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सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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४०८ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्

३३ और ३४ के बीच का वह श्लोक लुप्त है, जिसमें—१. परुषवचन विरति और
२. सम्प्रलाप विरति का वर्णन आया होगा, किन्तु प्राध्यापक श्रीसूर्यनारायण चौधरी
के कथनानुसार ३३वें श्लोक में ही वाणी के चारों सुकर्मों का उल्लेख हो गया है।
अप्रिय नहीं कहने का तात्पर्य परुषवचन विरति तथा अहितकारी वचन न कहना
सम्प्रलाप विरति है। उनकी दृष्टि में श्लक्षण का अर्थ 'प्रिय' है।
१०।२५ यत्रायतांश्चैव ततांश्च तांस्तान् वाद्यस्य हेतून् सुषिरान् घनांश्च ।
फलन्ति वृक्षा मणिहेमचित्राः क्रीडासहायास्त्रिदशालयानाम् ॥
इस श्लोक में 'तत' शब्द का प्रयोग समुचित है। तत् का प्रयोग तांत या तार के
अर्थ में है। ऐसे वाद्ययंत्र, जिनका निर्माण तांत या तार से होता हो। यथा—तार से
निर्मित वाद्ययन्त्र—वीणा, सारङ्गी, सरोद, बेलां प्रभृति। इसी तरह अवनद्ध की जगह
आनद्ध शब्द का प्रयोग समुचित प्रतीत होता है, क्योंकि आनद्ध का सन्दर्भगत अर्थ
है—मढा हुआ। जैसे चमड़े से मढ़ा—ढोल, नगाड़ा, तबला, डुग्गी, मृदङ्ग प्रभृति।
इसी तरह 'सुषिर्' शब्द का तात्पर्य उस यंत्र-विशेष से है, जिनके रन्ध्रों में वायुकंपन से
स्वरोत्पन्न हो; जैसे—शंख, बाँसुरी, वंशी, शहनाई, बैंड, हारमोनियम प्रभृति। इसी
तरह 'घन' शब्द का अर्थ है—पारस्परिक आघात से बजने वाला यंत्र; जैसे—मजीरा,
झांझ, झाल, करताल प्रभृति। इसका उल्लेख प्राध्यापक श्रीचौधरी ने—कल्याण, हिन्दू
संस्कृति अंक पृ० ६९९ तथा इसी अंक का 'प्राचीन भारत के वाद्ययंत्र' का उद्धरण
दिया है।
डॉ० जोन्स्टन के अनुसार सौन्दरनन्द सर्ग १६ पद्य सं० २६ में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द
का प्रयोग निर्वाण के अर्थ में हुआ है। इसी तरह उसी सर्ग के श्लो० सं० २६ और
२७ दोनों को एक साथ मिलाकर अर्थ किया है, किन्तु प्राध्यापक चौधरी जी के
मतानुसार रचना और व्याकरण की दृष्टि से दोनों ही श्लोक एक-दूसरे से भिन्न हैं।
२६ के 'धर्म' और बारहवें सर्ग के १७वें पद के परमपद के समान ही यहाँ भी
दोनों को अलग-अलग ही रखा है। इस सन्दर्भ में १७।३१, ३२, ६५ और ७२
द्रष्टव्य है। चौधरी जी की दृष्टि में 'तृष्णा विराग का, तृष्णा विमुक्त और त्राण का
त्राणरूप समुचित अर्थ है। नैष्ठिकपद-परमपद-निर्वाण पद। बुद्धचरित १।२५ में।
'रुजो नराणां प्रशमं प्रयाताः' यह भी द्रष्टव्य है।

परिशिष्ट ( ग )
नामानुक्रमणी
अग्नि—अङ्गत्ति ऊर्ध्वं गच्छति, अग्+नि, नलोपश्च=देवता । ( ७।२७ )
अक्षमाला—कृतोऽक्षसूत्रप्रणयी तया करः=रुद्राक्ष की माला, यहाँ चाण्डाल-
कन्या का नाम । ( ७।२८ )
अङ्गद—अङ्गे दायति द्यति वा=आभूषण, वालिपुत्र, यहाँ एक तपस्वी । (७।३३)
अङ्गिरा—ऋग्वेद के अनेक सूक्तों के द्रष्टा एक प्रसिद्ध ऋषि । ( ७।३९ )
अजित—जेतुमशक्यः=यहाँ बौद्ध भिक्षु । ( १६।८९ )
अनङ्ग—न अङ्गम अनङ्गमू=अशरीरी, यहाँ काम । ( २।५९, ७।५० )
अनिरुद्ध—प्रद्युम्न का बेटा, यहाँ एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )
अन्तिदेव—एक राजा । ( ७।५१ )
अन्ध—दृष्टिहीन, यहाँ 'राम' । ( ७।५१ )
अब्ज शत्रु—अब्जः अप्सु जायते तस्य शत्रुः चन्द्रः=यहाँ एक नाम । (१०।५३)
अम्बरीष—लघु जन्तु, यहाँ एक राजा । ( ७।५३ )
अराड—बौद्धमतानुसार एक मोक्षवादी । ( ३।३ )
अर्जुन—पाण्डुपुत्र, यहाँ सहस्रबाहु राजा ( ९।७ )
अर्हन्—सर्वज्ञोऽजितरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः ।
यथास्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः ।। यहाँ भगवान् 'बुद्ध' ।
( ४।२९, १८।६१ ),
अश्वजित्—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८८ )
अश्विन्—अश्विनी कुमार । ( ७।२६ )
असित—जो सफेद न हो, यहाँ काश्यप पुत्र । ( ७।३२ )
अहल्या—मुनि गौतम की पत्नी, ब्रह्मा की आदिनारी सृष्टि । ( ७।२५ )
आङ्गिरस—अङ्गिरा की सन्तान, यहाँ बृहस्पति । ( १।४ )
आदित्य—आदित्यानामहं विष्णुः=बारह आदित्यों का समुदाय वाचक नाम
( देवगण ) । ( १।६१ )
आनन्द—आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन=एक बौद्ध भिक्षु। (५।३४)
आम्बिक—श्रीकृष्ण । ( १०।९ )
इक्ष्वाकु—इक्षुं इच्छाम् आकरोति इति=अयोध्या में राज्य करने वाले राजाओं
के पूर्वज । ( १।१८, २४ ),
इन्द्र—देवराज, इन्दतीति इन्द्रः ऐश्वर्ये । ( १०।३५, ११।४८ )
इलिविलि—एक राजा । ( ११।४५ )

