विषय में स्मरणीय है, कि यदि मस्तक
प्रदेश की पीड़ा को शान्त करने के लिए सिरावेध करना हो तो
ग्रीवा में और कूर्पर सन्धि (कोहनी) में करना हो तो प्रगण्ड
में बन्धन देकर यह कार्य किया जाता है, जिससे सिरा उठ
जाये। उस उठी हुई सिरा का वेध कुठारिका नामक शस्त्र
(नस्तर) से कर दिया जाता है, जिससे रक्त की धार निकलने
लगती है। शल्यतन्त्र में सिरावेध को आधी चिकित्सा कहा
गया है। इसी से इस चिकित्सा के महत्त्व का आकलन किया
जा सकता है।
खेद है, कि आज आयुर्वेद के पिछड़ने में आयुर्वेद के
उपासकों का ही सबसे बड़ा हाथ है। आप ध्यान दें! जिस
प्रकार शल्यतन्त्र में 'शिरावेध' को आधी चिकित्सा कहा गया
है, अर्थात् अन्य चिकित्सा-विधियाँ एक ओर और 'शिरावेध'
एक ओर। ऐसी ही एक चिकित्सा-विधि 'दाहकर्म' भी है।
इसी प्रकार कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता ग्रन्थ के
सिद्धस्थान में 'वस्तिचिकित्साविधि' को कुछ आचार्य सम्पूर्ण
चिकित्सा तथा कुछ आधी चिकित्सा कहते हैं। किन्तु हम
आयुर्वेद के पक्षधर आज इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण
चिकित्सा-विधियों की उपेक्षा कर अपना और अपने सर्वांगपूर्ण
आयुर्वेद का उपहास करा रहे हैं। आशा है, अगली पीढ़ी इस
ओर सक्रिय ध्यान देगी।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का बारहवाँ अध्याय समाप्त ।। 12 ।।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण (transcription) दिया गया है:
त्रयोदशोऽध्यायः
नेत्रप्रसादनविधिः
[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]
नेत्ररोगनाशक उपचार
सेक आश्च्योतनं पिण्डी बिडालस्तर्पणं तथा।
पुटपाकोऽञ्जनं चैभिः कल्पैर्नेत्रमुपाचरेत् ।।1।।
निम्नलिखित सात कल्पों (विधियों) से नेत्ररोगों का
उपचार (चिकित्सा) करना चाहिये-1. सेक, 2. आश्च्योतन,
3. पिण्डी, 4. विडाल, 5. तर्पण, 6. पुटपाक तथा 7. अञ्जन।
वक्तव्य—रक्तमोक्षण, विधि का वर्णन करने के पश्चात्
अब हम नेत्ररोगों की चिकित्सा की विविध विधियों. का
वर्णन करेंगे। ऊपर कहे गये सात कल्पों का परिचय भी आगे
दिया जायेगा।
सेचन-विधि
सेकस्तु सूक्ष्मधाराभिः सर्वस्मिन्नयने हितः।
मीलिताक्षस्य मर्त्यस्य प्रदेयश्चतुरङ्गुलात्।।2।।
स चापि स्नेहनो वाते रक्ते पित्ते च रोपणः।
लेखनश्च कफे कार्यस्तस्य मात्राऽधुनोच्यते।।3।।
षड्वाक्शतैः स्नेहनेषु चतुर्भिश्चैव रोपणे।
वाक्शतैश्च त्रिभिः कार्यः सेको लेखनकर्मणि।।4।।
कार्यस्तु दिवसे सेको रात्रौ चात्ययिके गदे।
सम्पूर्ण नेत्रव्यापी (अभिष्यन्द आदि) रोगों में 'सेक' या
सेचन किया जाता है। इसकी विधि यह है—रोगी मनुष्य की
निमीलित (बन्द की हुई) आँख या आँखों पर किसी भी
उपयुक्त द्रव की सूक्ष्म धाराएँ चार अंगुल ऊपर से गिरायी
जाती हैं और वह द्रव वातज रोगों में स्नेहन, रक्तज तथा
पित्तज रोगों में रोपण तथा कफज रोगों में लेखन होना चाहिये।
अब उसकी मात्रा कही जा रही है—स्नेहन द्रवों का सेक
या सेचन छः सौ वाक्-मात्रा परिमित समय (लगभग 20
मिनट) तक, रोपण द्रवों का सेक चार सौ वाक्-मात्रा परिमित
[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]
(लगभग 15 मिनट) तक तथा लेखन द्रवा का सेक तीन सौ
वाक्-मात्रा परिमित (लगभग 10 मिनट) तक करना चाहिये।
यह सेक दिन में करना चाहिये, किन्तु अत्यन्त आवश्यकता
पड़ने पर रात्रि में भी किया जा सकता है।
वाताभिष्यन्द पर सेचन (1)
एरण्डत्वक्पत्रमूलैः शृतमाजं पयो हितम्।।5।।
सुखोष्णं सेचनं नेत्रं वाताभिष्यन्दनाशनम्।
एरण्ड की छाल अथवा पत्ते अथवा जड़ के साथ पकाया
हुआ बकरी के सुखोष्ण (गुनगुना) दूध का आँखों पर सेचन
करने से वातजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है।
वाताभिष्यन्द पर सेचन (2)
परिशेको हितो नेत्रे पयः कोष्णं ससैन्धवम्।।6।।
रजनीदारुसिद्धं वा सैन्धवेन समन्वितम्।
वाताभिष्यन्दशमनं हितं मारुतपर्यये।।7।।
शुष्काक्षिपाके च हितमिदं सेचनकं सदा।
सेंधा नमक मिश्रित बकरी का दूध अथवा हल्दी, देवदारु,
सेंधा नमक से युक्त गर्म किये हुये बकरी के दूध का सेचन
करने से 'वातविपर्यय' नामक नेत्ररोग में लाभ होता है। यह
वायु के अभिष्यन्द को शान्त करता है और 'शुष्काक्षिपाक'
नामक नेत्ररोग में भी उक्त सेचन सर्वदा हितकर होता है।
वाताभिष्यन्द सेचन (3)
साबरं मधुकं तुल्यं घृतभृष्टं सुचूर्णितम्।।8।।
छागीक्षीरे घृतं सेकात् पित्तरक्ताभिघातजित्।
लोध अथवा मुलेठी को समान भाग में लेकर चूर्ण बनाकर
उसे घी में भूनकर बकरी के दूध में भिगा दें, थोड़ी देर (2-3
घण्टा) के बाद मलकर दूध छान लें। इस दूध का सेचन करने
से पित्त तथा रक्त का अभिष्यन्द रोग नष्ट हो जाता है।
त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 279
रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1)
त्रिफलालोध्रयष्टीभिः शर्कराभद्रमुस्तकैः ।। 9 ।।
पिष्टैः शीताम्बुना सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः ।
त्रिफला, लोध, मुलेठी, खाँड तथा नागरमोथा को पीसकर जल में भिगा दें, फिर जल को छानकर आँखों पर सेक करें। उससे रक्तजनित अभिष्यन्द का नाश हो जाता है।
रक्ताभिष्यन्द सेचन (2)
लाक्षामधुकमञ्जिष्ठालोध्रकालानुसारिवाः ।। 10 ।।
पुण्डरीकयुतः सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः ।
लाख, मुलेठी, मजीठ, लोध, कालीसारिवा तथा कमल इन द्रव्यों को पीसकर जल में भिगा दें, फिर छानकर सेक करें। इससे भी रक्तजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है।
वक्तव्य-उक्त योगों का प्रयोग दुःखती हुई आँखों पर करना चाहिये। ये योग आश्चर्यजनक लाभ करते हैं।
नेत्रशूलनाशक योग
श्वेतलोध्रं घृते भृष्टं चूर्णितं पटविस्रुतम् ।। 11 ।।
उष्णाम्बुना विमृदितं सेकाच्छूलघ्नमम्बके ।
सफेद लोध को घी में भूनकर चूर्ण बनायें, फिर उष्ण जल में भिगोकर और मलकर कपड़े से छान लें। इस जल का आँख पर सेक करने से नेत्रशूल नष्ट हो जाता है।
आश्च्योतन-विधि
अथाश्च्योतनकं कार्यं निशायां न कथञ्चन ।। 12 ।।
उन्मीलितेऽक्षिणि दृङ्मध्ये बिन्दुभिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् ।
बिन्दवोऽष्टौ लेखनेषु स्नेहने दश बिन्दवः ।। 13 ।।
रोपणे द्वादश प्रोक्तास्ते शीते कोष्णरूपिणः ।
उष्णे च शीतरूपाः स्युः सर्वत्रैवैष निश्चयः ।। 14 ।।
रात्रि में आश्च्योतन कभी नहीं करना चाहिये। आश्च्योतन की विधि-उन्मीलित (खुली हुई) आँख में दृष्टि के मध्य में दो अंगुल ऊँचे से औषध द्रव की बूँदें टपकायी जाती हैं। बिन्दुओं की संख्या इस प्रकार है। यथा-लेखन द्रवों की आठ बूँदें, स्नेहन द्रवों की दस बूँदें और रोपण द्रवों की बारह बूँदें आँख में टपकानी चाहिये। शीतकाल में उक्त द्रवों को गुनगुना तथा उष्णकाल में शीतल करके डालना उचित है। यह सर्वसम्मत निश्चय है।
वातादि भेद से आश्च्योतन
वाते तिक्तं तथा स्निग्धं पित्ते मधुरशीतलम् ।
तिक्तोष्णरूक्षं च कफे क्रमादाश्च्योतनं हितम् ।। 15 ।।
वातजनित नेत्ररोगों में तिक्त एवं स्निग्ध, पित्तज नेत्ररोगों में मधुर एवं शीतल तथा कफज रोगों में तिक्त, उष्ण एवं रूक्ष द्रव्यों का आश्च्योतन लाभदायक होता है।
आश्च्योतन का धारण काल
आश्च्योतनानां सर्वेषां मात्रा स्याद्वाक्शतं हिता ।
निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्योश्छोटिकाऽथवा ।। 16 ।।
गुर्वक्षरोच्चारणं वा वाङ्मात्रेयं स्मृता बुधैः ।
सभी प्रकार के आश्च्योतनों की मात्रा (धारणकाल) सौ वाक् परिमित (लगभग 4 मिनट) होती है। आँख का निमेषोन्मेष (बन्द करके खोलना) अथवा चुटकी बजाना अथवा गुरु (दीर्घ स्वर वाले) अक्षर का उच्चारण करना एक 'मात्रा' मानी जाती है।
आश्च्योतन के योग ( 1 )
बिल्वादिपञ्चमूलेन बृहत्येरण्डशिग्रुभिः ।। 17 ।।
क्वाथ आश्च्योतने कोष्णो वाताभिष्यन्दनाशनः ।
