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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 356 में से

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पृष्ठ 318

282 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

दृष्टिरोगेष्वष्टशतमधिमन्थे सहस्त्रकम्।
सहस्रं वातरोगेषु धार्यमेवं हि तर्पणम् ।। 47 ।।
वायु, धूप तथा धूल से रहित स्थान में रोगी को चित्त
(सीधा) लिटा दें और उसकी आँख के चारों ओर दृढ़,
बाधारहित तथा उड़द की पीठी के गोल आधार (थाले) बना
दें, फिर इसे उष्ण जल द्वारा पिघलाये हुये घी अथवा सौ बार
ये धोये हुये घृत से अथवा दूध से निकाले हुये घी से भर दें।
उक्त पदार्थ उतना ही भरना चाहिये, जितने से आँख के वाल
डूब जायें। यह द्रव आँख को बन्द कर भरना चाहिये। तत्पश्चात्
रोगी आँख को धीरे-धीरे खोलने का यत्न करें। वर्त्म (बरौनी)
के रोगों में सौ मात्रा (3-4 मिनट), कफ के रोगों में अथवा
सन्धि के रोगों में पाँच सौ मात्रा (15-20 मिनट), शुक्ल
भाग के रोगों में छः सौ मात्रा कृष्णभाग के रोगों में सात सौ
मात्रा, दृष्टि रोगों में आठ सौ तथा अधिमन्थ तथा वायु के
रोगों में एक हजार मात्रा परिमित समय तक तर्पण को धारण
करना चाहिये।

तर्पण के पश्चात् कर्म

स्विन्नेन यवपिष्टेन स्नेहवीर्य्येरितं ततः।
यथास्वं धूमपानेन कफमस्य विशोधयेत् ।। 48 ।।
तर्पण के पश्चात् स्नेह की शक्ति से बढ़े हुये कफ को
गर्म की हुई जौ की पीठी (जौ के आटे को जल से सानकर
और गर्मकर बनायी हुई पीठी) के उबटन से अथवा धूमपान
से शोधन कर दें।

तर्पणकाल तथा सम्यक् तर्पण का लक्षण

एकाहं वा त्र्यहं वापि पञ्चाहं चेष्यते परम्।
तर्पणे तृप्तिलिङ्गानि नेत्रेष्वेतानि भावयेत् ।। 49 ।।
सुखस्वप्नावबोधत्वं विशदं वर्णपाटवम्।
निवृत्तिर्व्याधिशान्तिश्च क्रियालाघवमेव च ।। 50 ।।
तर्पण का प्रयोग एक दिन तीन दिन अथवा पाँच दिन
तक करना चाहिये और तर्पण करने से ये 'तृप्ति लक्षण'
उत्पन्न हो जाते हैं। यथा-सुख से नींद आना तथा अवबोध
(जागना) होना, आँख में विशदता (चिपचिपाहट न रहना),
व्रण स्थान का स्वाभाविक हो जाना, रोग की ओर से निश्चिन्त
हो जाना, व्याधि का शान्त हो जाना और नेत्र की क्रिया में
लघुता (देखने की शक्ति का प्राप्त होना)।
वक्तव्य— जब तक उक्त लक्षण उत्पन्न न हो जायें तब
तक तर्पण का प्रयोग करते रहें।


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

अतितर्पण-हीनतर्पण तथा उनका उपचार

अथ साश्रु गुरु स्निग्धं नेत्रं स्यादतितर्पितम्।
रूक्षमस्राविलं रुग्णं नेत्रं स्याद्धीनतर्पितम् ।। 51 ।।
रूक्षस्निग्धोपचाराभ्यामेतयोः स्यात् प्रतिक्रिया।
तर्पण के अतियोग से नेत्र अश्रुयुक्त, भारी तथा स्निग्ध
हो जाते हैं और हीनयोग से रूक्ष, आँसुओं से व्याप्त तथा
रुग्ण (रोगी) हो जाते हैं। इन दोनों का प्रतिकार क्रमशः रूक्ष
तथा स्निग्ध चिकित्सा-विधियों द्वारा करना चाहिये।

पुटपाक-विधि

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पुटपाकस्य साधनम् ।। 52 ।।
द्वौ बिल्वमात्रौ मांसस्य पिण्डौ स्निग्धौ सुपेषितौ।
द्रव्याणां बिल्वमात्रं तु द्रवाणां कुडवो मतः ।। 53 ।।
तदेकस्थं समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम्।
पुटपाकेन तत् पक्त्वा गृह्णीयात् तद् रसं बुधः ।। 54 ।।
तर्पणोक्तविधानेन यथावदुपचारयेत्।
दृष्टिमध्ये निषेच्यः स्यान्नित्यमुत्तानशायिनः ।। 55 ।।
इसके पश्चात् 'पुटपाक' का साधन कहा जाता है। दो
पल मांस लेकर उसे पीसकर पिण्ड बना लें और उपयोगी
द्रव्य एक-एक पल लेकर उनको भी पीस लें। फिर दोनों को
एक साथ मिलाकर पत्तों से लपेट दें, तत्पश्चात् पुटपाक की
विधि से पकाकर उसका रस निचोड़ लें, फिर इस रस को
तर्पण की विधि से थाला बनाकर प्रयोग करें अथवा चित्त
लिटाये हुये रोगी का आँख प्रतिदिन निषेचन (सेक) करें।

पुटपाक के भेद

स्नेहनो लेखनश्चैव रोपणश्चेति स त्रिधा।
हितः स्निग्धोऽतिरूक्षस्य स्निग्धस्यापि हि लेखनः ।। 56 ।।
दृष्टेर्बलार्थमितरः पित्तासृग्व्रणवातनुत्।
पुटपाक तीन प्रकार का होता है— 1. स्नेहन (स्निग्ध
करने वाला), 2. लेखन (रूक्ष करने वाला) और 3. रोपण
(आँख के व्रणों को भरने वाला)। अतिरूक्ष नेत्र में स्नेहन,
अतिस्निग्ध में लेखन, दृष्टि का बलवर्द्धन करने तथा पित्त
एवं रक्त के व्रणों को नष्ट करने के लिए रोपण पुटपाक का
प्रयोग करें।

पुटपाक के योग

सर्पिर्मांसवसामज्जामेदःस्वाद्वौषधैः कृतः ।। 57 ।।
स्नेहनः पुटपाकस्तु धार्यो द्वे वाक्शते दृशोः।
जाङ्गलौनां यकृन्मांसैर्लेखनद्रव्यसंयुतैः ।। 58 ।।