४१० सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
उग्रतप—मुनि गौतम । ( ८।३५ )
उद्रक—एक ऋषि । ( ३।३, ११।५६ )
उत्तर—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )
उपसेन—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )
उपालि—बौद्ध संन्यासी । ( १६।८९ )
उपेन्द्र—उपगत इन्द्रम् अनुजत्वात् = विष्णु का पाँचवां अवतार । ( ११।४९ )
उर्वशी—ऊरून् महतोऽपि अश्नुते वशीकरोतीति = इन्द्रलोक की एक प्रसिद्ध
अप्सरा । ( ७।३८, ३२ )
ऋष्यशृङ्ग—विभाण्डक मुनि का पुत्र, दशरथ पुत्री शान्ता का पति । ( ७।३४ )
ऐड—कुबेर तथा एक राजर्षि । ( ७।३८ )
ऐरावत—इन्द्र-गज । ( २।५० )
कंस—श्रीकृष्ण के मामा, उग्रसेन के पुत्र, मथुरा के राजा । ( ९।१८ )
ककन्द—एक तापस । ( १।५८ )
कण्व—एक ऋषि, शकुन्तला के धर्मपिता । ( १।२६ )
कन्दर्प—मन्मथ । ( ४।८, ७।३६ )
कपिञ्जलाद—अक्षमाला का पुत्र । ( ७।२८ )
कपिल—सांख्य दर्शन के प्रवर्त्तक, एक महान् ऋषि । ( १।१, २२, ५७, ५८ )
कपिलवास्तु—बुद्ध की जन्मभूमि । ( १।५७, ३।१, १७ )
कप्पिन—बौद्ध संन्यासी । ( १६।९० )
काक्षीवान्—एक तपस्वी का नाम । ( १।१ )
कात्यायन—एक बौद्ध संन्यासी । ( १६।८० )
काप्य—बौद्ध भिक्षु । ( १६।९१ )
काम—मदन, मन्मथ, चित्तोद्भव, पुष्पकेतु । ( १३।३६ )
कार्त्तवीर्य—कृतवीर्य का पुत्र, हैहयदेश का राजा, सहस्रबाहु । ( ९।१७ )
काल—प्रवृत्तिप्रेरक । ( १६।१७ )
काली—मत्स्यकन्या, व्यास की माता, सत्यवती । ( ७।४४ )
काव्य—दैत्य-गुरु शुक्राचार्य । ( १।४ )
काशी—आधुनिक वाराणसी । ( ३।१५, ७।३० )
काश्यप—एक प्रसिद्ध ऋषि का नाम । ( १।२, ७।३२ )
काश्यप—और्विल्य भिक्षु । ( १६।९० )
किन्नर—एक देवयोनि । ( १।४८, ८।१२ )
किन्नरी—किन्नर-पत्नी । ( ४।१०, ६।३५, १०।१३ )
किम्पुरुष—यह भी किन्नर जाति का एक भेद है । ( ४।१० )
किरात—किरं पर्यन्तभूमिम् अतति गच्छतीति किरातः=एक पतित पहाड़ी जाति,
जो शिकार करके अपनी जीविका चलाती है, पहाड़ी । ( १०।१२ )

नामानुक्रमणी ४११
कुण्ठधान—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।९१ )
कुमुद्वती—कमल का पौधा, यहाँ एक नारी-विशेष या नदी । ( ८।४४ )
कुरु—कौरवों के पूर्वज, एक प्रतापी राजा । ( ३।४२ )
कुरु—वंश-विशेष । ( ८।४५ )
कुरु—कौरव । ( ९।२० )
कुश—सीता के पुत्र । ( १।२६ )
कुशाम्ब—ऋषि-विशेष का नाम । ( १।५८ )
कृतयुग—सत्ययुग । ( ३।४१ )
कृमिल—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )
कृष्ण—देवकी-वसुदेव सुत, कंसहन्ता गोपालकृष्ण । ( १।२३ )
केशी—श्रीकृष्ण का विशेषण, तुरंगराज ( १।१८ )
कोटिकर्ण—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८८ )
कोन्देय—बौद्ध भिक्षु । ( १६।९१ )
कौण्डिन्य—एक भिक्षु । ( ३।१३, १६।८७ )
कौत्स—गोत्र-विशेष । ( १।२२ )
कौष्ठिल्य—भिक्षु । ( '१६।९१ )
क्षेमा—भिक्षुणी । ( '१६।८९ )
गङ्गा—एक पवित्र नदी । ( ७।४०-४१ ),
गङ्गा—शन्तनु की पत्नी, भीष्म की माता । ( ७।४१ )
गद—वृष्णिवंशीय यादव । ( ९।२४ )
गन्धर्व—योनि-विशेष । ( ७।१० )
गया—एक तीर्थस्थान । ( ३।५ )
गवाम्पति—बौद्ध भिक्षु । ( १६।९१ )
गाधिज—गाधिपुत्र मुनिविश्वामित्र । ( ७।३५ )
गार्ग्य—राम । ( १।२३ )
गिरिव्रज—राजगृह । ( १।४२, ३।१५ )
गोदत्त—एक भिक्षु । ( १६।८८ )
गौतम—एक उग्र तपस्वी । ( ८।४५ )
गौतम—कपिलमुनि । ( १।२२, २५ )
गौतम—कांक्षीवान् । ( १।९ )
गौतम—एक गोत्र-विशेष । ( १।२२-२३ )
गौतम—बुद्ध । ( ३।१६, १०।५८ )
घृताची—एक सुन्दर अप्सरा । ( ७।३५ )
चारण—भ्रमणशील तीर्थयात्री । ( १०।६ )
चित्तोद्भव—मदन । ( ७।४२ )

४१२ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
चुन्द—एक भिक्षु । ( १६।९१ )
चैत्ररथ—तपोवन । ( २।५३, ११।५० )
जनमेजय—जनान् एजयतीति जनमेजयः = हस्तिनापुर का एक प्रसिद्ध राजा,
परीक्षित का पुत्र एवं पाण्डव अर्जुन का पोता । ( ७।४४ )
जरा—व्याध । ( ९।१८ )
जह्नु—सुहोत्र का पुत्र एक प्राचीन राजा, जिसने गंगा को अपनी पुत्री के रूप में
गोद लिया था, यही कारण है कि गंगा जाह्नवी, जह्नुसुता, जह्नुतनया के
नाम से जानी जाती है । ( ७।४० )
तथागत—भगवान् बुद्ध । ( ३।२०, ४।२४ )
तालजङ्घ—एक नाम । ( ७।३९ )
तिष्य—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।९० )
तिष्य—बुद्ध का एक शिष्य । ( १६।९० )
तुरङ्गराज—केशी का दूसरा नाम । ( ९।१८ )
तुषित—देव-विशेष । ( २।४८, ५५ )
दशबल—भगवान् बुद्ध का नाम । ( ४।४६ )
दशशतलोचन—देवराज इन्द्र । ( १।६१ )
दिति—कश्यपपत्नी । ( ९।१९ )
दिलीप—एक प्रतापी राजा, सुदक्षिणा के पति तथा रघु के पिता । ( ७।३२ )
दीर्घतपस—एक तपस्वी । ( १।४ )
दौष्यन्ति—राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भरत । ( १।३६ )
द्रमिड़—रम्भा नामक अप्सरा के प्रेमी ( ६।४९ )
द्रव्य—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )
द्वैपायन—वेदव्यास । ( ७।२९-३० )
धौतकि—एक बौद्ध भिक्षु । (१६।८७)
नन्द—बुद्ध के अनुज । ( २।५७, ६३, ४।१, ४ )
नन्द—बौद्ध भिक्षु । (१६।८७)
नन्द—भिक्षु । (१६।९०)
नन्दक—भिक्षु । (१६।८९)
नन्दमाता—भिक्षुणी । (१६।८९)
नन्दन—इन्द्रकानन । (४।६, ११।१)
नमुचि—एक दैत्य । (९।१९)
नरदम्यसारथि—भगवान् बुद्ध । (१८।५१)
नहुष—एक चन्द्रवंशी राजा, ययाति का पिता, पुरूरवा का पोता और आयुस्
का पुत्र, सप्तर्षियों को एक बार इसने पालकी में जोतकर अगस्त्य के श्राप से
सर्पयोनि में गया । (११।४४)