बेल आदि पंचमूल (बेल, अरणी, सोनापाठा, पाढ़ल तथा गम्भार की छाल) तथा वनभण्टा, एरण्ड तथा सहजन का क्वाथ बनायें और गुनगुना होने पर आँख में टपकायें। यह वातजनित अभिष्यन्द को नष्ट करता है।
आश्च्योतन के योग ( 2 )
अम्बुपिष्टैर्निम्बपत्रैस्त्वचं लोध्रस्य लेपयेत् ।। 18 ।।
प्रताप्य वह्निना पिष्ट्वा तद्रसो नेत्रपूरणात् ।
वातोत्थं रक्तपित्तोत्थमभिष्यन्दं विनाशयेत् ।। 19 ।।
नीम के पत्तों को जल में पीसकर लोध की गीली या हरी छाल पर लेप कर दें, फिर उसे अग्नि में तपाकर और पीसकर रस निकाल लें। यह रस आँख में डालने से वातज, रक्तज तथा। पित्तज अभिष्यन्द नष्ट होता है।
आश्च्योतन के योग ( 3 )
त्रिफलाश्च्योतनं नेत्रे सर्वाभिष्यन्दनाशनम् ।
स्त्रीस्तन्याश्च्योतनं नेत्रे रक्तपित्तानिलार्तिजित् ।। 20 ।।
क्षीरसर्पिर्घृतं वापि वातरक्तरुजं जयेत् ।
त्रिफला के रस का आश्च्योतन सभी प्रकार के अभिष्यन्दों को नष्ट करता है। स्त्री के दूध का आश्च्योतन रक्त, पित्त तथा वायु की पीड़ा को जीतता है। कच्चे दूध से निकाला हुआ घी अथवा दही से निकाला हुआ घी वातरक्त की पीड़ा को जीतता है।
280 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
[बायाँ स्तम्भ]
पिण्डिकाविधान
पिण्डी कवलिका प्रोक्ता बध्यते पट्टवस्त्रकैः ॥२१॥
नेत्राभिष्यन्दयोग्या सा व्रणेष्वपि निबध्यते ।
अभिष्यन्देऽधिमन्थे च सञ्जाते श्लेष्मसम्भवे ॥२२॥
स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य शिरस्तीक्ष्णैर्विरेचयेत् ।
अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्छिराम् ॥२३॥
अशान्ते सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत् ।
अभिष्यन्देषु सर्वेषु बध्नीयात् पिण्डिकां बुधः ॥२४॥
पिण्डी तथा कवलिका ये दो नाम पोट्टली के हैं। इसकी
विधि यह है-औषधि के चूर्ण की रेशमी कपड़े में बाँधकर
'नेत्राभिष्यन्द' (दुखती आँख) पर प्रयुक्त किया जाता है (इस
पोट्टली को गुलाबजल अथवा जल में भिगाकर प्रयोग करते
हैं) और यह व्रणों पर भी बाँधी जाती है। कफजनित अभिष्यन्द
तथा अधिमन्थ में शिर पर स्नेहन तथा स्वेदन करके तीक्ष्ण
द्रव्यों द्वारा (नस्य देकर) शिरोविरेचन करना चाहिये और
सभी प्रकार के अधिमन्थों में मस्तक की शिरा का वेध करें।
यदि किसी प्रकार भी अधिमन्थ शान्त न हो तो भ्रू (भौंह) के
ऊपर दाह क्रिया करे और सब प्रकार के अभिष्यन्दों में पिंडी
का प्रयोग करें।
वक्तव्य-पिण्डी का प्रयोग अधिमन्थ रोग की सफल
चिकित्सा है। देहातों में आज भी चिकित्सक इसका प्रयोग
करते हैं।
पिण्डी के योग (१)
वाताभिष्यन्दशान्त्यर्थं स्निग्धोष्णा पिण्डिका भवेत्।
एरण्डपत्रमूलत्वङ्निर्मिता वातनाशिनी ॥२५॥
वातजनित अभिषन्द की शन्ति के लिए स्निग्ध तथा
उष्ण द्रव्यों की पिण्डी उपयुक्त होती है और एरण्ड के पत्ते,
मूल तथा छाल की बनायी हुई पिण्डी वातजनित
अभिष्यन्द को नष्ट कर देती है।
पिण्डी के योग (२)
पित्ताभिष्यन्दनाशाय धात्रीपिण्डी सुखावहा ।
महानिम्बफलोद्भूता पिण्डी वा पित्तनाशिनी ॥२६॥
पित्तजनित अभिष्यन्द का नाश करने के लिए आँवलों
की पिण्डी सुखद होती है और बकायन के फलों की पिण्डी
भी पित्ताभिष्यन्द को नष्ट करती है।
पिण्डी के योग (३)
शिग्रुपत्रकृता पिण्डी श्लेष्माभिष्यन्दनाशिनी ।
निम्बपत्रकृता पिण्डी श्लेष्मपित्तहरा भवेत् ॥२७॥
[दायाँ स्तम्भ]
सहजन के पत्तों का पिण्डी कफजनित अभिष्यन्द को
नष्ट करती है और नीम के पत्तों की पिण्डी कफजनित
अभिष्यन्द को हरती है।
पिण्डी के योग (४)
त्रिफलापिण्डिका प्रोक्ता नाशने श्लेष्मपित्तयोः ।
पिष्ट्वा काञ्जिकतोयेन घृतभृष्टा च पिण्डिका ॥२८॥
लोध्रस्य हरति क्षिप्रमभिष्यन्दमसृग्भवम् ।
शुण्ठी निम्बदलैः पिण्डी सुखोष्णा स्वल्पसैन्धवा ॥२९॥
धार्या चक्षुषि संयोगाच्छ्वोथकण्डूव्यथापहा ।
त्रिफला की पिण्डी कफपित्तजनित अभिष्यन्द को नष्ट
करती है और लोध्र को काँजी में पीसकर एवं थोड़े से घी में
तलकर बनायी हुई पिण्डी रक्तजनित अभिष्यन्द को शीघ्र ही
हरती है। सोंठ तथा नीम के पत्तों में थोड़ा सा नमक मिलाकर
तथा सबको पीसकर तथा गर्मकर आँख के ऊपर रखने सेजन,
खुजली तथा व्यथा का नाश होता है।
वक्तव्य-इन द्रव्यों की पोटली बाँधकर गुलाबजल अथवा
जल में भिगोकर उससे बार-बार आँखों को भिगोते रहते हैं।
इससे शीघ्र लाभ होता है।
विडालक-विधि
बिडालको बहिर्लेपो नेत्रे पक्ष्मविवर्जितः ॥३०॥
तस्य मात्रा परिज्ञेया मुखलेपविधानवत् ।
पक्ष्म (बरौनियों) को छोड़कर नेत्र के बहिर्भाग में वर्मों
(पलकों) पर जो लेप किया जाता है, उसका नाम 'बिडालक'
है। इसकी मात्रा (मोटाई तथा धारणकाल) मुखलेप के समान
ही होती है।
विडालक के योग (१)
यष्टीगैरिकसिन्धूत्थदार्वाताक्ष्र्यैः समांशकैः ॥३१॥
जलपिष्टैर्बहिर्लेपः सर्वनेत्रामयापहः।
मुलेठी, गेरू, सेंधा नमक, दारुहल्दी तथा रसवत को
समभाग लेकर और जल में पीसकर आँखों के बाहर (चारों
ओर) लेप करने से नेत्रों में होने वाले (अभिष्यन्द आदि)
सम्पूर्ण रोगों का नाश हो जाता है।
वक्तव्य-इस योग में नेत्र-चिकित्सक कपूर, हरड़ तथा
अफीम भी मिला देते हैं। यह दुखती आँखों की उत्तम
औषधि है।
विडालक के योग (२)
रसाञ्जनेन वा लेपः पथ्याविश्वदलैरपि ॥३२॥
त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 281
कुमारिकाग्निपत्रैर्वा दाडिमीपल्लवैरपि।
वचाहरिद्रानिम्बैर्वा तथा नागरगैरिकैः।। ३३।।
रसवत का लेप अथवा हरड़, सोंठ तथा तेजपत्ता का लेप
अथवा घीकुआर का गूदा तथा चीता के पत्तों का लेप अथवा
अनार के पत्तों का लेप अथवा वच, हल्दी तथा नीम के पत्तों
का लेप अथवा सोंठ और गेरू का लेप उक्त विधि से करने
पर नेत्र रोगों का नाश हो जाता है।
विडालक के योग (३)
दग्ध्वा ससैन्धवं लोध्रं मधूच्छिष्टयुते घृते।
पिष्टमञ्जनलेपाभ्यां सद्यो नेत्ररुजापहम्।। ३४।।
सेंधा नमक तथा लोध को जलाकर भस्म बना लें फिर
उसको मोममिश्रित घी में मिलाकर रख लें। इसका अञ्जन
तथा लेप शीघ्र ही नेत्र की पीड़ा को हरता है।
वक्तव्य-भस्म को भली-भाँति पीसकर और मोम को
घी में डालकर पिघला कर लेप तैयार कर लें। इसको आँख
के भीतर अंजन के रूप में तथा बाहर लेप के रूप में लगाया
जाता है।
विडालक के योग (४)
लोहस्य पात्रे सङ्घृष्टो रसो निम्बफलोद्भवः।
किञ्चिद् घनो बहिर्लेपान्नेत्रबाधां व्यपोहति।। ३५।।
लोहे की कड़ाही में नीम के पत्तों का रस डालकर घोटना
चाहिये। जब कुछ गाढ़ा हो जाये तो आँख के बाहर लेप कर
दें। यह भी नेत्र की पीड़ा को नष्ट करता है।
विडालक के योग (५)
सञ्चूर्ण्य मरिचं केशराजस्वरसमर्दनात्।
लेपनादर्मणां नाशं करोत्येष प्रयोगराट्।। ३६।।
मरिच के चूर्ण को भाँगरा के रस में पीसकर लेप
कर यह उत्तम योग सब प्रकार के अर्म रोगो का नाश करता
है।
विडालक के योग (६)
स्विन्नां भित्त्वा विनिष्पीड्य भिन्नामञ्जननामिकाम्।
शिलैलानतसिन्धूत्थैः सक्षौद्रैः प्रतिसारयेत्।। ३७।।
बरौनी पर होने वाली 'अञ्जन' नाम की फुन्सी का पहले
स्वेदन करें फिर भेदन कर निष्पीड़न करें। इसके पश्चात्
मैनसिल, इलायची, तगर तथा सेंधा नमक का चूर्ण मधु में
मिलाकर उस पर रगड़ देने से वह ठीक हो जाती है।
तर्पण-विधि
अथ तर्पणकं वच्मि नेत्रतृप्तिकरं परम्।
यदृक्षं परिशुष्कं च नेत्रं कुटिलमाविलम्।। ३८।।
शीर्णपक्ष्मशिरोत्पातकृच्छ्रोन्मीलनसंयुक्तम् ।
तिमिराजुर्नशुक्राद्यैरभिष्यन्दाधिमन्थकैः ।। ३९।।
शुष्काक्षिपाकशोथाभ्यां युक्तं वातविपर्ययैः।
तन्नेत्रं तर्पणे योज्यं नेत्ररोगविशारदैः ।। ४०।।
अब मैं 'तर्पण' की विधि का वर्णन करता हूँ, जो नेत्र
को तृप्त करने का परमोत्तम उपाय है। जो नेत्र, रूक्ष, शुष्क,
कुटिल, आविल (मलिन), जिसके बाल झड़ते हों या झड़
गये हों, जिसमें शिरोत्पात रोग हो (इस रोग से आँख की
सिरायें लाल हो जाती हैं), जो आँख कठिनता से खुलती हो,
जो तिमिर (धुन्ध), अर्जुन, शुक्र, (फूला), अभिष्यन्द,
अधिमन्थ शुष्काक्षिपाक, शोथ तथा वातविपर्यय नामक रोग
से पीड़ित हो, उसमें चतुर नेत्र-चिकित्सक का 'तर्पण' कर्म
