शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 356 में से
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द्वादशोऽध्यायः] शोणितस्रावविधिः 273
वक्तव्य—उक्त लक्षणों को देखकर रक्त के बिगड़ने तथा
घटने का निश्चय कर तदनुसार उसकी चिकित्सा करनी
चाहिये।
वातदूषित रक्त के लक्षण
अरुणं फेनिलं रूक्षं परुषं तनु शीघ्रगम्।
अस्कन्दि सूचिनिस्तोदि रक्तं स्याद् वातदूषितम्।। 8 ।।
वायु से दूषित रक्त अरुण (कालापन लिये लाल), फेनिल
(झागवाला), रूक्ष (उचित स्निग्धता से रहित), परुष
(खरखरा), तनु (पतला), शीघ्रगामी (अधिक गतिशील),
अस्कन्दी (देर से जमने वाला) तथा सूची निस्तोदी (सुई के
चुभने की-सा पीड़ा करने वाला) होता है।
पित्तदूषित रक्त के लक्षण
पित्तेन पीतं हरितं नीलं श्यावं च विस्रकम्।
अस्कन्द्युष्णं मक्षिकाणां पिपीलानामनिष्टकम् ।। 9 ।।
पित्त से दूषित रक्त पीला हरा नाला काला दुर्गन्धियुक्त न
जमने वाला, उष्ण तथा चींटियों तथा मक्खियों का अप्रिय
होता है।
कफदूषित रक्त के लक्षण
शीतलं बहलं स्निग्धं गैरिकोदकसंनिभम्।
मांसपेशीप्रभं स्कन्दि मन्दगं कफदूषितम् ।। 10 ।।
कफ से दूषित रक्त शीत (इसमें रक्त का ताप सौ 100
डिग्री से घट जाता है), बहल (गाढ़ा), स्निग्ध (अधिक
स्निग्ध), गेरू घुले हुये जल जैसा, मांसपेशियों जैसा, शीघ्र
जमने वाला तथा मन्दगामी होता है।
द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रक्त के लक्षण
द्विदोषदुष्टं संसृष्टं त्रिदुष्टं पूतिगन्धकम्।
सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं च जायते।। 11 ।।
दो-दो दोषों से दूषित रक्त में दो-दो दोषों के सम्मिलित
लक्षण पाये जाते हैं, तीन दोषों से दूषित रक्त अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त
तथा सभी दोषों के उक्त लक्षणों से युक्त तथा काँजी जैसा
होता है।
वक्तव्य—यहाँ दो-दो दोषों का नामतः उल्लेख नहीं
किया गया है, अतः आप रक्त परीक्षणकाल में दोषों का
नाम-निर्धारण स्वयं कर लें।
विषदूषित रक्त के लक्षण
विषदुष्टं भवेच्छ्यावं नासिकोन्मार्गरं तथा।
विस्रं काञ्जिकसङ्काशं सर्वकुष्ठकरं बहु ।। 12 ।।
विष से दूषित रक्त काला, नाक से निकलने वाला,
दुर्गन्धियुक्त, काँजी जैसा, सभी प्रकार के कुष्ठों का उत्पादक
तथा मात्रा में अधिक होता है।
शुद्ध रक्त के लक्षण
इन्द्रगोपप्रभं ज्ञेयं प्रकृतिस्थमसंहतम्।
बीरबहूटी की कान्ति वाला तथा असंहत (तरल या
ग्रन्थियों से रहित) रक्त शुद्ध होता है।
वक्तव्य—यहाँ पर शुद्ध रक्त के लक्षणों की परिचायिका
एक पंक्ति इस प्रकार उपलब्ध होती है। यथा—'गुञ्जाफलसवर्णं
पद्मालक्तकसन्निभम्'। अर्थात् गुंजाफल के सदृश वर्ण वाले,
लाल कमल तथा लाक्षारस के समान वर्ण वाले रक्त को
प्रकृतिस्थ (शुद्ध) समझना चाहिये। विशेष अध्ययन के लिये
देखे-च० सू० अ० 24 तथा सु० सू० अ० 14 ।
रक्तस्राव के योग्य रोग
शोथे दाहेऽङ्गपाके च रक्तवर्णेऽसृजः स्रुतौ ।। 13 ।।
वातरक्ते तथा कुष्ठे सपीडे दुर्जयेऽनिले।
पाणिरोगे श्लीपदे च विषदुष्टे च शोणिते ।। 14 ।।
ग्रन्थ्यर्बुदापचीक्षुद्ररोगरक्ताधिमन्थेषु ।
विदारीस्तनरोगेषु गात्राणां सादगौरवे ।। 15 ।।
रक्ताभिष्यन्दतन्द्रायां पूतिघ्राणास्यदेहके।
यकृत्प्लीहविसर्पेषु विद्रधौ पिटिकोद्गमे ।। 16 ।।
कर्णौष्ठघ्राणवक्त्राणां पाके दाहे शिरोरुजि।
उपदंशे रक्तपित्ते रक्तस्रावः प्रशस्यते ।। 17 ।।
शोथ (व्रणशोथ), दाह, अंगपाक (किसी अवयव का
पाक होना) रक्तवर्ण के रक्तस्राव (लोहितस्राव में नहीं),
वातरक्त कुष्ठ पीड़ायुक्त दुःसाध्य वातरोग, पाणिरोग (बाहुरोग),
श्लीपद, विषदूषित रक्त, ग्रन्थि, अर्बुद, अपची तथा क्षुद्र
रोगों, रक्तजनित अधिमन्थ (नेत्ररोग विशेष), विदारी (प्लेग
की ग्रन्थि), स्तन रोगों की शिथिलता तथा भारीपन, रक्तजनित
अभिष्यन्द (दुःखती आँख), तन्द्रा, नाक, मुख तथा शरीर से
दुर्गन्धि आने पर, यकृत् विकार, प्लीहावृद्धि, विसर्प विद्रधि,
फुन्सियों के उत्पन्न होने, कान, ओठ, नाक एवं मुखपाक,
दाह, शिरोरोग, उपदंश तथा रक्तपित्त में रक्तस्राव कराना प्रशस्त
(हितकर) है।
वक्तव्य—उक्त पाठ में दाह शब्द दो बार आया है। अतः
एक दाह का अर्थ विदाह है, देखें—'विदाहश्चान्नपानस्थः'
च० सू० अ० 24 श्लोक 13। उक्त श्लोकों को च० सू० अ०
24 तथा सु० सू० अ० 20 में देखें।