नामानुक्रमणी ४१३
परशुराम—क्षत्रियद्रोही भृगुपुत्र, वीरऋषि । (१।२५)
पराशर—एक प्रसिद्ध ऋषि । (७।२९)
पाण्डु—पाण्डवों के पिता, प्रसिद्ध राजा । (७।४५)
पाताल—रसातल । (११।४७)
पारिपात्र—(पर्वत) । (२।६२)
पुरुहूत—इन्द्र । (१।५९)
पुष्पकेतु—कामदेव । (७।२)
पुरु—एक पौराणिक राजा । (३।४२)
पूर्ण—बौद्ध भिक्षु । (१६।९०)
पूर्ण—भिक्षु । (१६।९०)
पूर्णक—बौद्ध भिक्षु । (१६।९०)
पूर्णशोणापरान्त—एक बौद्ध सन्यासी । (१६।९०)
प्रमद्वरा—राजा रुरु की पत्नी । (७।३७)
बल—बलदेव जी । (१०।८)
बुद्ध—तथागत । (४।२७, ४२)
बुध—ऐड़ का पिता । (७।२८)
बृहद्रथा—एक तापसी । (८।४४)
बोधिसत्त्व—भगवान् बुद्ध । (२।४८)
ब्रह्मलोक—जहाँ विधाता का निवास है । (११।५७)
ब्रह्मा—स्रष्टा । (७।३१)
भगवान्—तथागत । (४।३०, ५।८)
महालि—एक भिक्षु । (१६।८८)
भद्रजित्—एक भिक्षु । (१६।८८)
भद्रायण—एक भिक्षु । (१६।८८)
भरत—दुष्यन्त-शकुन्तला पुत्र । (१।२६)
भामिनी—नन्दपत्नी सुन्दरी । (४।३)
भार्गव—एक महर्षि । (१।२५)
भार्गव—परशुराम । (९।१७)
भीमक—एक सुदृढ़ राजा । (७।४३)
भूरिद्युम्न—एक राजर्षि । (११।४६)
भृगु—एक भिक्षु । (१६।६१)
मकन्द—एक महर्षि । (१।५८)
मघवा—इन्द्र । (७।२५)
मदन—एक ऋषि । (७।४५)
मधु—महीने का नाम । (२।५९, ७।२६)
सौ०-30

४१४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
मध्यदेश—विन्ध्याचल और हिमाचल के बीच कोशी-कुरुक्षेत्र । (२।६२)
मनु—सूर्यवंश के प्रवर्त्तक स्वायम्भुव मनु । (३।४१)
मन्दर—मन्दराचल पर्वत । (१।४८)
मन्दाकिनी—स्वर्गगंगा । (११।५०)
मरुत्—पवनदेव । (१।६२, २।५४)
महाह्वय—महानाम भिक्षु । (१६।८९)
माद्री—पाण्डु की प्रिय पत्नी । (७।४५)
मानिनी—नन्द की पत्नी, सुन्दरी । (४।३)
मान्धाता—मां धास्यति इति मान्धातु= मान्धाता युवनाश्व का पुत्र, एक सूर्य-
वंशी राजा, यह अपने पिता के पेट से उत्पन्न हुआ था । ( १।४३ )
माया—शुद्धोदन की पत्नी, एक रानी । ( २।४९ )
मार—काम, यहाँ इसका अर्थ शैतान है। ( ३।७-८, १८।२८ )
मीनरिपु—शूर्पंक । ( ८।४४ )
मेधिक—एक भिक्षु । ( १६।८९ )
मेनका—शकुन्तला की माता एक अप्सरा । ( ७।३९ )
मेरु—एक पहाड़ का नाम । ( १२।२९ )
मैथिलेय—सीता देवी के पुत्र लव और कुश । ( १।२६ )
मैनाक—मेनकायाः भवः मैनाकः=हिमालय और मेनका के पुत्र, एक पहाड़ ।
( ७।४० )
मोहराज—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )
मौद्गल्य गोत्र—मौद्गल्यायन एक भिक्षु । ( १६।९१ )
यदृच्छा—प्रवृत्ति का कारण, या संयोग । ( १६।१७ )
यमुना—रथीतर की माता । ( ७।३३ )
ययाति—'यस्यवायोरिव यातिः, सर्वत्र रथगतिर्यस्य'=एक प्रसिद्ध चन्द्रवंशी राजा
का नाम, नहुष का पुत्र और शुक्राचार्य की बेटी देवयानी का पति ।
( १।५९, ११।४६ )
यश—एक बौद्ध संन्यासी । ( १६।८९ )
यशोद—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८९ )
रघु—'लङ्घति ज्ञानसीमानं प्राप्नोति' लङ्घ + कु, नलोपः, लस्य रः = रघुः,
एक प्रसिद्ध राजा, दिलीप का पुत्र और अज का पिता । ( ३।४२ )
रति—कामदेव की पत्नी 'साक्षात्कामं नवमिव रतिः । ( ४।८ )
रथीतर—एक तपस्वी । ( ७।३३ )
रम्भा—नल-कुबेर की पत्नी जो इन्द्र के स्वर्ग में सर्वाधिक सुन्दरी अप्सरा मानी
जाती है । ( ६।४९, ७।३६ । )
राजगृह—बिहार का एक दर्शनीय स्थान । ( १।४२, ३।१५ )
राध—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८७ )

नामानुक्रमणी ४१५
राम—बलराम । ( १।२३ )
राष्ट्रपाल—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८९ )
रुरु—प्रमद्वरा का पति । ( ७।३७ )
रेवत—बौद्ध संन्यासी । ( १६।९१ )
लक्ष्मी—विष्णुप्रिया, देवी । ( ६।२६, ४६ )
लव—मैथिली एवं श्रीराम के सुपुत्र । ( १।२६ )
वज्रधर—देवराज इन्द्र । ( १०।१८ )
वत्स—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८८ )
वाराणसी—आधुनिक वरुणा नदी । ( ३।१० )
वल्कलि—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८९ )
वसन्त—ऋतुराज । ( ५।२०, ७।२१ )
वसिष्ठ—श्रीराम के कुलगुरु, एक प्रसिद्ध मुनि । ( १।३, ७,२८ ) .
वागीश—एक भिक्षु । ( १६।८९ )
वाल्मीकि—वल्मीकेः भवः 'अण्, इञ् वेति'=एक विख्यात मुनि तथा रामायण के
प्रणेता । ( १।२६ )
वाष्प—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८९ )
वासव—इन्द्र । ( ९।१९ )
वासुभद्र—श्रीकृष्ण । ( १।२३ )
विधि—प्रकृति का कारण । ( १६।१७ )
विनायक—भगवान् बुद्ध । ( ३।२६, ५।५०, १३।३, १७।७० )
विमल ( बौद्ध भिक्षु ) । ( १६।८७ )
विश्वामित्र—एक पौराणिक ऋषि । ( ७।३५ )
विश्वावसु—मेनका नामक अप्सरा का पति । ( ७।३९ )
वृष्णि—एक यादवीय वंश । ( ८।४५ )
वैदेह मुनि—बुद्ध का पट्टशिष्य आनन्द । ( ५।३५, ३६, ५१ )
वैवस्वत—विवस्वतोऽपत्यम् = सातवाँ मनु, आधुनिक युग के अधिष्ठाता । (७।२७)
वैश्रवण—धनपति कुबेर । ( ४।२ )
वोध्यु—एक पौराणिक ऋषि । ( १०।५६ )
व्यास—एक ऋषि वेदव्यास । ( ७।२९-३० )
शक्र—देवराज इन्द्र । ( ४।२, ११।४३ )
शन्तनु—कौरव-पाण्डवों के पूर्वज, गंगापति एवं भीष्म के पिता ।
( ७।४१, ४४; १०।५६ )
शम्बर—एक दैत्य । ( ८।४५ )
शाकुन्तल—शकुन्तला के पुत्र भरत । ( १।२६ )
शाक्य—प्राचीन भारत का एक राजवंश । ( १।२४, ३।२८, ५।१, ६।४० )