का प्रयोग करना चाहिये।
तर्पण का निषेध
दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायासभ्रमेषु च।
अशान्तोपद्रवे चाक्षिण तर्पणं न प्रशस्यते ।। ४१।।
दुर्दिन (जिस दिन आकाश में बादल छाये हों) में,
अत्यन्त उष्ण तथा शांतिकाल में और चिन्ता, शोक तथा भ्रम
रोग से पीड़ित रोगियों की आँख में तथा आम दोष के उपद्रव
के लक्षणों से युक्त नेत्र में तर्पण का प्रयोग उचित नहीं होता है।
वक्तव्य-नेत्र रोगों के उपद्रव-नेत्र में पीड़ा का उत्पत्ति,
लालिमा, शोथ (सूजन), रगड़ लगना, चुभने की-सी पीड़ा
का होना, शूल तथा आँखों का आँसुओं से भरा रहना।
तर्पण-विधि
वातातरजोज्ञीने देशे चोत्तानशायिनः।
आधारौ माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिमण्डलौ ।। ४२।।
समौ दृढावसम्बन्धौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः।
पूरयेद् घृतमण्डेन विलीनेन सुखोदकैः ।। ४३।।
अथवा शतधौतेन सर्पिषा क्षीरजेन वा।
निमग्नान्यक्षिपक्ष्माणि यावत्स्युस्तावदेव हि।। ४४।।
पूरयेन्मीलिते नेत्रे तत उन्मीलयेच्छनैः।
धारयेद् वर्त्मरोगेषु वाङ्मात्राणां शतं बुधः ।। ४५ ।।
स्वच्छे कफे सन्धिरोगे मात्रापञ्चशतं हितम्।
शुक्ले च षट्शतं कृष्णे रोगे सप्तशतं मतम् ।। ४६।।
282 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे
282 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे
[वाम स्तम्भ / Left Column]
दृष्टिरोगेष्वष्टशतमधिमन्थे सहस्त्रकम्।
सहस्रं वातरोगेषु धार्यमेवं हि तर्पणम् ।। 47 ।।
वायु, धूप तथा धूल से रहित स्थान में रोगी को चित्त
(सीधा) लिटा दें और उसकी आँख के चारों ओर दृढ़,
बाधारहित तथा उड़द की पीठी के गोल आधार (थाले) बना
दें, फिर इसे उष्ण जल द्वारा पिघलाये हुये घी अथवा सौ बार
ये धोये हुये घृत से अथवा दूध से निकाले हुये घी से भर दें।
उक्त पदार्थ उतना ही भरना चाहिये, जितने से आँख के वाल
डूब जायें। यह द्रव आँख को बन्द कर भरना चाहिये। तत्पश्चात्
रोगी आँख को धीरे-धीरे खोलने का यत्न करें। वर्त्म (बरौनी)
के रोगों में सौ मात्रा (3-4 मिनट), कफ के रोगों में अथवा
सन्धि के रोगों में पाँच सौ मात्रा (15-20 मिनट), शुक्ल
भाग के रोगों में छः सौ मात्रा कृष्णभाग के रोगों में सात सौ
मात्रा, दृष्टि रोगों में आठ सौ तथा अधिमन्थ तथा वायु के
रोगों में एक हजार मात्रा परिमित समय तक तर्पण को धारण
करना चाहिये।
तर्पण के पश्चात् कर्म
स्विन्नेन यवपिष्टेन स्नेहवीर्य्येरितं ततः।
यथास्वं धूमपानेन कफमस्य विशोधयेत् ।। 48 ।।
तर्पण के पश्चात् स्नेह की शक्ति से बढ़े हुये कफ को
गर्म की हुई जौ की पीठी (जौ के आटे को जल से सानकर
और गर्मकर बनायी हुई पीठी) के उबटन से अथवा धूमपान
से शोधन कर दें।
तर्पणकाल तथा सम्यक् तर्पण का लक्षण
एकाहं वा त्र्यहं वापि पञ्चाहं चेष्यते परम्।
तर्पणे तृप्तिलिङ्गानि नेत्रेष्वेतानि भावयेत् ।। 49 ।।
सुखस्वप्नावबोधत्वं विशदं वर्णपाटवम्।
निवृत्तिर्व्याधिशान्तिश्च क्रियालाघवमेव च ।। 50 ।।
तर्पण का प्रयोग एक दिन तीन दिन अथवा पाँच दिन
तक करना चाहिये और तर्पण करने से ये 'तृप्ति लक्षण'
उत्पन्न हो जाते हैं। यथा-सुख से नींद आना तथा अवबोध
(जागना) होना, आँख में विशदता (चिपचिपाहट न रहना),
व्रण स्थान का स्वाभाविक हो जाना, रोग की ओर से निश्चिन्त
हो जाना, व्याधि का शान्त हो जाना और नेत्र की क्रिया में
लघुता (देखने की शक्ति का प्राप्त होना)।
वक्तव्य— जब तक उक्त लक्षण उत्पन्न न हो जायें तब
तक तर्पण का प्रयोग करते रहें।
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
अतितर्पण-हीनतर्पण तथा उनका उपचार
अथ साश्रु गुरु स्निग्धं नेत्रं स्यादतितर्पितम्।
रूक्षमस्राविलं रुग्णं नेत्रं स्याद्धीनतर्पितम् ।। 51 ।।
रूक्षस्निग्धोपचाराभ्यामेतयोः स्यात् प्रतिक्रिया।
तर्पण के अतियोग से नेत्र अश्रुयुक्त, भारी तथा स्निग्ध
हो जाते हैं और हीनयोग से रूक्ष, आँसुओं से व्याप्त तथा
रुग्ण (रोगी) हो जाते हैं। इन दोनों का प्रतिकार क्रमशः रूक्ष
तथा स्निग्ध चिकित्सा-विधियों द्वारा करना चाहिये।
पुटपाक-विधि
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पुटपाकस्य साधनम् ।। 52 ।।
द्वौ बिल्वमात्रौ मांसस्य पिण्डौ स्निग्धौ सुपेषितौ।
द्रव्याणां बिल्वमात्रं तु द्रवाणां कुडवो मतः ।। 53 ।।
तदेकस्थं समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम्।
पुटपाकेन तत् पक्त्वा गृह्णीयात् तद् रसं बुधः ।। 54 ।।
तर्पणोक्तविधानेन यथावदुपचारयेत्।
दृष्टिमध्ये निषेच्यः स्यान्नित्यमुत्तानशायिनः ।। 55 ।।
इसके पश्चात् 'पुटपाक' का साधन कहा जाता है। दो
पल मांस लेकर उसे पीसकर पिण्ड बना लें और उपयोगी
द्रव्य एक-एक पल लेकर उनको भी पीस लें। फिर दोनों को
एक साथ मिलाकर पत्तों से लपेट दें, तत्पश्चात् पुटपाक की
विधि से पकाकर उसका रस निचोड़ लें, फिर इस रस को
तर्पण की विधि से थाला बनाकर प्रयोग करें अथवा चित्त
लिटाये हुये रोगी का आँख प्रतिदिन निषेचन (सेक) करें।
पुटपाक के भेद
स्नेहनो लेखनश्चैव रोपणश्चेति स त्रिधा।
हितः स्निग्धोऽतिरूक्षस्य स्निग्धस्यापि हि लेखनः ।। 56 ।।
दृष्टेर्बलार्थमितरः पित्तासृग्व्रणवातनुत्।
पुटपाक तीन प्रकार का होता है— 1. स्नेहन (स्निग्ध
करने वाला), 2. लेखन (रूक्ष करने वाला) और 3. रोपण
(आँख के व्रणों को भरने वाला)। अतिरूक्ष नेत्र में स्नेहन,
अतिस्निग्ध में लेखन, दृष्टि का बलवर्द्धन करने तथा पित्त
एवं रक्त के व्रणों को नष्ट करने के लिए रोपण पुटपाक का
प्रयोग करें।
पुटपाक के योग
सर्पिर्मांसवसामज्जामेदःस्वाद्वौषधैः कृतः ।। 57 ।।
स्नेहनः पुटपाकस्तु धार्यो द्वे वाक्शते दृशोः।
जाङ्गलौनां यकृन्मांसैर्लेखनद्रव्यसंयुतैः ।। 58 ।।
त्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 283
[ बायाँ स्तम्भ ]
कृष्णालोहरजस्ताम्रशङ्खविद्रुमसिन्धुजैः ।
समुद्रफेनकासीसस्रोतोजदधिमस्तुभिः ॥५९॥
लेखनो वाक्शतं धार्यस्तस्यैतावद् विधारणम्।
स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तकद्रव्यपाचितः ॥६०॥
लेखनात् त्रिगुणो धार्यः पुटपाकस्तु रोपणः।
वितरेत् तर्पणोक्तां तु क्रियां व्यापत्तिदर्शने॥६१॥
घी, मांस, वसा, मज्जा, मेदा तथा मधुर द्रव्यों (शतावरी
तथा मुलेठी आदि) का पुटपाक 'स्नेहन' होता है और वह दो
सौ वाक्मात्रा (7-8 मिनट) तक धारण करना चाहिये। जंगल
(मरुस्थल के) प्राणियों के यकृत्, मांस तथा लेखन द्रव्यों
का पुटपाक लेखन होता है। उसको सौ मात्रा (3-4 मिनट)
तक धारण करें। लेखन द्रव्य ये हैं-लोहचूर्ण, ताम्रचूर्ण (अथवा
भस्म), शंख, प्रवाल, सेंधा नमक, समुद्रफेन, कासासी, काला
सुरमा तथा दही का पानी, स्त्री का दूध जंगली जीवों का
मांस, मधु, घी तथा तिक्त द्रव्यों (निम्बपत्रादि) का पुटपाक
रोपण होता है। इसकी तीन सौ मात्रा (10-12 मिनट) तक
धारण करें। यदि इसके अतियोग अथवा हीन योग से कोई
हानि दिखलायी दे तो तर्पणोक्त विधि से चिकित्सा करें।
वक्तव्य-उपर्युक्त उपयोगी द्रव्यों का पुटपाक विधि से
पाक करके उनका रस निकाल लेते हैं और उस रस का प्रयोग
नेत्रों में किया जाता है।
अञ्जन-विधि
अथ सम्पक्वदोषस्य प्राप्तमञ्जनमाचरेत्।
हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽञ्जनमिष्यते ॥६२॥
पूर्वाह्ने चापराह्ने च ग्रीष्मे शरदि चेष्यते।
वर्षासु नाभ्रे नात्युष्णे वसन्ते च सदैव हि॥६३॥
दोषों का पाक हो जाने पर आवश्यकतानुसार 'अञ्जन'
का प्रयोग करें। हेमन्त ऋतु (माघ तथा फाल्गुन) में दिन के
मध्य भाग (दोपहर) में अञ्जन लगाना चाहिये और शरद् ऋतु
(आश्विन तथा कार्तिक) तथा ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ तथा आषाढ़)
में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में अञ्जन लगाना चाहिये।
वर्षा ऋतु (सावन तथा भादों) में जब बादल तथा अत्यन्त
