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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 356 में से

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पृष्ठ 317

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 281
कुमारिकाग्निपत्रैर्वा दाडिमीपल्लवैरपि।
वचाहरिद्रानिम्बैर्वा तथा नागरगैरिकैः।। ३३।।
रसवत का लेप अथवा हरड़, सोंठ तथा तेजपत्ता का लेप
अथवा घीकुआर का गूदा तथा चीता के पत्तों का लेप अथवा
अनार के पत्तों का लेप अथवा वच, हल्दी तथा नीम के पत्तों
का लेप अथवा सोंठ और गेरू का लेप उक्त विधि से करने
पर नेत्र रोगों का नाश हो जाता है।
विडालक के योग (३)
दग्ध्वा ससैन्धवं लोध्रं मधूच्छिष्टयुते घृते।
पिष्टमञ्जनलेपाभ्यां सद्यो नेत्ररुजापहम्।। ३४।।
सेंधा नमक तथा लोध को जलाकर भस्म बना लें फिर
उसको मोममिश्रित घी में मिलाकर रख लें। इसका अञ्जन
तथा लेप शीघ्र ही नेत्र की पीड़ा को हरता है।
वक्तव्य-भस्म को भली-भाँति पीसकर और मोम को
घी में डालकर पिघला कर लेप तैयार कर लें। इसको आँख
के भीतर अंजन के रूप में तथा बाहर लेप के रूप में लगाया
जाता है।
विडालक के योग (४)
लोहस्य पात्रे सङ्घृष्टो रसो निम्बफलोद्भवः।
किञ्चिद् घनो बहिर्लेपान्नेत्रबाधां व्यपोहति।। ३५।।
लोहे की कड़ाही में नीम के पत्तों का रस डालकर घोटना
चाहिये। जब कुछ गाढ़ा हो जाये तो आँख के बाहर लेप कर
दें। यह भी नेत्र की पीड़ा को नष्ट करता है।
विडालक के योग (५)
सञ्चूर्ण्य मरिचं केशराजस्वरसमर्दनात्।
लेपनादर्मणां नाशं करोत्येष प्रयोगराट्।। ३६।।
मरिच के चूर्ण को भाँगरा के रस में पीसकर लेप
कर यह उत्तम योग सब प्रकार के अर्म रोगो का नाश करता
है।
विडालक के योग (६)
स्विन्नां भित्त्वा विनिष्पीड्य भिन्नामञ्जननामिकाम्।
शिलैलानतसिन्धूत्थैः सक्षौद्रैः प्रतिसारयेत्।। ३७।।
बरौनी पर होने वाली 'अञ्जन' नाम की फुन्सी का पहले
स्वेदन करें फिर भेदन कर निष्पीड़न करें। इसके पश्चात्
मैनसिल, इलायची, तगर तथा सेंधा नमक का चूर्ण मधु में
मिलाकर उस पर रगड़ देने से वह ठीक हो जाती है।
तर्पण-विधि
अथ तर्पणकं वच्मि नेत्रतृप्तिकरं परम्।
यदृक्षं परिशुष्कं च नेत्रं कुटिलमाविलम्।। ३८।।
शीर्णपक्ष्मशिरोत्पातकृच्छ्रोन्मीलनसंयुक्तम् ।
तिमिराजुर्नशुक्राद्यैरभिष्यन्दाधिमन्थकैः ।। ३९।।
शुष्काक्षिपाकशोथाभ्यां युक्तं वातविपर्ययैः।
तन्नेत्रं तर्पणे योज्यं नेत्ररोगविशारदैः ।। ४०।।
अब मैं 'तर्पण' की विधि का वर्णन करता हूँ, जो नेत्र
को तृप्त करने का परमोत्तम उपाय है। जो नेत्र, रूक्ष, शुष्क,
कुटिल, आविल (मलिन), जिसके बाल झड़ते हों या झड़
गये हों, जिसमें शिरोत्पात रोग हो (इस रोग से आँख की
सिरायें लाल हो जाती हैं), जो आँख कठिनता से खुलती हो,
जो तिमिर (धुन्ध), अर्जुन, शुक्र, (फूला), अभिष्यन्द,
अधिमन्थ शुष्काक्षिपाक, शोथ तथा वातविपर्यय नामक रोग
से पीड़ित हो, उसमें चतुर नेत्र-चिकित्सक का 'तर्पण' कर्म
का प्रयोग करना चाहिये।
तर्पण का निषेध
दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायासभ्रमेषु च।
अशान्तोपद्रवे चाक्षिण तर्पणं न प्रशस्यते ।। ४१।।
दुर्दिन (जिस दिन आकाश में बादल छाये हों) में,
अत्यन्त उष्ण तथा शांतिकाल में और चिन्ता, शोक तथा भ्रम
रोग से पीड़ित रोगियों की आँख में तथा आम दोष के उपद्रव
के लक्षणों से युक्त नेत्र में तर्पण का प्रयोग उचित नहीं होता है।
वक्तव्य-नेत्र रोगों के उपद्रव-नेत्र में पीड़ा का उत्पत्ति,
लालिमा, शोथ (सूजन), रगड़ लगना, चुभने की-सी पीड़ा
का होना, शूल तथा आँखों का आँसुओं से भरा रहना।
तर्पण-विधि
वातातरजोज्ञीने देशे चोत्तानशायिनः।
आधारौ माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिमण्डलौ ।। ४२।।
समौ दृढावसम्बन्धौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः।
पूरयेद् घृतमण्डेन विलीनेन सुखोदकैः ।। ४३।।
अथवा शतधौतेन सर्पिषा क्षीरजेन वा।
निमग्नान्यक्षिपक्ष्माणि यावत्स्युस्तावदेव हि।। ४४।।
पूरयेन्मीलिते नेत्रे तत उन्मीलयेच्छनैः।
धारयेद् वर्त्मरोगेषु वाङ्मात्राणां शतं बुधः ।। ४५ ।।
स्वच्छे कफे सन्धिरोगे मात्रापञ्चशतं हितम्।
शुक्ले च षट्शतं कृष्णे रोगे सप्तशतं मतम् ।। ४६।।