४१६ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
शाक्यराज—राजा शुद्धोदन । ( २।४५, ६२ )
शान्ता—दशरथ की पुत्री, ऋष्यशृंग की पत्नी । ( ७।३४ )
शाम्ब—पौराणिक मायावी एक पात्र । ( ९।२४ )
शारद्वतीपुत्र—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।९१ )
शास्ता—बुद्ध । ( ७।१, १७।६२, ६५, १८।६, ६१ )
शिवि—एक पौराणिक दानी राजा । ( ११।४२ )
शुद्धावास—देवताओं का समूह । ( २।५५ )
शुद्धोदन—कपिलवस्तु का राजा । ( २।१, १८।३१ )
शुभकृत्स्न—देव-विशेष । ( १७।५१ )
शूर्पक—मीनरिपु, एक भिक्षु । ( ८।४४ )
शैव्वल—बौद्ध मुनि । ( १६।९१ )
शोण—बौद्ध भिक्षु ( ११।८८ )
शोणापरान्तपूर्ण—बौद्ध भिक्षु । ( १६।९० )
श्रीघन—भगवान् बुद्ध । (१८।४९ )
श्रोण—एक भिक्षु । ( १६।८८ )
सगर—राजकुमार । ( १।२५ )
सङ्क्रन्दन—देवराज इन्द्र । ( १।६२ )
सङ्ग्रामजित्—बौद्ध भिक्षु ( १६।८८ )
सम्बुद्ध—बुद्ध । ( १३।२ )
सरण्यू—एक घोड़ी । ( ७।२६ )
सरस्वती—सारस्वत की माता, पुराण में ब्रह्मा की पत्नी । ( ७।३१ )
सर्पदास—एक बौद्ध भिक्षु । ( १६।८८ )
सर्वार्थसिद्धि—गौतमबुद्ध । ( २।६३ )
सांकृति—अन्तिदेव । ( ७।५१ )
साम्य—एक बौद्ध तपस्वी । ( ९।२४ )
सारण—वृष्णिवंशीय शासक । ( ९।२४ )
सारस्वत—सरस्वती के पुत्र । ( ७।३१ )
सिद्ध—भूतोऽस्मी सिद्धयोनयः = एक योनि-विशेष । ( १०।६ )
सुगत—सुगतो बुद्धः ( ३।२१ )
सुजात—एक भिक्षु । ( १६।८८ )
सुदर्शन—भिक्षु । ( १६।८९ )
सुनेत्र—एक ऋषि । ( ११।५७ पा० टी० )
सुन्दर—नन्द । ( २।५८ )
सुन्दरी—नन्द की पत्नी । ( ४।३, ६।१, ७।८, ८।५१ )
सुबाहु—भिक्षु । ( १६।८८ )

नामानुक्रमणी ४१७
सूर्य्य—दिवाकर । ( ७।२६ )
सेनजित्—एक पराक्रमी पुरुष । ( ८।४४ )
सेनाक—एक विजयी राजा । ( ७।४३ )
सेनापति—देवराज इन्द्र । ( ७।४३ )
सोमवर्मा—उर्वशी के पति । ( ७।४२ )
सौन्नन्दकी—परशुराम । ( ७।४२ )
स्थूलशिरा—एक कामासक्त व्यक्ति । ( ७।३६ ),
स्वभाव—प्रवृत्ति का कारण । ( २६।१७ )
स्वागत—बौद्ध भिक्षु । ( १६।८९ )
स्वाहा—सभी देवताओं को बिना किसी विचार के आहूति देने वाली अग्नि-
पत्नी । ( ७।२५ )
हरि—श्रीकृष्ण । ( ९।१८ )
हिमगिरि—हिमालय पर्वत । ( १।४३ )
हिमवान्—हिन्दुस्तान की उत्तरी सीमा पर स्थित प्रसिद्ध हिमालय पहाड़ ।
( १।५, ३७; २।६२; १०।५, ११; १५।२८ )
हिरण्यरेता—अग्नि एवं कामासक्त । ( ७।२५ )
हैहय—क्षत्रियों का एक वंशविशेष, एक देश और उसके अधिवासी तथा यदु के
प्रपौत्र का नाम, अर्जुन कार्त्तवीर्य । ( ८।४५ )
────────

परिशिष्ट ( घ )
सौन्दरनन्द महाकाव्य में प्रयुक्त सूक्तियाँ
१. असारमस्वन्तमनिश्चितं जगज्जगत्यनित्ये बलमव्यवस्थितम्। ( ९।१६ )
२. कृतश्रुतो विप्रतिपद्यमानो निन्यो हि निर्वीय इवात्तशस्त्रः। ( १८।२५ )
३. गतं गतं नैव तु संनिवर्तते जलं नदीनां च नृणां च यौवनम्। ( ९।२८ )
४. चित्तं निषेद्धुं न सुखेन शक्यं कृष्टांदको गौरिव संस्यमध्यात्। ( १४।४८ )
५. दुर्लभं तु प्रियहितं स्वादु पथ्यमिवौषधम्। ( ११।१६ )
६. दुःखं हि शेते शयनेऽप्युदारे क्लेशाग्निना चेतसि दह्यमानः। ( १८।२९ )
७. न कामभोगा हि भवन्ति तृप्तये। ( ९।४३ )
८. न तो हि भक्तश्च नियोगमर्हति। ( १८।५३ )
९. निलीन इव हि व्याघ्रः कालो विश्वस्तघातकः। ( १५।५३ )
१०. निषेव्यमाणा विषयाश्चलात्मनो भवन्त्यनर्थाय तथा न भूतये। ( ९।४८ )
११. प्रज्ञामयं यस्य हि नास्ति चक्षुश्चक्षुर्न तस्यास्ति सचक्षुषोऽपि। ( १८।३६ )
१२. प्राज्ञेन दोषेष्वपि वर्तितव्यम्। ( १६।८१ )
१३. बलाबले चात्मनि सम्प्रधार्य कार्यः प्रयत्नो न तु तद्विरुद्धः। ( १६।५२ )
१४. भवन्ति कामा न तु कस्यचिच्छिवाः। ( ९।४७ )
१५. भवाद् भवं याति न शान्तिमेति संसारडोलामधिरुह्य लोकः। ( १६।६ )
१३. मोहात्सक्तो जने जनः। ( १५।३१ )
१७. मृत्युः सर्वास्ववस्थासु हन्ति नावेक्षते वयः। ( १५।५४ )
१८. यथा हन्ति व्याघ्रः शिशुरपि गृहीतो गृहगतः तथा स्त्रीसंसर्गो बहुविधमन-
र्थाय भवति। ( ८।६१ )
१९. यावत्तृषंः पुरुषो हि लोके तावत्समृद्धोऽपि सदा दरिद्रः। ( १८।३० )
२०. यास्यामि निष्ठामिति बालिशो हि जन्मक्षयात् त्रासमिहाभ्युपैति। ( १८।२६ )
२१. रूक्षमप्याशये शुद्धे रूक्षतो नैति सज्जनः। ( ११।१५ )
२२. विनिगुह्य हि रोगमातुरो नचिरात्तीव्रमनर्थमृच्छति। ( ८।४ )
२३. व्यवस्था नास्ति संसारे स्वजनस्य जनस्य च। ( १५।४१ )
२४. शीतं हृदं घर्म इवावतीर्णः। ( १७।६६ )
२५. शुचौ हि शीले पुरुषस्य दोषा मनः सलज्जा इव धर्षयन्ति। ( १६।३४ )
२६. शूरोऽप्यशूरः स हि वेदितव्यो दोषैरमित्रैरिव हन्यते यः। ( १८।२८ )
२७. श्रुतोन्नतस्यापि हि नास्ति बुद्धिनौत्पद्यते श्रेयसि यस्य बुद्धिः। ( १८।३५ )
२८. सर्वो हि संसारगतो भयार्तो यथैव कान्तारगतस्तथैव। ( १८।३२ )
२९. सर्वौषधीनामिव भूर्भवाय सर्वापदां क्षेत्रमिदं हि जन्म। ( १६।७ )
३० सुखं विरागत्वमसक्तबुद्धेः। ( १८।४२.)