गर्मी न हो तब अञ्जन लगायें और वसन्त ऋतु (चैत्र तथा
वैशाख) में किसी भी समय अञ्जन लगाया जा सकता है।
वक्तव्य-नेत्रों में होने वाले दोषपाक का लक्षण-
'मन्दवेदनता कण्डूः संरम्भाश्रुप्रशान्तता। प्रशस्तवर्णता चाक्ष्णोः
सम्पक्वं दोषमादिशेत्'। जब तक ये लक्षण दिखलायी न दें
तब तक अञ्जन लगाना उचित नहीं है।
[ दायाँ स्तम्भ ]
अञ्जन के भेद
लेखनं रोपणं चैव तथा स्यात् स्नेहाञ्जनम्।
लेखनं क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरञ्जनमिष्यते॥६४॥
कषायतिक्तरसयुक् सस्नेहं रोपणं मतम्।
मधुरं स्नेहसम्पन्नमञ्जनं च प्रसादनम्॥६५॥
अञ्जन तीन प्रकार का होता है-1. लेखन, 2. रोपण तथा
3. स्नेहन। क्षार (जौखार आदि), तीक्ष्ण (कटु द्रव्य) तथा
अम्ल रस युक्त द्रव्यों का अञ्जन 'लेखन' माना जाता है,
कषाय तथा तिक्त रस से युक्त द्रव्यों का स्नेहयुक्त अञ्जन
'रोपण' माना जाता है और मधुर द्रव्यों का स्नेह युक्त अञ्जन
'प्रसादन' अर्थात् स्नेहन होता है।
अञ्जन के अन्य तीन भेद
गुटिकासच्चूर्णानि त्रिविधान्यञ्जनानि च।
कुर्याच्छलाकयाऽङ्गुल्या हीनानि च यथोत्तरम्॥६६॥
अञ्जन के तीन प्रकार और होते हैं। यथा-1. गुटिका
(लम्बी-लम्बी गोलियां जैसे चन्द्रोदयावर्ति), 2. रस
(द्रवस्वरूप) और 3. चूर्ण। ये यथासम्भव सलाई अथवा
अंगुली से लगाये जाते हैं। गुटिका घिसकर लगायी जाती है।
ये उत्तरोत्तर हीनगुण वाले होते हैं।
अञ्जन का निषेध
श्रान्ते प्ररुदिते भीते पीतमद्ये नवज्वरे।
अजीर्णे वेगघाते च नाञ्जनं सम्प्रशस्यते॥६७॥
श्रान्त (थका हुआ), प्ररुदित (रोया हुआ) भीत (डरा
हुआ) तथा पीतमद्य (मद्य पिया हुआ) मनुष्य और नवज्वर
में, अजीर्ण से तथा वेगरोध से पीड़ित मनुष्य अञ्जन न लगायें।
गुटिकाञ्जन की मात्रा
हरेणुमात्रां कुर्वीत वर्तिं तीक्ष्णाञ्जने भिषक्।
प्रमाणं मध्यमेऽध्यर्धं द्विगुणं तु मृदौ भवेत्॥६८॥
चिकित्सक का कर्तव्य है, कि तीक्ष्ण द्रव्यों से निर्मित
गुटिकाञ्जन की वर्ति (बत्ती), हरेणु (मटर) के समान बनाये
और मध्यम (रोपण द्रव्य निर्मित गुटिकाञ्जन) में डेढ़ हरेणु के
समान और मृदु (स्नेहन) में दो हरेणु के समान बत्ती बनायें।
रसरूप अञ्जन की मात्रा
रसक्रिया तूत्तमा स्यात् त्रिविडङ्गमिता हिता।
मध्यमा द्विविडङ्गा स्याद्धीना त्वेकविडङ्गिका॥६९॥
रसरूप अञ्जन की उत्तम मात्रा वायविडिंग के तीन दानों
के बराबर मध्यम दो वायविडिंग और हीन मात्रा एक वायविडिंग
के बराबर होनी चाहिये।
284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
चूर्णरूप अञ्जन की मात्रा
वैरेचनिकचूर्णं तु द्विशलाकं विधीयते।
मृदौ तु त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहिकेऽञ्जने।।70।।
विरेचन (लेखन) चूर्णाञ्जन की मात्रा दो सलाई भर, मृदु
(रोपण) की तीन सलाई तथा स्नेहन की चार सलाई भर
मात्रा मानी जाता है।
वक्तव्य—सुरमे की शीशी में सलाई को डालने पर उसके
एक अंगुल अग्रभाग पर जितना सुरमा लग जाता है, वह मात्रा
एक शलाका कही जाता है।
शलाका-निर्माण-विधि
मुखयोः कुण्ठिता श्लक्ष्णा शलाकाष्टाङ्गुलोन्मिता।
अश्मजा धातुजा वा स्यात् कलायपरिमण्डला।।71।।
ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता।
सुवर्णरजतोट्भूता शलाका स्नेहने मता।।72।।
अङ्गुलीव मृदुत्वेन कथिता रोपणे बुधैः।
अञ्जन (सुरमा) लगाने की 'शलाका' (सलाई) आठ
अंगुल लम्बी हो, दोनों ओर से कुण्ठित (गोलाईदार हो),
श्लक्ष्ण (खुरदरी न हो), उसके दोनों मुख मटर के समान
मोटे हों तथा वह पत्थर तथा स्वर्ण आदि धातु की बनानी
चाहिये। लेखन-अञ्जन के लिए ताँबा, लोहा तथा पत्थर की,
स्नेहन अञ्जन के लिए सोना तथा चाँदी को शलाका होनी
चाहिये और रोपण अञ्जन में मृदु होने के कारण अंगुली को
ही उत्तम माना जाता है।
वक्तव्य—यषद (जस्ता) का शलाका उत्तम होती है।
आचार्य शार्ङ्गधर ने इसी प्रकरण में आगे शलाका बनाने की
विधि भी कही है।
अञ्जन प्रयोग विधि एवं काल
सायं प्रातर्वाञ्जनं स्यात् तत्सदा नैव कारयेत्।।73।।
नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां सम्प्रशस्यते।
कृष्णभागादधः कुर्यादपाङ्गं यावदञ्जनम्।।74।।
अञ्जन सायंकाल अथवा प्रातःकाल लगाना चाहिये। इसके
अतिरिक्त समयों में अञ्जन लगाना उचित नहीं है। अत्यन्त
शतिकाल में, अत्यन्त उष्णकाल में, प्रवात (जब अत्यन्त
हवा चलती हो) में तथा अभ्रकाल (जब आकाश में बादल
छाये हों) में अञ्जन नहीं लगाना चाहिये। कृष्ण-भाग के
नीचे तथा अपाङ्ग (नेत्र के बाहरी कोण) तक अञ्जन लगाना
चाहिये।
वक्तव्य—अञ्जन लगाने का समुचित विधि के लिए
देखें-सु० उ० अ० 18 श्लो० 64-65। इन श्लोकों का तात्पर्य
यह है, कि कोया से लेकर अपांग (आँख के कोने) तक
अञ्जन लगी हुई। शलाका को आँख के भीतर डालकर घुमा
लेना चाहिये।
चन्द्रोदयावर्ति
शङ्खनाभिर्विभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला।
पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम्।।75।।
छागीक्षीरेण सम्पेष्य वर्तिं कृत्वा यवोन्मिताम्।
हरेणुमात्रां सङ्घृष्य जलैः कुर्यात्तथाञ्जनम्।।76।।
तिमिरं मांसवृद्धिं च काचं पटलमर्बुदम्।
रात्र्यन्ध्यं वार्षिकं पुष्पं वर्तिश्चन्द्रोदया जयेत्।।77।।
शंखनाभि, बहेड़ा की मींगी, बड़ी हरड़, मैनसिल, पीपल,
मरिच, कूठ तथा वच इन सब द्रव्यों को समान भाग लेकर
अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण बनाये और फिर उसको बकरी के दूध में
भली-भाँति पीसकर जौ जैसप लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बना लें
और हरेणु परिमित औषधि जल के साथ घिसकर अञ्जन
करें। यह तिमिर (धुन्ध), मांसवृद्धि (अर्म आदि), काच
(मोतिया), पटलगत दोष, अर्बुद (नेत्रार्बुद), रतौंधी तथा
वर्ष भर के पुष्प (फूलों) को जीतता है।
वक्तव्य—उक्त योग में विचारणीय विषय यह है, कि जौ
भर की तो बत्ती बनाने का विधान है और हरेणु भर औषध
लगाने का ? हरेणु नाम मटर का है तदनुसार सुश्रुत के भाष्यकार
डल्हणाचार्य तथा शार्ङ्गधर के टीकाकार श्रीआढमल्ल ने उसका
अर्थ भी किया है। हमारा विचार है कि 'हरेणु' के पर्यायों में
बड़ा चना, मटर, पित्तपापड़ा तथा हरेणुका भी देखे जाते हैं।
अतः यथोचित निर्णय लेकर मात्रा का विधान करें।
करञ्जवर्ति
पलाशपुष्पस्वरसैर्बहुशः परिभाविता।
करञ्जबीजवर्तिस्तु दृष्टेः पुष्पं विनाशयेत्।।78।।
करञ्ज के बीजों का कपड़छन चूर्ण बनाकर उसको पलाश
के फूलों के स्वरस का अनेक (सात) भावनायें दें, फिर
इसकी वर्ति बना लें। यह भी फूली को नष्ट करती है।
समुद्रफेनादिवर्ति
समुद्रफेनसिन्धूत्थशङ्खदक्षाण्डवल्कलैः ।
शिग्रुबीजयुतैर्वर्तिः शुक्रादींश्छत्रवल्लिखेत्।।79।।
समुद्रफेन, सेंधा नमक, शंख, मुरगी के अण्डों के छिलके
[त्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 285
[बायाँ स्तम्भ]
और सहजन के बीज-इन सभी द्रव्यों को पीसकर (सहजन
के रस से) वर्ति बनायें। यह भी शुक्रादि नेत्ररोगों को शस्त्र के
समान काट देती है।
दन्तवर्ति
दन्तैर्दन्तिवराहोष्ट्रगोहयाजखुरोद्भवैः ।
शङ्खमुक्ताम्भोधिफेनयुतैः सर्वैर्विचूर्णितैः ।। 80 ।।
दन्तवर्तिः कृता श्लक्ष्णा शुक्राणां नाशिनी परा।
हाथी, सूअर, ऊँट, गाय, घोड़ा, बकरी, तथा गधा इनके
दाँत, शंख, मोती तथा समुद्री झाग इन सब द्रव्यों को समभाग
लेकर और अत्यन्त बारीक पीसकर (किसी भी उपयुक्त द्रव
से) वर्ति बना लें। यह भी शुक्र नामक नेत्ररोगों को नष्ट
करती है।
नीलोत्पलवर्ति
नीलोत्पलं शिग्रुबीजं नागकेशरकं तथा ।। 81 ।।
एतत्कल्कैः कृता वर्तिरतितन्द्रां निवारयेत्।
नीलकमल, सहजन के बीज तथा नागकेसर इन सबको
पीसकर वर्ति बनायें। यह अतिनिन्द्रा को रोकती है।
कुसुमिकावर्ति
तिलपुष्पाण्यशीतिः स्युः षष्टिः पिप्पलतण्डुलाः ।। 82 ।।
जातीकुसुमपञ्चाशन्मरिचानि च षोडश।
सूक्ष्मं पिष्ट्वा जले वर्तिः कृता कुसुमिकाभिधा ।। 83 ।।
तिमिरार्जुनशुक्राणां नाशिनी मांसवृद्धिहृत्।
( एतस्याश्चाञ्जने मात्रा प्रोक्ता सार्धहरेणुका ।। 84 ।।)
