सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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४०८ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
३३ और ३४ के बीच का वह श्लोक लुप्त है, जिसमें—१. परुषवचन विरति और
२. सम्प्रलाप विरति का वर्णन आया होगा, किन्तु प्राध्यापक श्रीसूर्यनारायण चौधरी
के कथनानुसार ३३वें श्लोक में ही वाणी के चारों सुकर्मों का उल्लेख हो गया है।
अप्रिय नहीं कहने का तात्पर्य परुषवचन विरति तथा अहितकारी वचन न कहना
सम्प्रलाप विरति है। उनकी दृष्टि में श्लक्षण का अर्थ 'प्रिय' है।
१०।२५ यत्रायतांश्चैव ततांश्च तांस्तान् वाद्यस्य हेतून् सुषिरान् घनांश्च ।
फलन्ति वृक्षा मणिहेमचित्राः क्रीडासहायास्त्रिदशालयानाम् ॥
इस श्लोक में 'तत' शब्द का प्रयोग समुचित है। तत् का प्रयोग तांत या तार के
अर्थ में है। ऐसे वाद्ययंत्र, जिनका निर्माण तांत या तार से होता हो। यथा—तार से
निर्मित वाद्ययन्त्र—वीणा, सारङ्गी, सरोद, बेलां प्रभृति। इसी तरह अवनद्ध की जगह
आनद्ध शब्द का प्रयोग समुचित प्रतीत होता है, क्योंकि आनद्ध का सन्दर्भगत अर्थ
है—मढा हुआ। जैसे चमड़े से मढ़ा—ढोल, नगाड़ा, तबला, डुग्गी, मृदङ्ग प्रभृति।
इसी तरह 'सुषिर्' शब्द का तात्पर्य उस यंत्र-विशेष से है, जिनके रन्ध्रों में वायुकंपन से
स्वरोत्पन्न हो; जैसे—शंख, बाँसुरी, वंशी, शहनाई, बैंड, हारमोनियम प्रभृति। इसी
तरह 'घन' शब्द का अर्थ है—पारस्परिक आघात से बजने वाला यंत्र; जैसे—मजीरा,
झांझ, झाल, करताल प्रभृति। इसका उल्लेख प्राध्यापक श्रीचौधरी ने—कल्याण, हिन्दू
संस्कृति अंक पृ० ६९९ तथा इसी अंक का 'प्राचीन भारत के वाद्ययंत्र' का उद्धरण
दिया है।
डॉ० जोन्स्टन के अनुसार सौन्दरनन्द सर्ग १६ पद्य सं० २६ में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द
का प्रयोग निर्वाण के अर्थ में हुआ है। इसी तरह उसी सर्ग के श्लो० सं० २६ और
२७ दोनों को एक साथ मिलाकर अर्थ किया है, किन्तु प्राध्यापक चौधरी जी के
मतानुसार रचना और व्याकरण की दृष्टि से दोनों ही श्लोक एक-दूसरे से भिन्न हैं।
२६ के 'धर्म' और बारहवें सर्ग के १७वें पद के परमपद के समान ही यहाँ भी
दोनों को अलग-अलग ही रखा है। इस सन्दर्भ में १७।३१, ३२, ६५ और ७२
द्रष्टव्य है। चौधरी जी की दृष्टि में 'तृष्णा विराग का, तृष्णा विमुक्त और त्राण का
त्राणरूप समुचित अर्थ है। नैष्ठिकपद-परमपद-निर्वाण पद। बुद्धचरित १।२५ में।
'रुजो नराणां प्रशमं प्रयाताः' यह भी द्रष्टव्य है।