परिशिष्ट ( ङ )
वृत्त-विवरण
१. अनुष्टुप्—
'पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः ।
षष्ठं गुरु विजानीयादेतत् पद्यस्य लक्षणम् ॥'
सर्ग १ ( श्लोक १-५८ ), सर्ग २ ( श्लोक १-६२ ), सर्ग ११ ( श्लोक १-५८ ),
सर्ग १२ ( श्लोक १-४२ ), सर्ग १३ ( श्लोक १-५४ ), सर्ग १४ ( श्लोक १-४५ ),
सर्ग १५ ( श्लोक १-६५ ) ।
२. अपरवक्त्र—
'अयुजि ननरला गुरुः समे । तदपरवक्त्रमिदं नजौ जरौ ॥'
सर्ग ८ ( श्लोक ५७ ) ।
३. उद्गता—
'प्रथमे सजौ यदि सलौ च, नसजगुरुकाण्यनन्तरम् ।
यद्यथ भनजलगाः स्युरथो, सजसा जगौ च भवतीसमुद्गता ॥'
सर्ग ३ ( श्लोक १-४१ ) ।
४. उपजाति—
'स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः, उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।
अनन्तरोदीरित लक्ष्मभाजौ, पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ॥'
सर्ग १ ( श्लोक ५९-६० ), सर्ग २ ( श्लोक ६३ ), सर्ग ४ ( श्लोक १-४४ ),
सर्ग ५ ( श्लोक १-५२ ), सर्ग ६ ( श्लोक १-४८ ), सर्ग ७ ( श्लोक १-४७ ), सर्ग
१० ( श्लोक १-५३ ), सर्ग ११ ( श्लोक ५९ ), सर्ग १४ ( श्लोक ४६-४९ ), सर्ग
१६ ( श्लोक १-६४ ), सर्ग १७ ( श्लोक १-७० ), सर्ग १८ ( श्लोक १-४३ ) ।
५. उपस्थित प्रचुपित—
'उपस्थितप्रचुपितं पृथगाद्यं मसौ जभौ गौ ।
सनौ जरौ ग, नौ स, नौ न जयौ ॥'
सर्ग २ ( श्लोक ६४-६५ ) ।
६. कुसुमलता-वेल्लिता—
'स्याद् भूतत्वंश्र्वैः कुसुमितलतावेल्लिता म्तौ न यो यो ।'
सर्ग ७ ( श्लोक ५२ ) ।
७. पुष्पिताग्रा—
'अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि, तु नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा ।'

४२० सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
सर्ग ३ (श्लोक ४२), सर्ग ४ (श्लोक ४६), सर्ग ६ (श्लोक ४९), सर्ग ९
(श्लोक ५०), सर्ग १८ (श्लोक ६०)।
८. प्रहर्षिणी—
'म्नौ ज्रौ गस्त्रिदशयतिः प्रहर्षणीयम्।'
सर्ग १ (श्लोक ६१), सर्ग १७ (श्लोक ७१-७३)।
९. रुचिरा—
'जभौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः।'
सर्ग १० (श्लोक ६४)।
१०. वियोगिनी—
'विषमे ससजः गुरुः समे, सभरा लोऽथ गुरुर्वियोगिनी।'
सर्ग ८ (श्लोक १-५६)।
११. वंशस्थ—
'जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।'
सर्ग ४ (श्लोक ४५), सर्ग ९ (श्लोक १-४९), सर्ग १० (श्लोक ५४-६३),
सर्ग १५ (श्लोक ६६-६७), सर्ग १८ (श्लोक ४४-४९)।
१२. वसन्ततिलका—
'उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौगः।'
सर्ग ८ (श्लोक ५८-५९), सर्ग ९ (श्लोक ५१), सर्ग १८ (श्लोक ६१)।
१३. शरभा—
'चत्वार्यादौ गुरुणि स्युर्दशमैकादशे तथा।
अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्याः पादे तु शरभा यथा॥'
सर्ग १२ (श्लोक ४३), सर्ग १३ (श्लोक ७२)।
१४. शार्दूलविक्रीडित—
'सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।'
सर्ग ८ (श्लोक ६२), सर्ग ११ (श्लोक ६०-६१), सर्ग १६ (श्लोक ९८),
सर्ग १८ (श्लोक ६२-६३)।
१५. शिखरिणी—
'रसै रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।'
सर्ग ८ (श्लोक ६०-६१), सर्ग १४ (श्लोक ५०-५२), सर्ग १५ (श्लोक
६८-६९), सर्ग १६ (श्लोक ९५-९७)।
१६. सुवदना—
'ज्ञेया सप्ताश्वषड्भिमरभनययुताम्लौ गः सुवदना।'
सर्ग ११ (श्लोक ६२), सर्ग १८ (श्लोक ६४)।