तिल के फूल 80, पीपल के चावल (जो उसे कूटने पर
मिलते हैं) 60, चमेली के फूल 50 और कालीमरिच 16
दाना इन सबको बारीक पीसकर जल से बत्ती बनाये। इसका
नाम 'कुसुमिकावर्ति' है। यह तिमिर, अर्जुन तथा शुक्र नामक
नेत्र रोगों का नाश करती है और मांसवृद्धि को हरती है।
इसकी मात्रा अञ्जन करने में डेढ़ हरेणु भर का कही गयी है।
रसाञ्जनवर्ति
रसाञ्जनं हरिद्रे द्वे मालतीनिम्बपल्लवाः।
गोशकृद्रससंयुक्ता वर्तिर्नक्तान्ध्यनाशिनी ।। 85 ।।
रसवत, हल्दी, दारुहल्दी, चमेली और नीम के पत्ते-इन
सबको अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर गाय के गोबर के रस से वर्ति
बनाये। यह रतौंधी को नष्ट करती है।
धात्र्यादिवर्ति
धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च।
[दायाँ स्तम्भ]
पिष्ट्वा वर्तिं जलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।। 86 ।।
नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा।
आँवला के बीज एक भाग, बहेड़ा के बीज दो भाग और
हरड़ के बीजों की गिरी तीन भाग लेकर और भली-भाँति
पीसकर जल से वर्ति बना लें। इसका दो हरेणु भर अञ्जन
करें। यह नेत्रस्राव (उलका) तथा वातरक्त की पीड़ा को शीघ्र
ही हरती है।
वक्तव्य-उक्त सभी उदाहरण वर्ति स्वरूप गुटिकाञ्जन
के हैं। अब इसके आगे रस रूप में प्रयुक्त होने वाले अञ्जनों
के उदाहरण कहे जायेंगे।
तुत्थादि-रसक्रिया
तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थं सिताशङ्खमनःशिला ।। 87 ।।
गैरिकोदधिफेनं च मरिचं चेति चूर्णयेत्।
संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् ।। 88 ।।
वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्रहरां पराम्।
शुद्ध तूतिया, सुवर्णमाक्षिक, सेंधा नमक, खाँड, शंख,
मैनसिल, गेरू, समुद्रफेन तथा मरिच इन सबको अत्यन्त
सूक्ष्म पीसकर और मधु के साथ मिलाकर रस रूप अञ्जन
बना लें। यह वर्त्मरोग (रोहा आदि), अर्म, तिमिर, काच
(मोतिया) तथा शुक्र नामक नेत्ररोग का विनाश करने के
लिए उत्तम योग है।
वटक्षीर-रसाञ्जन
वटक्षीरेण संयुक्तो मुख्यः कर्पूरजः कणः ।। 89 ।।
क्षिप्रमञ्जनतो हन्ति कुसुमं तु द्विमासिकम्।
शुद्ध कपूर को बरगद के दूध में पीसकर अञ्जन करने से
दो महीने का पुराना फूला भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।
अतिनिद्रानाशक योग
क्षौद्राश्वलालासङ्घृष्टैर्मरिचैर्नेत्रमञ्जयेत् ।। 90 ।।
अतिनिद्रा शमं याति तमः सूर्योदयादिव।
कालीमरिच को मधु तथा घोड़े की लार में घिसकर नेत्र
में अञ्जन करें। इससे अतिनिद्रा उस प्रकार शान्त हो जाती है
जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अन्धकार।
तन्द्रानाशक योग
जातीपुष्पं प्रवालं च मरिचं कटुकी वचा ।। 91 ।।
सैन्धवं बस्तमूत्रेण पिष्टं तन्द्राघ्नमञ्जनम्।
चमेली के फूल तथा पत्ते, मरिच, कुटकी, वच तथा
286 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
सेंधा नमक इन सबको समभाग लेकर और बकरे के मूत्र में
पीसकर अञ्जन लगाने से तन्द्रा (उँघाई) नष्ट हो जाती है।
प्रबोधाञ्जन
शिरीषबीजगोमूत्रकृष्णामरिचसैन्धवैः ॥ ९२॥
अञ्जनं स्यात् प्रबोधाय सरसोनशिलावचैः।
सिरस (शिरशि) के बीज, पीपल, मरिच, सेंधा नमक,
लहसुन, मैनसिल तथा वच इन सबको समान भाग लेकर
गोमूत्र में पीसकर अञ्जन लगाने से मूर्च्छित रोगी संज्ञावान्
(चैतन्य) हो जाता है।
दार्व्यादि रसक्रिया
दार्वा पटोलं मधुकं सन्निम्बपद्मकोत्पलम् ॥ ९३॥
प्रपौण्डरीकं चैतानि पचेत् तोये चतुर्गुणे।
विपाच्य पादशेषं तु शृतं नीत्वा पुनः पचेत् ॥ ९४॥
शीते तस्मिन्मधु सितां दद्यात् पादांशिकां नरः।
रसक्रियैषा दाहाश्रुरक्तरागरुजो हरेत् ॥ ९५॥
दारुहल्दी, परवल की पत्ती, मुलेठी, नीम के पत्ते,
पद्मकाठ, लाल कमल तथा सफेद कमल इन सब द्रव्यों को
कूटकर चौगुने जल में पकायें, चतुर्थांश जल शेष रह जाने पर
छान लें। इस क्वाथ को फिर पकायें जब गाढ़ा हो जाये तो
उतार लें। शीतल हो जाने पर उसमें मधु तथा खाँड (क्वाथ्य
द्रव्यों के) चतुर्थांश मिला दें। यह रसक्रिया दाह, आँसू तथा
पीड़ा को हरती है।
रसाञ्जनादि रसक्रिया
रसाञ्जनं सर्जरसो जातीपुष्पं मनःशिला।
समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचानि च॥ ९६॥
एतत् समांशं मधुना पिष्ट्वा प्रक्लिन्नवर्त्मनि।
अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणां च प्ररोहणम् ॥ ९७॥
रसवत, राल, चमेली के फूल, मैनसिल, समुद्रफेन, सेंधा
नमक, गेरू तथा मरिच इन सब द्रव्यों को समभाग लेकर
सूक्ष्म पीसकर तथा मधु मिलाकर अञ्जन करें। इससे प्रक्लिन्न-
वर्त्म रोग, क्लेद तथा कण्डू (खुजली) का नाश हो जाता है।
पक्ष्मों (आँख के बालों) का पुनः प्ररोहण (उत्पन्न) हो
जाता है।
गुडूची रसक्रिया
गुडूचीस्वरसः कर्षः क्षौद्रं स्यान्माषकोन्मितम्।
सैन्धवं क्षौद्रतुल्यं स्यात् सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ९८॥
अञ्जयेन्नयनं तेन पिल्लार्मतिमिरं जयेत्।
काचं कण्डूं लिङ्गनाशं शुक्लकृष्णगतान् गदान्॥ ९९॥
गिलोय का स्वरस एक कर्ष (1 तोला), मधु और सेंधा
नमक एक-एक माशा सबको एक साथ पीसकर उसको नेत्रों
में लगायें। यह पिल्ल, अर्म, तिमिर, काच, कण्डू, लिंगनाश
तथा शुक्ल भाग तथा कृष्ण भाग के नेत्र रोगों को जीतता है।
पुनर्नवा रसाञ्जन
दुग्धेन कण्डूं क्षौद्रेण नेत्रस्त्रावं च सर्पिषा।
पुष्पं तैलेन तिमिरं काञ्जिकेन निशान्धताम् ॥ १००॥
पुनर्नवा जयेदाशु भास्करस्तिमिरं यथा।
पुनर्नवा की जड़ दूध के साथ घिसकर आँख में लगाने
से कण्डू (खुजली) को मधु के साथ नेत्रस्राव को, घी के
साथ फूली को, तेल के साथ तिमिर को तथा काञ्जी के साथ
रतौंधी को उस प्रकार नष्ट करती है, जैसे सूर्य अन्धकार को।
बब्बूल रसक्रिया
बब्बूलदलनिःक्वाथो लेहीभूतस्तदञ्जनात् ॥ १०१॥
नेत्रस्त्रावं जयत्येष मधुयुक्तो न संशयः।
बब्बूल के पत्तों का क्वाथ करके उसे छानकर फिर
पकायें, जब गाढ़ा हो जायें तो उसमें मधु मिलाकर अञ्जन
करें। यह नेत्रस्राव को जीतता है। इसमें कुछ भी सन्देह नही
है।
हिज्जल-रसक्रिया
हिज्जलस्य फलं घृष्ट्वा पानीये नित्यमञ्जनम् ॥ १०२॥
चक्षुःस्त्रावोपशान्त्यर्थं कार्यमेतन्महौषधम्।
हिज्जल (समुद्रफल) के फल को जल में घिसकर
प्रतिदिन अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव की शान्ति के लिए महौषध
है।
कतक-रसक्रिया
कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् ॥ १०३॥
ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम्।
कतक (निर्मली) के फल को घिसकर मधु तथा कपूर
मिलाकर अञ्जन करें। इससे नेत्र का प्रसादन (प्रसन्नता)
होता है।
शिरोत्पात में रसक्रिया
सर्पिः क्षौद्रं चाञ्जनं स्याच्छिरोत्पातस्य शान्तये ॥ १०४॥
शिरोत्पात (आँख में जो लाल-लाल सिरायें दिखलायी
पड़ती हैं) की शान्ति के लिये घी तथा मधु का अञ्जन लगाना
चाहिये।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 287
[स्तम्भ १]
कृष्णसर्प वसाञ्जन
कृष्णसर्पवसा शङ्खः कतकात्फलमञ्जनम्।
रसक्रियेयमचिरादन्धानां दर्शनप्रदा।। 105 ।।
शंखनाभि, निर्मली के बीज तथा अञ्जन (कालासुरमा)
को भली-भाँति पीसकर काल साँप की वसा में मिला दें। यह
अञ्जन अन्धों को भी शीघ्र ही दर्शन-शक्ति प्रदान करता है।
वक्तव्य—शंखनाभि तथा अञ्जन को अलग अलग पीस
लें और निर्मली के बीजों को कूटकर तथा जल डालकर
पृथक् से पीसना चाहिये। इसे पीसने में अधिक परिश्रम लगता
है। इन सबका साँप की चर्बी में मिला लें। सर्पवसा सपेरों से
मिल जाती है।
लेखनाञ्जन
दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः ।
द्रव्यैरञ्जनयोगोऽयं पुष्पार्मादिविलेखनः ।। 106 ।।
मुरगी के अण्डों के छिलके, मैनसिल, काँच, शंख,
लाल चन्दन तथा सेंधा नमक इन द्रव्यों का अञ्जनयोग (अञ्जन
लगाने का निरन्तर अभ्यास), पुष्प (फूल) तथा अर्म आदि
को काट देता है।
