सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
सर्ग ३ (श्लोक ४२), सर्ग ४ (श्लोक ४६), सर्ग ६ (श्लोक ४९), सर्ग ९
(श्लोक ५०), सर्ग १८ (श्लोक ६०)।
८. प्रहर्षिणी—
'म्नौ ज्रौ गस्त्रिदशयतिः प्रहर्षणीयम्।'
सर्ग १ (श्लोक ६१), सर्ग १७ (श्लोक ७१-७३)।
९. रुचिरा—
'जभौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः।'
सर्ग १० (श्लोक ६४)।
१०. वियोगिनी—
'विषमे ससजः गुरुः समे, सभरा लोऽथ गुरुर्वियोगिनी।'
सर्ग ८ (श्लोक १-५६)।
११. वंशस्थ—
'जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।'
सर्ग ४ (श्लोक ४५), सर्ग ९ (श्लोक १-४९), सर्ग १० (श्लोक ५४-६३),
सर्ग १५ (श्लोक ६६-६७), सर्ग १८ (श्लोक ४४-४९)।
१२. वसन्ततिलका—
'उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौगः।'
सर्ग ८ (श्लोक ५८-५९), सर्ग ९ (श्लोक ५१), सर्ग १८ (श्लोक ६१)।
१३. शरभा—
'चत्वार्यादौ गुरुणि स्युर्दशमैकादशे तथा।
अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्याः पादे तु शरभा यथा॥'
सर्ग १२ (श्लोक ४३), सर्ग १३ (श्लोक ७२)।
१४. शार्दूलविक्रीडित—
'सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।'
सर्ग ८ (श्लोक ६२), सर्ग ११ (श्लोक ६०-६१), सर्ग १६ (श्लोक ९८),
सर्ग १८ (श्लोक ६२-६३)।
१५. शिखरिणी—
'रसै रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।'
सर्ग ८ (श्लोक ६०-६१), सर्ग १४ (श्लोक ५०-५२), सर्ग १५ (श्लोक
६८-६९), सर्ग १६ (श्लोक ९५-९७)।
१६. सुवदना—
'ज्ञेया सप्ताश्वषड्भिमरभनययुताम्लौ गः सुवदना।'
सर्ग ११ (श्लोक ६२), सर्ग १८ (श्लोक ६४)।