परिशिष्ट ( च )
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
१. अश्वघोष—सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्—डॉ० देवनारायण मिश्र, साहित्य
भण्डार मेरठ।
२. सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्—हिन्दी अनुवादक सूर्यनारायण चौधरी, पूर्णियां
( बिहार )।
३. बुद्धचरित महाकाव्यम् ” ” ”
४. संस्कृत साहित्य में बौद्धकाव्य—बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना।
५. बौद्ध धर्म के २५०० वर्ष—पी. बी. आप्टे, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं
प्रकाशन मन्त्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली १९७६ ई०।
६. बौद्ध धर्मदर्शन—नरेन्द्रदेव, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पटना, १९७१ ई०।
७. रत्नकीर्ति छन्दोरत्नाकर, मिशेलहान, नेपाल, शोध संस्थान काठमाण्डू
१९८२ ई०।
८. नाट्यशास्त्र—भरतमुनि—द्वितीय भाग, मधुसूदन शास्त्री, काशी हिन्दू विश्व
विद्यालय, वाराणसी।
९. भारतीय पुरैतिहासिक पुरातत्त्व—धर्मपाल अग्रवाल एवं पन्नालाल अग्रवाल,
हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, प्रयाग, लखनऊ।
१०. संस्कृत साहित्य का इतिहास—बलदेव उपाध्याय, शारदा मन्दिर, वाराणसी
१९६८ ई०।
११. संस्कृत हिन्दी शब्दकोष—आप्टे-मोतीलाल बनारसी दास, वाराणसी।
१२. संस्कृत सुकवि समीक्षा—बलदेव उपाध्याय, चौखम्बा संस्कृत संस्थान,
वाराणसी।
१३. सौन्दरनन्द महाकाव्यम्—हिन्दी अनुवादक डॉ० करुणा शंकर दूबे, चौखम्बा
संस्कृत संस्थान, वाराणसी।
१४. संस्कृत कविदर्शन—डॉ० भोलाशंकर व्यास, चौखम्बा विद्या भवन,
वाराणसी।
१५. बुद्धचरित : एक दार्शनिक अध्ययन—दुर्गाप्रसाद-पालि एवं बौद्ध अध्ययन
विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, १९८४ ( शोधप्रबन्ध )।
१६. बौद्ध पारिभाषिक लघुशब्दकोष—धर्मचन्द्र जैन, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,
कुरुक्षेत्र।
English Reference Books

  1. Ashvaghosha—B. C. Laha, Royal Asiatic Society, Calcutta,
  2. Ashvaghosha's Discourse on the Awakening of Faith in the
    Mahayan—D. T. Suzuky, Newyark.

४२२ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
3. A History of Sanskrit Literature—B. Varadachari, Allahabad.
4. Saundaranand Kavyam.—Har Prasad Shastry, Royal Asiatic
Society, Calcutta, 1939.
5. Saundaranand—E. H. Johnston. Oxford University Press,
London, 1928.
6. History of Buddhism—Bu-Ston-Suzuky Research Foundation.
7. Studies About the Sanskrit Buddhist Literature, Prace
Komisyi Orientalistycnej Polskiej, Akademji umiejetonssci ( Nr. 2,
pp. 1–80 ) by A Gawronski, 1919.
8. Notes on the Saundaranand : Critical and Explanatory—
Second Series. op git Nr. 6 ( pp. 1–38 ) by A. Gawzonski, 1922.
9. Notes on Saundaranand : Critical and Explanatory—Third
Series. Rocznik Orjantalistyezny ( Tom. IV. 1926, Str. 219–29 )
by A. Gawzonski, 1928.
10. Notes on the Text of Ashvaghosha’s Saundaranand—(Journal
of Royal Asiatic Society 1928 ) pp. 131–2 by G. W. Gwarner.
11. Zu Aswaghosa’s Saundaranand—Z. D. M. G. ( Band 72,
1918, pp. III—14.4 ) by E. Hultzsch.
12. Ashvaghosa’s Saundaranand—Nr. III. Z. D. M. G. ( Band
74, 1920, pp. 293–5 ) by E. Hultzsch.
13. Har Prasad Shastri. 1910, Appendix to Bibliotheca Indica
edition.
14. Saundarananda—Panjab University Publication, By E. H.
Johnston 1928.
15. E. H. Johnston, 1932, Appendix to English Translation to
the Sanskrit Text.
16. Misprint in Johnston’s Edition 1928.
17. Critical Edition with Note’s—E. H. Johnston, 1928.
18. Critical Notes to Saundaranand Kavya—Bulletin of the
School of Oriental Studies, London ( Vol I, pt. II, pp. 133–140 )
By Le dela Vall’ee Poussim.
19. Sqme Notes on the Text of Saundarananda the Poem of
Ashvaghosha : Verslag en mededeelingen der. Koninklijke Akademie
Van Wetenschappen ( Twa-alfde Deel, pp. 125–139 ).

श्लोकानुक्रमणी
श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः | श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः
अ | अथ द्विजो बाल इवासंवेदः १८ १
अकथङ्कथा ग्रहिण ३ ३९ | अथ धर्मचक्रमृतनाभि ३ ११
अकृतज्ञमनार्यमस्थिरं ८ ४६ | अथ नन्दमधीरलोचनं ८ १
अकृतात्मतया तृषान्वितो ८ २१ | अथ नैष मार्ग इति ३ ५
अकृशोद्यमः कृशधनोऽपि ३ ३१ | अथ पार्थिवः समुपलभ्य ३ २०
अग्निद्रुमा ज्याम्बुषु या १७ ५९ | अथ प्रमादाच्च तमुज्जिही ५ ३४
अग्नीनां हूयमानानां १ ११ | अथ प्रहाणात्सुखदुःखयोश्च १७ ५४
अङ्केऽपि लक्ष्म्या न स ६ ४६ | अथ भाजनीकृतमवेक्ष्य मनुज ३ २६
अजातवत्सां यदि गां १६ ५० | अथ मोक्षवादिन्मराड ३ ३
अण्व्या ययाण्या विपुलाणि १६ ७२ | अथ वा समवैषि ८ ४९
अत एव च मे विशेषतः ८ ११ | अथ संराधितो नन्दः १३ १
अतःपरं तत्त्वपरीक्षणेन १६ ३ | अथ संहर्षणानन्दं विदित्वा १३ ९
अतःपरं परममिति १० ६४ | अथ स पथि ददर्श मुक्तमानं ४ ४६
अतःप्रभृति भूयस्त्वं १३ १० | अथ सूक्ष्ममतिद्वयाशिव ८ ४७
अतश्च निखिलं १२ १३ | अथ स्मृतिकवाटेन १४ १
अतश्च सन्दधे कार्यं १३ ८ | अथात्मदृष्टिं सकलां विधूय १७ २७
अतश्च हस्त इत्युक्त्वा १२ ३६ | अथात्मनः शिष्यगुणस्य १८ ६
अतीतेऽध्वनि संवृत्तः १५ ३२ | अथात्र काचित्प्रमदा सबाष्पां ६ ६
अतो न विषयो हेतुः १३ ५३ | अथापि किञ्चिद् व्यसनं ६ ४२
अतो विदित्वा बलवीर्यं ९ २१ | अथाप्यनाश्यानविशेषकायां ४ ३६
अतृप्तौ च कुतः शान्ति ११ ३३ | अथाप्सरःस्वेव निविष्ट १० ४९
अत्यन्तमपि संहारो १४ ८ | अथावतीर्याश्वरथद्विपेभ्यः ५ १
अत्याक्रान्तो हि काया १४ ७ | अथावितर्कं क्रमशोऽविचारम् १७ ४७
अथ कश्चिद्वितर्कंस्ते भवेद् १५ ५२ | अथवासनगतस्थानप्रेक्षित १४ ३५
अथ तत्र शुचौ ८ ८ | अथैवमादेशित तत्त्वमार्गो १७ १
अथ तस्मिन्तथा काले २ ४६ | अथैवमुक्तोऽपि स तेन ९ १
अथ तस्य निशम्य ८ १४ | अथोदकलशं गृह्य तेषां १ २८
अथ तेजस्विसदनं १ १८ | अथो नतं तस्य मुखं ५ ५२
अथ ते पुण्यकर्माणः १ ३९ | अथो महद्भिः पथि ५ ४
अथ त्विदानीं ललितः ६ ४३ | अथो हि तत्त्वं परिगम्य १८ ४३
अथ दुःखमिदं मनोमयं ८ ५ | अददत्सु भवन्ति नर्मदाः ८ ३९