वक्तव्य—काँच को तपाकर निर्मल जल में तब तक
बुझाना चाहिये जब तक उसकी चमक नष्ट न हो जाये। इसी
काँच के बारीक चूर्ण का अञ्जन में प्रयोग किया जाता है।
कणा-अञ्जन
कणा छागयकृन्मध्ये पक्त्वा नेत्रयुगेऽञ्जिता।
अचिराद्धन्ति नक्तान्ध्यं तद्वत् सक्षौद्रभूषणम् ।। 107 ।।
पिप्पली को बकरे के यकृत् में रखकर पुटपाक विधि से
पकायें और फिर घिसकर आँखों में लगायें। यह रतौंधी को
शीघ्र ही नष्ट कर देती है। इसी प्रकार मरिच को भी तैयार कर
और मधु के साथ मिलाकर लगाना चाहिये।
वक्तव्य—उक्त सभी अंजन रसरूप में मिलते हैं। इसके
आगे चूर्णरूप अंजन कहे जायेंगे।
चूर्णाञ्जन (लेखन)
शाणार्धं मरिचं द्वौ च पिप्पल्यर्णवफेनयोः।
शाणार्धं सैन्धवं शाणा नव सौवीरकाञ्जनात् ।। 108 ।।
पिष्टं सुसूक्ष्मं चित्रायां चूर्णाञ्जनमिदं शुभम्।
कण्डूकाचकफार्तानां मलानां च विशोधनम् ।। 109 ।।
मरिच चूर्ण दो माशा, पीपल तथा समुद्रफेन आठ-आठ
माशा, सेंधा नमक, दो माशा तथा सफेद सुरमा छत्तीस माशा
[स्तम्भ २]
इन द्रव्यों को चित्रा नक्षत्र में अत्यन्त सूक्ष्म पीसना चाहिये।
यह उत्तम चूर्ण अञ्जन है। यह खुजली, काच तथा कफजनित
विकारों तथा आँखों के मल (काचड़) को शुद्ध करता है।
चूर्णाञ्जन (रोपण)
शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगा प्लाव्य वारिणा।
गृह्णीयात् तज्जलं सर्वं यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। 110 ।।
शुष्कं च तज्जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत्।
विचूर्ण्य भावयेत् सम्यक् त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। 111 ।।
कर्पूरस्य रजस्तत्र दशमांशेन निक्षिपेत्।
अञ्जयेन्नयने तेन सर्वदोषहरं हि तत् ।। 112 ।।
सर्वरोगहरं चूर्णं चक्षुषोः सुखकारि च।
खपरिया को शिला (खरल)पर पीसकर और जल में
घोलकर रख दें, जब जल नितर जाये तो सावधानी से उसको
ले लें और नीचे बैठे हुये चूर्ण को फेंक दें, फिर उस जल को
धूप में सुखा लें। जल के सूख जाने पर पपड़ी जैसा पदार्थ
उपलब्ध होगा, इसको खरल में डालकर और पीसकर त्रिफला
के स्वरस की तीन भावना दें, अन्त में उक्त द्रव्य का दसवाँ
भाग कपूर मिलाकर रख लें। इसको आँख में लगाने से यह
सभी प्रकार के नेत्र दोषों तथा रोगों को हरता है। यह आँखों
के लिए सुखदायक है।
वक्तव्य—खपरिया को पीसकर पानी में डाल दें। उसका
घुलनशील भाग पीना में घुल जाता है। पानी के सूखने पर
वही पर्पटी जैसा प्राप्त होता है।
चूर्णाञ्जन (प्रसादन)
अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत् त्रिफलारसैः।। 113 ।।
सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम्।
अञ्जयेत् तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् ।। 114 ।।
सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः।
सौवीराञ्जन (सफेद सुरमा) को अग्नि में तपाकर त्रिफला
के स्वरस में तथा स्त्री के दूध में सात-सात बार बुझायें और
फिर पीस लें। इसको प्रतिदिन नेत्रों में लगायें। यह आँख के
सभी विकारों को नष्ट कर देता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं
है।
शलाका-निर्माण-विधि
त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा ।। 115 ।।
गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः।
तच्छलाकाऽञ्जन्त्येन सर्वानेत्रभवान् गदान् ।। 116 ।।
288 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
सीसा धातु को पिघला कर त्रिफला, भाँगरा तथा सौंठ के | जमालगोटा की मज्जा (मीगी) को नींबू के रस को
स्वरस में बुझायें और इसी प्रकार घी, गोमूत्र, मधु तथा बकरी | इक्कीस भावना दें और निरन्तर पीसते रहें, फिर इसकी बत्ती
के दूध में बुझायें। सीसे की यह शलाका (सलाई) नेत्रों में | बना लें। इस बत्ती को मनुष्य की लार या थूक में घिसकर
होने वाल सभी रोगों को अवश्य हरती है। | आँख में लगायें। यह साँप के विष को जीतकर मनुष्य को
वक्तव्य-सभी प्रकार के सुरमे तथा अंजन आदि उक्त | पुनः जीवित कर देता है।
शीशे की शलाका द्वारा लगाये जाते हैं और शुद्ध करके बनायी | वक्तव्य-यह अञ्जन विशेष करके सर्प द्वारा डसे हुये
गयी सीसा की सलाई का प्रयोग भी चक्षुष्य होता है। | व्यक्ति को सचेत कर प्रयुक्त किया जाता है। इससे
प्रत्यञ्जन-विधि | आश्चर्यजनक लाभ होते देखा गया है।
गतदोषमपेताश्रु सम्पश्यन् सम्यगम्भसा। | नेत्र-प्रसादन-विधि
प्रक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। 117 ।। | भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्दीयते यदि।
न वाऽनिर्गतदोषेऽक्षिण धावनं सम्प्रयोजयेत्। | जाता रोगा विनश्यन्ति तिमिराणि तथैव च ।। 123 ।।
प्रत्यञ्जनं तीक्ष्णतप्ते नेत्रे चूर्णं प्रसादनम् ।। 118 ।। | भोजन करने के पश्चात् दोनों हाथों को परस्पर घिसकर
जब दोष या उपद्रव शान्त हो जाये, आँसू बन्द हो जायें | यदि प्रतिदिन आँखों को मला जायें तो उत्पन्न हुये नेत्र रोग
और भली-भाँति देखने लग जायें तब जल से नेत्रों को धोकर | तथा तिमिर रोग नष्ट हो जाते हैं।
दोषों के अनुसार प्रत्यञ्जन का प्रयोग करें। जब तक दोष | नेत्र-सिंचन-विधि
शान्त न हो जाये तब तक धावन (आँख धोना) का प्रयोग न | शीताम्बुपूरितमुखः प्रतिवासरं यः
करें। तीक्ष्ण औषधियों से तपे हुये नेत्र में प्रसादन (नेत्र को | कालत्रयेण नयनद्वितयं जलेन।
स्वच्छ करने वाले) अञ्जन का प्रयोग करें। | आसिञ्चति ध्रुवमसौ न कदाचिदक्षि-
वक्तव्य-जिसका प्रतिदिन नेत्रों में प्रयोग किया जाता है | रोगव्यथाविधुरतां भजते मनुष्यः ।। 124 ।।
और जो प्रतिदिन आँखों को स्वस्थ रखने के लिए प्रयुक्त किया | शीतल जल से मुख को भरकर जो मनुष्य प्रतिदिन तीन
जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं। विशेष देखें-सु०उ०अ० 18। | बार (प्रातः, दोपहर तथा सायंकाल) दोनों आँखों को जल
नयनामृताञ्जन | (शीतल जल) से सींचता है, वह अवश्यमेव कभी भी आँखों
शुद्धे नागे दुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत्। | के रोगों की व्यथा (पीड़ा) से व्याकुलता को प्राप्त नहीं
कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।। 119 ।। | होता।
दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे प्रदापयेत्। | नेत्र-रक्षा का महत्त्व
एतत् प्रत्यञ्जनं नेत्रगदजिन्नयनामृतम् ।। 120 ।। | चक्षूरक्षायां सर्वकालं मनुष्यै-
शुद्ध सीसा धातु को पिघलायें और तत्काल उसमें समभाग | र्यत्नः कर्तव्यो जीविते यावदिच्छा।
शुद्ध पारद डाल दें तथा उसका हिलाकर या घोलकर खरल में | व्यर्थो लोकोऽयं तुल्यरात्रिन्दिवानां
डाल दें (उसे दो तीन घण्टे तक उसे भली-भाँति घोटें) उसके | पुंसामन्धानां विद्यमानेऽपि वित्ते ।। 125 ।।
बाद दोनों के समान भाग में कालासुरमा डालकर देर तक | जब तक जीवित रहने की इच्छा हो तब तक मनुष्यों को
पीसें। अत्यन्त सूक्ष्म हो जाने पर सबकी अपेक्षा दसवाँ भाग | नेत्रों की रक्षा का सर्वदा यत्न करते रहना चाहिये, क्योंकि
उसमें कपूर मिला दे। यह प्रत्यञ्जन नेत्र के सभी विकारों को | अन्धे मनुष्यों के लिये तो रात-दिन समान होता है। ऐसे लोगों
जीतता है। | लिये धन रहने पर भी सम्पूर्ण संसार आँखा के न रहने कारण
सर्पविषनाशक अञ्जन | व्यर्थ होता है।
जयपालभवां मज्जां भावयेन्निम्बुकद्रवैः। | ग्रन्थकार की प्रार्थना
एकविंशतिवेलं तत् ततो वर्तिं प्रकल्पयेत् ।। 121 ।। | आयुर्वेदसमुद्रस्य गूढार्थमणिसञ्चयम्।
मनुष्यलालया घृष्ट्वा ततो नेत्रे तयाऽञ्जयेत्। | ज्ञात्वा कैश्चिद् बुधैस्तैस्तु कृता विविधसंहिताः ।। 126 ।।
सर्पदष्टविषं जित्वा सञ्जीवयति मानवम् ।। 122 ।। | किञ्चिदर्थं ततो नीत्वा कृतेयं संहिता मया।
| कृपाकटाक्षमिक्षेपमस्यां कुर्वन्तु साधवः ।। 127 ।।
त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 289
[वाम स्तम्भ]
आयुर्वेद सागर के गूढ़ अर्थ (विषयरूपी) मणियों के