४२४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः
अदर्शनं तूपगतश्च तस्या ४ ४३ अन्तर्भूमिगतं ह्यम्भः १२ ३३
अदृष्टतत्त्वेन परीक्षकेण १४ ४८ अन्येऽपि सन्तो विमुमुक्षवो १८ १३
अद्य ते सफलं जन्म १२ २१ अन्योन्यसंसर्गविवर्धनेन ४ ११
अद्य प्रकृष्टा तव बुद्धिमत्ता १८ ३५ अप्रथत्पितुःश्चैव २ ३०
अद्यापदेष्टुं तव युक्तरूपं १८ ३१ अपरिग्रहः स हि बभूव ३ १८
अद्यापि तन्मे हृदि ७ १८ अपरीक्षकभावाच्च पूर्वं १२ ४
अद्यार्थवत्ते श्रुतवच्छ्रुतं १८ २५ अपां द्रवत्वं कठिनत्वमुर्व्या १६ १२
अद्यावगच्छामि सुदुष्करं ७ १३ अपि क्षुद्रमृगा यत्र १ १३
अद्यासि शौचेन परेण युक्तो १८ २४ अपि च प्रथितस्य धीमतः ८ २७
अद्यासि सुप्रव्रजितो जिता १८ २३ अपि च स्वतोऽपि ३ ४१
अधमिष्ठामचकथन्न २ ३२ अप्यासीद् दुःखितान्पश्यन् २ १७
अध्यैष्ट यः परं ब्रह्म २.. २१ अप्रियं हि हितं ११ १६
अनभिज्ञो यथा जात्यं दहेद् १५ २६ अप्सरः प्राप्तये यन्मे १२ १३
अनर्थकामः पुरुषस्य यो ७ ४६ अप्सरोभृतको धर्मं १२ १
अनर्थभोगेन विघातदृष्टिना १० ५५ अप्सरो भृतको धर्मं चरसी ११ १९
अनर्थेषु प्रसक्ताश्च १४ ४० अबोधतो ह्यप्रतिवेधतश्च १६ ६
अनर्हंसंसारभयं मानाहं १२ २६ अभिजनमहतो मनस्विनः ८ ५७
अनाथं तन्मनो ज्ञेयं १४ ३९ अभितस्ततः कपिलवास्तु ३ १७
अनादिकालोपचितात्म १६ ७१ अभिधाय च त्रिपरिवर्तमत्तु ३ १३
अनिक्षिप्तोत्साहो यदि खनति १६ ९७ अभिध्या प्रियरूपेण १३ ४६
अनित्यतस्तन्न हि शून्यतश्च १७ १७ अभिवक्तस्य कामेषु ११ १०
अनित्या मोषधर्माणो १५ ८ अभूत परिकल्पेन विषय १३ ५१
अनिर्वेद्याग्रमहंदभ्यो २ १९ अभ्युच्छ्रितो द्रव्यमदेन पूर्वं १८ ३७
अनिश्चितश्चाप्रतिबद्धचित्तो १८ १९ अयत्नतो हेतुबलाधिकस्तु ५ १७
अनिष्टमप्यौषधमातुराय ५ ४८ अरिभूतेष्वनित्येषु १२ २४
अनीयमानस्तु यथानिलेन १४ ४९ अर्जनादीनि कामेभ्यो १५ ७
अनुकूलं प्रवर्त्तन्ते ज्ञातिषु १५ ३७ अर्हत्वमासाद्य स सक्रियार्हो १७ ६
अनुग्रहायास्य जनस्य शङ्के ४ ३० अर्हरूपा ह्यनर्हस्य १ २०
अनुरोधविरोधाभ्यां १३ ३८ अलं धर्मार्थकामानां १ ४०
अनुलेपनमञ्जनं स्रजो ८ ५० अलब्धचेतः प्रशमः १४ ४७
अनेन दुष्टो मदनाहिना १० ५६ अलब्धस्यालाभो नियत १६ ९५
अनृतं जगाद न च ३ ३३ अवगम्य तं च कृतकार्यं ३ ८
अन्तर्गतैरचपलैर्वंशस्त्या १४ २५ अवबुध्य चैव परमार्थं ३ १०
अन्तर्जलिगताः प्रमत्तमनसो ११ ६१ अवर्धिष्ट गुणैः शश्वद् २ २६

श्लोकानुक्रमणी ४२५
श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः | श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः
अवशः खलु काममूर्च्छया ८ २० | आकाशयोनिः पवनो यथा १६ ११
अवश्यं गोचरे स्वे स्वे १३ ४१ | आकृष्टवपुषा दृष्टीः २ २२
अवश्यभावी प्रियविप्रयोगः ५ २१ | आक्षिप्तः शत्रुभिः सङ्ख्ये २ ५
अवाङ्मुखो निष्प्रणयश्च ४ २५ | आचयं द्युतिमुत्साहं १४ ४
अवासकार्योऽसि परां गति १८ ५४ | आचारवान्विनयवान् १ ६२
अविचारयतः शुभाशुभं ८ २३ | आतसबुद्धेः प्रहितात्मनोऽपि १७ ७
अवेदीद् बुद्धिशास्त्राभ्यामिह २ १५ | आदाय वैदेहमुनिस्ततस्तं ५ ५१
अवैति बुद्धं नरदम्यसारथिं १८ ५१ | आनुशंस्यान्न यशसे २ ४०
अशरीरं भवाग्रं हि १६ ५६ | आपुः पुरं तत्पुरुहूतकल्पा १ ५९
अशिश्रियद्यः सततं दीप्तं १ २ | आम्नातव्याश्च विशदं १४ २३
अश्रान्तः समये यज्वा २ ३५ | आरण्यकं भैक्षचरं विनीतं १८ ३३
अष्टापदमिवालिख्य १ ३२ | आरब्धवीर्यस्य मनःशमाय १७ ९
असुरा पूर्वदेवास्तु ११ ४७ | आर्जवाभिहितं वाक्यं ११ १५
असौ क्षेमो जनपदः सुभिक्षो १५ ४२ | आर्द्राच्च काष्ठाज्ज्वलनाभि १६ ५१
अस्मै नमोऽस्तु स्थिरनिश्चय ७ २२ | आर्यस्य साधोः करुणात्मक ६ १४
अस्मिन्धारापरिक्षिप्ते १ ३३ | आर्येण मार्गेण तथैव मुक्तः १७ ३४
अस्याभ्युपायोऽधिगमाय १६ ३० | आर्येर्बलैः पञ्चभिरेव पञ्च १७ २६
अस्योपचारे धृतिराजंवं १६ ३८ | आर्यो न्यायः कुतस्तस्य १४ ४३
अहं गृहीत्वापि हि ७ १७ | आलोक्य चक्षुषा रूप १३ ४२
अहं ममेत्येव च रक्त ९ ३५ | आस्थाय योगं परिगम्य ५ ३२
अहं वपुष्मानिति यच्च ५ २४ | आस्था यथा पूर्वमभून्न १० ५१
अहं ह्नार्येण शरीरजेन १७ ६४ | इ
अहार्षीद् दुःखमार्तानां २ १६ | इच्छाविशेषे सति तत्र १६ १९
अहितो दृश्यते ज्ञाति १५ ३८ | इति कर्मणा दशविधेन ३ ३७
अहोऽन्धविज्ञाननिमीलितं १८ ४५ | इति तेन स चोदितस्तदा ८ ७
अहो धृतिस्तेऽविषयात्मकस्य १८ २६ | इति त्रिवेगं त्रिक्षपं त्रिवीचम् १७ ६०
अहो प्रत्यवमर्शोऽयं १२ १९ | इति दुःखमेतदियमस्य ३ १२
अहो विशेषेण विशेषदर्शि १८ ४० | इति मन्मथशोककर्षित ८ २२
अहो सदृशमारब्धं १९ ९ | इति मुदितमनामयं ३ ४२
अहो हि सत्त्वेष्वतिमैत्रचेत १८ ४७ | इति युवतिजनेन सान्त्व्य ६ ४९
अहल्लेखस्य मनसः १३ २६ | इति हितमपि बह्वपीदमुक्तः ९ ५०
आ | इत्यनेन प्रयोगेण काले १५ ६५
आकाङ्क्षेच्च यथा रोगं ११ २८ | इत्यहंतः परमकारुणिकस्य १८ ६१
आकारेणावगच्छामि तव ११ २३ | इत्यार्यसत्यान्यवबुध्य १६ ५

४२६ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः | श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः
इत्येवमन्यायनिवर्तनं च १६ ६८ | ऋ
इत्येवमादि प्रियविप्रयुक्ता ६ २० | ऋजुं समग्रं प्रणिधाय कायं १७ ४
इत्येवमादि स्थिरबुद्धिचित्त १८ ३९ | ऋतावृतावाकृतिमेक १० १९
इत्येवमुक्तश्च निपीडितश्च ४ ३७ | ऋतुचक्रनिवर्त्ताच्च १५ ४४
इत्येवमुक्तः प्रणतेन ५ १० | ऋतुव्यंतीतः परिवर्तते ९ २८
इत्येवमुक्तः स तथागतेन ५ ३३ | ऋद्धिप्रविवेकम् च १६ २
इत्येवमुक्तः स विनायकेन ५ ५० | ए
इत्येवमुक्तः सुगतेन नन्दः १० १७ | एकपित्रोर्यथा भ्रात्रोः १ २३
इत्येवमुक्तापि बहुप्रकारं ६ ४४ | एकस्तु मम सन्देहस्त ११ १४
इत्येवमुक्त्वा गुरुबाहु १८ २० | एकेन कल्पेन स चेन्न हन्यात् १६ ७०
इत्येषा व्युपशान्तये न रतये १८ ६३ | एताः स्त्रियः पश्य १० ४८
इदं कृतार्थः परमार्थवित्कृती १८ ५० | एतान्यरण्यान्यभितः शिवानि १६ ८६
इदं विदित्वा निधनस्य ९ ३४ | एतान्यादौ निमित्तानि ११ ५३
इदं हि भुक्त्वा शुचि १८ ४४ | एतावच्छीलमित्युक्तमाचारो १३ १९
इदं हि रोगायतनं जराशं ९ ६ | एवं कृती निर्वृ'तिमभ्युपेतो १६ २९
इदं हि शय्यासनपानभोजने ९ १४ | एवं ते पश्यतस्तत्त्वं १३ ४५
इदमाश्चर्यं परं यत्सुप्तः १५ ५८ | एवं मनोधारणया क्रमेण १६ १
.इन्द्रियाणांमुपशमादरीणां १३ ३८ | एवंविधा देवतृपर्षिसंङ्घाः ७ ४६
इन्धने सति वायौ १३ ५० | एवमभ्यवहर्तव्यं भोजनं १४ १४
इमा हि शक्या न १० ६० | एवमादिः क्रमः सौम्य १४ २८
इहाधिवासो दिवि १० ६१ | एवमादिभिरत्यक्तो २ ४५
इहार्थमेवारभते नरोऽधमो १८ ५५ | एवंस्प्रंकारैरपि यद्युपायै १६ ८०
इहैव भूत्वा रिपवो ९ ४७ | एष्यामनाख्यानविशेष ६ १३
इहोत्तमेभ्योऽपि मतः स १८ ५६ | ऐ
ई | ऐन्द्रं वनं तच्च ददर्श १० ३५
ईदृशी नाम बुद्धिस्ते १२ २८ | औ
उ | औपेक्षिकं नापि निमित्त १६ ५७
उत्तानो भावकरणाद्विवृत्त १३ १२ | क
उत्तिष्ठ धर्मे स्थित शिष्य १८ २२ | ककन्दस्य मकन्दस्य १ ५८
उद्वेगादपुनर्भवे मनः २ ६५ | कण्वः शाकुन्तलस्येव १ २६
उन्मीलितस्यापि जनस्य १८ ३६ | कथङ्कथाभावगतोऽस्मि १८ ८
उपविश्य तत्र कृतबुद्धि ३ ७ | कन्दर्परतयोरिव लक्ष्यभूतं ४ ८
उर्व्यादिकान् जन्मनि वेद्मि १८ १४ | कपिलस्य च तस्यर्षेस्त १ ५७
उल्कामुखस्थं हि यथा सुवर्णं १६ ६५ | कर्मणो हि यथा दुष्टात्काय १३ १७

श्लोकानुक्रमणी ४२७
श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः श्लोकपादाः सर्गाः श्लोकाः
कलभः करिणा खलूद्धृतो ८ १७ कृष्ट्वा गां परिपाल्य च १६ ९८
काचित् पिपेषार्जुनविलेपनम् ४ २६ क्रमेणाद्भिः शुद्धं कनकमिह १५ ६८
काचित् स्थिता तत्र तु ४ २८ क्रोधप्रहर्षादिभिराशयानाम् १६ २१
का नन्दरूपेण च चेष्टया १० १६ क्लेशप्रहाणाय च १६ ४९
कामचर्यासु कुशलो ११ ४ क्लेशांस्तु विष्कम्भयते १६ ३५
कामभोगैरतृप्तात्मा १३ ५५ क्लेशाहार्नापि कांश्चित्तु २ २१
कामरागप्रधानोऽपि परिहास १२ ३ क्लेशाङ्कुरान्न प्रतनोति १६ ३४
कामाग्निदाहेन स विप्रमुक्तो १७ ४३ क्व कार्तवीर्यस्य बला ९ १७
कामानां प्रार्थना दुःख ११ ३८ क्वचिच्छयीतं क्वचित् १५ ४५
कामाभिभूतो हि हिरण्यरेताः ७ २५ क्वचिद् भुक्त्वा यत्त