सञ्चय (खजाने) को कुछ विद्वानों ने जाना या समझा है।
तदनुसार उन्होंने अनेक संहितायें भी रची हैं। उन संहिताओं
(चरक, सुश्रुत आदि) में से कुछ अर्थ (विषय) को लेकर मैं
(शार्ङ्गधराचार्य) ने यह संहिता बनायी है। सज्जन लोग इस
पर सदैव कृपा-दृष्टि डालते रहें।
शुभकामना
विविधगदार्तिदरिद्रनाशनं या
हरिरमणीव करोति योगरत्नैः।
विलसतु शार्ङ्गधरस्य संहिता सा
कविहृदयेषु सरोजनिर्मलेषु।।128।।
जो (संहिता) योगरूपी रत्नों द्वारा हरिरमणी (लक्ष्मी)
के समान अनेक प्रकार के रोगों की पीड़ारूपी दरिद्रता का
नाश करती है शार्ङ्गधराचार्य द्वारा रचित वह संहिता कवियों
तथा कविराजों के कमल के समान निर्मल हृदयों में सदैव
विलास करती रहे।
ग्रन्थ की उपयोगिता
अल्पायुषामल्पधियामिदानीं
कृतं समस्तश्रुतिपाठशक्त्या।
तदत्र युक्तं प्रतिबीजमात्र-
मभ्यस्यतामात्महितं प्रयत्नात्।।129।।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे नेत्रप्रसादनविधिर्नाम
त्रयोदशोऽध्यायः।।13।।
आजकल छोटी आयु तथा छोटी बुद्धि वाले मनुष्य सम्पूर्ण
आयुर्वेद के ग्रन्थो को पढ़ने की शक्ति नहीं रखते। इसलिये मैं
(शार्ङ्गधराचार्य) ने इस संहिता में आयुर्वेद के बीज (मौलिक
भाव) लिख दिये हैं। अतः आप सब अपने लाभ के लिये
परिश्रमपूर्वक इसका अभ्यास करें।
वक्तव्य-चिकित्सक को चिकित्सा काल में सब प्रकार
से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, इसीलिए कहा गया
है-'चिकित्सितात् पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः'। सु०
क०अ० 8.142। इसमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि
परहित के साथ साथ इससे अपना हित भी इससे हो जाता है,
क्योंकि चिकित्सक सर्वदा यही चाहता है-'सर्वे भवन्तु
सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः'।
[दक्षिण स्तम्भ]
प्रतिसंस्कर्ता का निवेदन
षड्विंशतिः पद्यशतानि पूर्वं
प्रतिश्रुतं शार्ङ्गधरेण यत् सा।
सङ्ख्या क्वचित् संस्करणेऽद्य पूर्णा
नाऽऽलोक्यते तत्प्रदुनोति चित्तम्।।1।।
आचार्य शार्ङ्गधर ने अपनी इस संहिता के प्रारम्भ में
प्रतिज्ञा की थी, कि इस ग्रन्थ की श्लोक संख्या छब्बीस सौ
है। परन्तु आज उपलब्ध किसी भी संस्करण में उक्त संख्या
दृष्टिगोचर नहीं होती, जिससे मानसिक कष्ट हो रहा था।।1।।
उपेक्षया प्रस्तुतसंहिताया आसं
मुहुश्चिन्तितमानसः प्राक्।
पूर्तिः कथं स्यादिति तर्कयन्
द्वाग्गुरोः कृपा प्रादुरभूत् ततो मे।।2।।
इस प्रकार विद्वानों द्वारा शार्ङ्गधरसंहिता की उपेक्षा को
देखकर मैं पहले अत्यन्त चिन्तित था और सोचा करता था,
कि इसकी पूर्ति कैसे हो; तभी मेरे ऊपर गुरुचरणों की कृपा
हुई।।2।।
ग्रन्थं समालोक्य सुसूक्ष्मबुद्ध्या
संस्मृत्य पूर्वान् भिषगुत्तमांश्च।
ग्रन्थानुरोधाद् विषयानुरोधात्
पूर्तिमयाऽकारि च तत्त्वदृष्ट्या।।3।।
तदनन्तर मैंने सूक्ष्म बुद्धि से ग्रन्थ का अवलोकन किया
और प्राचीन आयुर्वेदविद् महर्षियों का स्मरण कर उनके ग्रन्थों
का अवलोकन किया। तदनन्तर ग्रन्थ तथा विषय को ध्यान में
रखकर तात्त्विक दृष्टि से इसकी पूर्ति कर दी।।3।।
प्रतिसंस्कारमासाद्य पूर्णेयं कृतिरुत्तमा।
रोगिणां रोगनाशाय कल्पतां भिषजां मुदे।।4।।
मेरे द्वारा प्रतिसंस्कृत यह उत्तम कृति रोगियों के रोगों का
नाश करे और विद्वान् चिकित्सकों को आनन्द प्रदान करे।।4।।
पुरा विकृतिमापन्ना श्रीशार्ङ्गधरसंहिता।
अधुना संस्कृता श्रीमद् ब्रह्मानन्दत्रिपाठिना।।5।।
इसके पहले यह शार्ङ्गधरसंहिता खण्डित (अपूर्ण) थी।
अब श्री ब्रह्मानन्द त्रिपाठी ने इसका प्रतिसंस्कार कर इसे पूर्ण
कर दिया है।।5।।
[अन्तिम पुष्पिका]
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का तेरहवाँ अध्याय समाप्त।। 13 ।।
उत्तरखण्ड समाप्त-शार्ङ्गधरसंहिता समाप्त।
अञ्जननिदानम्
।।श्रीः।।
महर्षि-अग्निवेशप्रणीतम्
अञ्जननिदानम्
अबोधतिमिरच्छन्नचक्षुषां भिषजां कृते। | दोषोऽजीर्णाज्ज्वरं कुर्यात् क्षिप्त्वाऽग्निं कोष्ठतस्त्वचि।
सूक्ष्मं करोत्यग्निवेशो ग्रन्थमञ्जनमाख्यया।। 1।। | सोऽष्टधा तैः पृथग्द्वन्द्वसर्वैरागन्तुजोऽपि च।। 10।।
दोषरोषो रुजां हेतुस्तत्प्रकोपे तु कारणम्। | जृम्भाऽङ्गमर्दावरतिरुग्दाहौ गौरवारुची।
प्रत्येकं हीनमिथ्यातिथयोगः काला णाम्।। 2।। | पृथग् ज्वराणां प्राग्रूपं द्वित्रिजे द्वित्रिलक्षणम्।। 11।।
कटुतिक्तकषायपयोदहतिश्रमरूक्षहिमान्नभयानशनैः । | कम्पः कण्ठोष्ठविट्शोषोऽक्षवो मूर्द्धोदराङ्गरुक्।
स्मरजागरशुक्तरणास्रगमैरपि कुप्यति वेगवधैरनिलः ।। 3।। | वैषम्योऽस्वप्नवैरस्यं जृम्भा वातज्वराकृतिः।। 12।।
शिरःशङ्खभ्रूहृत्त्रिकविटपसन्ध्यस्थिकटिरुग् | पीतता दाहतृट्स्वेदो मूर्च्छाऽल्पस्वप्नतिक्तता।
विबन्धः पारुष्यं शयनहतिराध्मानचलने। | वमिभ्रमप्रलापाश्च रेकः पित्तज्वराकृतिः।। 13।।
कडारा शोणा वा छविसिप कषायोऽस्य च रसः | स्तैमित्योत्क्लेदमाधुर्यं प्रतिश्याऽरुचिगौरवम्।
श्रमो रुग्वैषम्यं कुपितमरुतो लक्षणमिदम्।। 4।। | कासालस्ये तृप्तिशौक्ल्यं शैत्यं श्लेष्मज्वराकृतिः।। 14।।
तिलशुक्तसुरादधिमीनशरत्- | कण्ठास्यशोषस्तृण्मूर्च्छा दाहोऽस्वप्नो वमिर्भ्रमः।
कटुतीक्षणपटूष्णरुडम्लतपैः । | तमः पर्वशिरोरुक् च वातपित्तज्वराकृतिः।। 15।।
रतिघस्रनिशाऽर्धविदाहकरैरपि | स्तैमित्यं काससन्तापौ गौरवं पर्वमूर्धरुक्।
कुप्यति पित्तमुपोषणतः ।। 5।। | स्वापोऽस्वेदः प्रतिश्यायो वातश्लेष्मज्वराकृतिः।। 16।।
भ्रमो दाहो मूर्च्छा मलशिथिलता स्वेददरणं | शीतं दाहो मुहुस्तन्द्रा मोहः कासोऽरुचिश्च तृट्।
प्रलापः पीतत्वं मुखनयनविण्मूत्रनखरे। | लिप्ततिक्तास्यता पित्तबलासज्वरलक्षणम्।। 17।।
मदस्तृट् तिक्तोष्णाः पदुकटुरसः पाण्डुरहिता | खरा जिह्वाऽक्षिणी भुग्ने स्राविरक्ते तृडस्थिरुक्।
द्युतिः पाकश्चेत्याकृतिरुषि पित्तस्य सरुषः ।। 6।। | विकृतेहास्वेदनिद्रा शीतदाहाव्यवस्थितिः।। 18।।
दधिदुग्धनवीनजलान्नहिमाध्यशनाम्लपटूपशमाज्यतिलैः। | तन्द्रा प्रलापो मोहाङ्गस्रस्तता कण्ठशूकता।
गुरुमत्स्यवसन्तदिवाशयनैर्मधुरैरपि रोषमुपैति कफः।। 7।। | रक्तष्ठीवनमित्यादिः सन्निपातज्वराकृतिः।। 19।।
गुरुत्वं स्तैमित्यं श्वयथुचिरकर्तृत्वशयने | अभिन्यासः समस्तैस्तैर्ध्वस्तसर्वैन्द्रियक्रियः।
मलाधिक्यं कण्डूरुचिरुपलेपः शिशिरता। | सन्निपातज्वरोऽसाध्यो दोषवृद्ध्याऽग्निहानितः।। 20।।
अपक्तिस्तृप्तिश्चास्मृतिरिति बलासस्य सरुषः | सप्तदशाद्वादशाहाद्वानर्वा वृद्धिरस्य तैः।
स्फुटं लिङ्गं स्वादुः पटुरपि रसो भा च धवला।। 8।। | तत्तद् द्विगुणघस्रैस्तु तन्मर्यादा स्मृता क्रमात्।। 21।।
हेतुप्राग्रूपोपशयाप्तिभिर्हिमामयः । | सन्निपातज्वरस्यादिमध्येऽन्ते कर्णमूलयोः।
ज्ञेयो रूपेण चैकेन मुख्यमेतेषु तद्गतः ।। 9।। | शोथोऽसाध्यः कष्टसाध्यः सुखसाध्यः क्रमेण च।। 22।।
[अञ्जननिदानम् | 291]
[अञ्जननिदानम् | 291]
[वाम स्तम्भ]
सन्ततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ।
सन्दुष्यास्त्ररसावस्त्रं क्रव्यं मेदोऽस्थि मज्ज च ।। २३ ।।
तद्भेदा विषमाः स्युस्ते शीतदाहादयो ज्वराः।
सन्तत्या सन्ततस्तिष्ठेत् ते सप्तदशरव्यहान् ।। २४ ।।
द्वौ कालौ सततोऽन्येद्युरेकं कुर्यादहर्निशम् ।
मुक्त्वैकाहं तृतीयोऽथ द्वयहं त्यक्त्वा चतुर्थकः ।। २५ ।।
घटीः पञ्चाशदन्येद्युः स्वेऽह्यस्तु तृतीयकः।
द्वयहं चतुर्थो व्याप्नोति त्रय एते विपर्ययाः ।। २६ ।।
हृद्गास्त्रवमिर्दाहो वैगन्ध्यं चाऽस्थिरुक् क्लमः।
शुक्लोत्सर्गश्चेति लिङ्गं क्रमाद्धात्तुगते ज्वरे ।। २७ ।।
साध्यावाद्यौ कष्टसाध्यास्तत्परोऽन्यो न सिद्ध्यति ।
मन्दोऽतिगौरवं स्वेदो ज्वरो नित्यं प्रलेपकः ।। २८ ।।
चतुर्धाऽऽगन्तुजः शापाभिचारावेशघातजः।
पूर्वयोर्भूरिविस्फोटमोहावावेशजे तु रुट् ।। २९ ।।
तत्तद् भूतस्य कामोत्थे ह्रीधीस्वप्नहतिर्ज्वरे।
दाहातिसारौ श्वेदोत्थे यथास्वं घातजं वदेत् ।। ३० ।।
बहुहेतूपद्रवोऽतिक्षीणधात्विन्द्रियो ज्वरः।
असाध्यः शीतलः स्वेदी गात्रान्तर्दाहकृच्च यः ।। ३१ ।।
लघुर्गुरुर्निरोमश्च सामः प्राकृतवैकृतौ।
बहिरन्तर्वेगिनौ च साध्यासाध्यौ क्रमाज्ज्वरौ ।। ३२ ।।
लघुरल्पोपद्रवः स्यादनेकोपद्रवो गुरुः।
वर्षाशरद्वसन्तेषु प्राकृतोऽन्यस्तु वैकृतः ।। ३३ ।।
हल्लासापाकलालारुक्षत्तन्द्रारुच्यङ्गगौरवैः ।
वैरस्यालस्यातिसूत्रैः सामोऽन्यस्मान्निरामकः ।। ३४ ।।
अन्तर्दाहः प्रलापस्तृट् सन्धिरुग् विड्ग्रहो भ्रमः।
श्वासास्वेदौ चिह्न मन्तर्वेगिनोऽन्यस्य चान्यथा ।। ३५ ।।
विरेको विड्ग्रहो वा तृट् कासः श्वासोऽङ्गरुग्वमिः।
हिक्का मूर्च्छाऽरुचिश्चापि ज्वरस्योपद्रवा दश ।। ३६ ।।
अस्वप्नारुच्यरतिस्तृट्स्तम्भीर्याङ्कगौरवम् ।
यन्त्रणान्नाभिहृन्मध्ये रुक् चाङ्गो धातुपाकिनः ।। ३७ ।।
भ्रमातिज्वरतृट्श्वासाः पच्यमानज्वराकृतिः।
दोषज्वराङ्गलघुता दोषपाकस्य लक्षणम् ।। ३८ ।।
दाहः स्वेदो भ्रमस्तृष्णा कम्पो विड्भिदसंज्ञता।
कूजनं चातिवैगन्ध्यमाकृतिर्ज्वरमोक्षणे ।। ३९ ।।
देहो लघुर्मुखे पाकः स्वेदः करणसौष्ठवम् ।
कण्डूः क्षवो बुभुक्षा च विगतज्वरलक्षणम् ।। ४० ।।
वृद्धः सविङ्गरसः क्षिप्तवह्निर्वातातिसारितः।
अतिसारः स षोढा तैः पृथक् सर्वैः शुचोऽमतः ।। ४१ ।।
[दक्षिण स्तम्भ]
फेनरूक्षारुणं वातात् पित्तात् पीतारुणासितम्।
कफात् सान्द्रं श्वेताहमं वर्चः सर्वैस्तु सर्वयुक् ।। ४२ ।।
शोचतोऽविट् सविङ् वाऽस्रं बाष्पक्षुद्रोष्मणेरितम्।
सृजत्यजीर्णात् तच्चित्रं मुहुर्मुहुः सशब्दरुक् ।। ४३ ।।
अतीसारी सृजत्यस्रं पित्तलाहारसेवनात् ।
अजस्रं विड्वातकफात् प्रवेहेच्चेत्प्रवाहिका ।। ४४ ।।
वमिः कृच्छ्रं ज्वरः कासः श्वासस्तृण्मोहशोथरुक् ।
हिक्काऽरुचिश्चेति लिङ्गं मरणायातिसारिणः ।। ४५ ।।
गतेऽतिसारेऽप्यामेन दुष्टा चेद् ग्रहणी मुहुः।
वर्चो मुञ्चत्याममेवोच्यतेऽसौ ग्रहणीगदः ।। ४६ ।।
कुप्यति ग्रहणी नित्यं दिवा भूयो रुजोऽऽमरुक् ।
साऽन्या सङ्ग्रहणी नाम्ना याऽऽमं सङ्गृह्य मुञ्चति ।। ४७ ।।
शोथाग्निमान्द्यवैवर्ण्यज्वरापाकारुचिक्षयाः ।
तृड्वीर्यरुग्राध्मानोद्गाराः स्युर्ग्रहणीगदे ।। ४८ ।।
पृथक् सर्वैश्चतुर्धाऽसौ तल्लिङ्गमतिसारवत्।
विडामं पूत्यप्सु मज्जेत् सद्व्रस्निग्धशब्दरुक् ।। ४९ ।।
त्वङ्मांसमेदः सन्दूष्य गुदेऽर्शांस्यङ्कुरान्मलाः ।
कुर्युः षोढा पृथग् दोषाः सर्वैर्द्वे सहजास्त्रजे ।। ५० ।।
शोथाग्निमान्द्याविष्टम्भसक्थिपीडाऽल्पविट्कता ।
पाण्डुताऽस्रक्षयाबल्याध्मानोद्गारा रुजोऽर्शसाम् ।। ५१ ।।
प्रागुक्तदोषचिह्नैस्तु दोषानर्शस्सु लक्षयेत् ।
त्रिदोषचिह्नं सहजमस्रस्रावि तदस्रजम् ।। ५२ ।।
बाह्यमध्यान्त्यवलिजान्येकद्वित्रिमलानि च।
तानि साध्यानि कष्टानि न साध्यानि वदेत् क्रमात् ।। ५३ ।।
अजीर्णं भुक्तिवैषम्याद्रेको वान्तोऽस्य विड्ग्रहः।
स्युर्विष्टब्धविदग्धामाख्यान्यजीर्णानि वै क्रमात् ।। ५४ ।।
रसशेषश्चतुर्थं तद्विष्टब्धे शूलविड्ग्रहौ।
विदग्धेऽम्लः सधूमश्चोद्गारो ह्याम सा भुक्तवान् ।। ५५ ।।
रसशेषेऽन्नविद्वेषः पूर्वत्रिभ्यो विसूचिका।
वम्यतीसारतृट्शूलभ्रमोद्वेष्टनतोदनी ।। ५६ ।।
मूत्राघातास्त्रज्वरकम्पारतिमोहैर्न सिध्यति ।
वृद्धातिवृद्धक्षीणैस्तैर्भस्मकोऽत्यशनो गदः ।। ५७ ।।
ज्वरो विवर्णता शूलो हृद्रोगः श्वसनं भ्रमः।
अन्नद्वेषोऽतिसारश्च सञ्जातकृमिलक्षणम् ।। ५८ ।।
अतिव्यवायमद्याम्लदिवास्वप्नमृदादिभिः ।
पाण्डवः पञ्च तैर्भिन्नैः पञ्चमो मृदः ।। ५९ ।।
पाण्डुत्वङ्नेत्रविण्मूत्रनखैः शोथवमिज्वरैः ।
विण्संज्ञश्वासाग्निमान्द्यैश्च युक्तः स्यात् पाण्डुरोगवान् ।। ६० ।।
292 शार्ङ्गधरसंहिता
अन्तःशोथी मध्यकृशो मध्यशोथ्यन्तदुर्बलः । अत्यजीर्णपटुस्निग्धाद्दह्यगर्भकृमिद्रुतैः ।
किं वा ज्वरातिसारी च पाण्डुरोगी न सिध्यति॥६१॥ दोषैः पृथक् समस्तैश्चाहृद्यैः पञ्चविधा वमिः॥८०॥
पीतत्वङ्मूत्रविण्नेत्रबहुपित्तात् तु कामला। श्यामं वातेन पित्तेन पीतं श्वेतं कफेन च।
सैव 'वृद्धा कृष्णपीतत्वगादिः कुम्भकामला॥६२॥ सर्वैश्चित्रं वमेद् गर्भाद् बीभत्सादीक्षणादपि॥८१॥
दुष्टं पित्तं विदूष्यास्त्रं सह तेन बहिर्बिलैः। कासः श्वासो ज्वरो हिक्का तृष्णा वैचित्त्यमेव च।
ऊर्ध्वं चाधो द्विधा वैति रक्तपित्तं तदुच्यते॥६३॥ हृद्रोगस्तमकश्चैव ज्ञेयाश्छर्देरुपद्रवाः॥८२॥
सश्लेष्मोर्ध्वमधः स्वैरं द्विमार्गं सकफानिलम्। सततं यः पिबेद् वारि न तृप्तिमुपगच्छति।
साध्यं याप्यमसाध्यं च रक्तपित्तं क्रमाद् वदेत्॥६४॥ पुनः काङ्क्षति तोयं यस्तं तृष्णाऽर्दितमादिशेत्॥८३॥
ज्वरापाकवमिश्वसतृट्कासाबल्यपाण्डुताः । पित्तं तालुगतं क्रुद्धं सवातं कुरुते तृषाम्।
भुक्ते दाहः शिरस्तापो रेकोऽसृक्चास्रपित्ततः॥६५॥ सा सप्तधा पृथक् तैश्च क्षतामक्षयभोजनैः॥८४॥
अतिव्यवायव्यायामव्रणशोकज्वराध्वभिः । शीताद् विवर्धते वातान्न पित्ताज्जाड्यकृत्कफात्।
शोषान् कुर्वन्ति ते क्रुद्धा यक्ष्माणं तु कफोल्बणाः॥६६॥ तृट् त्रिलिङ्गाऽऽमजाघातास्रक्षयाभ्यां क्षतोद्भवा॥८५॥
कराङ्घ्रिदाहः पार्श्वार्सरुक्कफास्रवमिज्वरैः। रसक्षयात् सहृत्पीडा पट्वाद्याधिक्यतोऽन्नजा।
वैस्वर्यक्षुद्रकश्र्वासकासमस्तकगौरवम् ॥६७॥ मोहज्वरश्वासकासकर्त्री तृष्णा न सिध्यति॥८६॥
शुक्लेक्षणत्वं मांसेच्छा रिरंसा च क्षयाकृतिः। संज्ञास्रोतांसि ते रुद्ध्वा विशन्ति करणानि चेत्।
उरःक्षते स्याद्रुक्पूतिकफपूयास्रवान्तियुक्॥६८॥ क्रुद्धपित्तास्तदा मर्त्या मूर्च्छन्ति गतचेतनाः॥८७॥
कासातिसारपार्श्वार्त्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः । सप्त मूर्च्छाः पृथक् सर्वैस्तैश्च मद्यविषास्रतः।
षड्भिरेभिः क्षयोऽसाध्यः किं वाऽसृक्कसनज्वरैः॥६९॥ दोषवर्णं वियत्पश्यन् दोषैर्मूर्च्छति चासवात्॥८८॥
प्राणः सघोषः सोदानो वक्त्रात् प्रेति यदा सतृट् । असौम्यः सप्रलापोऽथ दाहहृत्कम्पवान्विषात्।
स कासः पञ्चधा भिन्नैस्तैः क्षतेन क्षयेण च॥७०॥ पित्तवद्रक्तगन्धेन संन्यासोऽस्तेन्द्रियक्रियः॥८९॥
कासते शुष्कमनिलात् पित्तात् पीतं वमेत् कटु। मद्यं पीतमयुक्त्या तैः कुर्यात् पानात्ययांश्चतुः।
कफात् स्वादु कफं चान्त्यावसाध्यावुक्तलक्षणौ॥७१॥ वमिर्मूर्च्छा ज्वरो दाहः प्रलापश्च भ्रमोऽरुचिः॥९०॥
पूर्ववत् कुरुते प्राणो हिक्काः पञ्च गतिक्रमात्। रेकास्वजारतिकफाः पानाजीर्णस्य लक्षणम्।
अन्नजाऽऽहारबाहुल्याद्यामिका द्वित्रिवेगिनी॥७२॥ पानोष्मा त्वग्गतो दाहं सपित्तास्रः करोत्यति॥९१॥
हिक्का क्षुद्रा जत्रुमन्दा गम्भीरा नाभिकम्पकृत्। भीशोककामदुष्टान्नः पूज्यदेशावधर्षणैः।
कम्पयत्यङ्गमखिलं महत्यन्ते न सिध्यति॥७३॥ मादयन्ति मनोदोषाः स्यादुन्मादस्ततोद्भूताः॥९२॥
अधश्चोर्ध्वं कफो वातो यात्यायाति मुहुर्यदा। अस्थाने हास्यगीताद्यैर्ह्रीधीस्वज्ञविपर्ययैः।
कफरुद्धगतिर्विष्षक् तदा श्वासान् करोत्यसौ॥७४॥ रहस्यकथनोद्वेगभ्रमैरुन्मादमादिशेत् ॥९३॥
महोर्ध्वच्छिन्नतमकक्षुद्राख्यान् स्वगतिक्रमात्। दोषैर्व्यस्तैः समस्तैश्च विषशुग्भ्यां स षड्विधः।
महंता निःश्वसित्युच्चैरूर्ध्वेनोर्ध्वमधो न तु॥७५॥ दोषाङ्गाः पूर्ववच्छोकभीकामाद्यैस्तु तत्कथः॥९४॥
विच्छिन्नवेगं छिन्नेन तमकेनातिमूर्छकम्। देवदैत्यपिशाचाहिरक्षोगन्धर्वयक्षतः ।
क्षुद्रेण श्वसनेनाल्पं पूर्वे साध्या न ते त्रयः॥७६॥ पितृतश्च ग्रहैभ्यः स्युरुन्मादाः प्रोक्तलक्षणाः॥९५॥
अत्युच्चभाषणाताद्यैः क्रुद्धैर्दोषैः स्वरामयः। पावित्र्यं देवविद्वेषो नग्नत्वं सर्पवद्गतिः।
षोढा पृथक् सद्धस्ते स्यान्मेदसा च क्षयेण च॥७७॥ बहुभुक्त्वं गानदाने श्राद्धं चेति तदाकृतिः॥९६॥
स्वनिदानस्वरूपास्ते न तु साध्यास्त्रयोऽन्तिमाः। कम्पनिद्राफेनवमिद्रुमादिपतनादिभिः ।
स्वाद्वप्यन्नं मुखे चेन स्वदतेऽसावरोचकः॥७८॥ त्रयोदशेऽब्देऽतीते तु नोन्मादी जातु जीवति॥९७॥
स पञ्चधा पृथक् सर्वैस्तैः परो रुग्भयादिभिः। दोषोद्रेकात् प्रनष्टायां स्मृतौ सत्यामपस्मृतिः।
अरोचके मुखं वक्तृदृशं प्राक्तनमन्तिमे॥७९॥ तदाकृदस्तमःप्रवेशदन्तनेत्रादिवैकृतम् ॥९८॥