सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( १६ )
नहीं, वह बन्ध का कारण किस प्रकार हो सकता है । और
पारमार्थिक ज्ञान तो मुक्ति का हेतु है, वह बन्ध का कारण क्योंकर
हो सकता है, अतएव ज्ञानविशेष से बन्ध नहीं होता । दूसरा
गमन शरीरादि में होता है, वह जीव का स्वाभाविक धर्म होने से
बन्ध का हेतु नहीं हो सकता ।
तीसरा प्राप्ति, सो प्राप्त होने वाले दो पदार्थ हैं—एक ब्रह्म,
दूसरी प्रकृति, सो यह दोनों व्यापक होने से जीव को सर्वदा
प्राप्त, सदैव रहनेवाली वस्तु से सदैव सम्बन्ध, उससे भी बद्ध
नहीं हो सकता, अतएव गतिविशेष से बन्ध नहीं होता ।
निष्क्रयस्य तदसम्भवात् ॥ ४६ ॥
अर्थ—क्रिया से शून्य जड़ प्रकृति में भी गति असम्भव है
और व्यापक ब्रह्म में भी गति असम्भव है, और यदि जीव की
गति पर विचार किया जावे तो प्रश्न यह उपस्थित होगा, कि
जीव विभु है अथवा मध्यम परिणामवाला है अथवा अणु है ?
यदि विभु मानलें तो गति हो नहीं सकती । यदि मध्यम परिणाम-
वाला मानलें तो यह दोष होगा ।
प्र०—क्या आत्मा अंगुष्ठमात्र नहीं है ? यदि अंगुष्ठमात्र
है तो उसमें गति इत्यादि सम्भव है। यदि विभु है तो जाना हो
ही नहीं सकते ?
उ०—मूर्तत्वाद् घटादिवत् समानधर्मापत्ता-
वपसिद्धान्तः ॥ ५० ॥
अर्थ—आत्मा के मूर्त्तिमान् होने से घटादिकों की भाँति
सावयव इत्यादि दोष आजायेंगे और सावयव होने से संयोग
वियोग अर्थात् उत्पत्ति और नाश भी मानना पड़ेगा । जोकि
आत्मा नित्य है, इसलिये मूर्त्तिवाला नहीं हो सकता और जब
( २० )
मूर्त्तिवाला नहीं तो उसमें इस प्रकार की गति भी नहीं मानी
जा सकती। अतएव आत्मा को मूर्त्तिवाला मानना सिद्धान्त
का खण्डन करना है।
गतिश्रुति रप्युपाधियोगादाकाशवत् ॥ ५१ ॥
अर्थ—शरीर के सब अवयवों में जो गति है अर्थात् दूसरे
शरीरों में जो गमन है वह सूक्ष्म शरीर रूप उपाधि के कारण
है, अर्थात् जब तक सूक्ष्म शरीर न हो तब तक एक शरीर
छोड़ कर दूसरे शरीर में नहीं जा सकता, जैसे—आकाश घट
की उपाधि से चलता है, क्योंकि घट में जो आकाश है जहाँ
घट जायगा साथ हो जायगा।
प्र०—सूक्ष्म शरीर किसे कहते हैं ?
उ०—पंच प्राण, पंच उपप्राण, पंच ज्ञानेन्द्रिय, मन, अहंकार ;
इन सबके समूह का नाम सूक्ष्म शरीर है।
प्र०—क्या यह जीव से बिलकुल पृथक् हैं ?
उ०—हाँ, बिलकुल पृथक् हैं।
प्र०—तो पहिले-पहल जीव किस प्रकार इस शरीर को
धारण करता है ?
उ०—पहिले सांकल्पिक सृष्टि में आता है, फिर उसका जब
सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध हो जाता है, तब दूसरे शरीरों में जाता
है। यदि सम्बन्ध न हो तो नहीं जाता।
न कर्म्मणाप्यतद्धर्मत्वात् ॥ ५२ ॥
अर्थ—कर्म्म से भी बन्धन नहीं होता, क्योंकि वह भी शरीर
सहित आत्मा में होता है और शरीर सुख दुःख भोगने से
होता है। इसलिये कर्म्म से पहिले शरीर का होना आवश्यक
( २१ )
है और शरीर होने से बन्धन भी है, उसके उत्पन्न होने की
आवश्यकता नहीं ।
अतिप्रसक्तिरन्यधर्म्मत्वे ॥ ५३ ॥
अर्थ—यदि और के धर्म्म से और का बन्धन मान लें तो
नियम टूट जायेंगे; क्योंकि उस अवस्था में बद्ध पुरुष के पाप
से मुक्त बन्धन में आजायेंगे, जो असंगत है ।
निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति ॥ ५४ ॥
अर्थ—यदि उपाधि के बिना पुरुष का बन्धन माना जावे
तो जिन सूत्रों में जीव को साक्षिरूप और निर्गुण बतलाया
है उनमें दोष आ जायगा ; इसलिये जीव स्वभाव से बद्ध है,
न मुक्त है, वरन् यह दोनों औपाधिक धर्म हैं। प्रकृति संसर्ग
से बद्ध हो जाता है और परमात्मा के संसर्ग से मुक्त हो जाता
है। यथार्थ में जीव सुख दुःख से पृथक् और तीनों तापों से
किनारे साक्षिरूप है। इस सूत्र में इति शब्द कहने से बन्धन
के कारण परीक्षा समाप्त कर दी गई ।
प्र०—जब दुःख स्वाभाविक भी नहीं और नैमित्तिक भी
नहीं तो प्रतीत कैसे होता है ?
उ०—जीव को अल्पज्ञता और प्रकृति संसर्ग से बन्धन की
प्रतीति होती है। चूँकि संसर्ग नित्य है, इसलिये नैमित्तिक नहीं
कहला सकता, और बन्ध संसर्ग से उत्पन्न होनेवाले
अविवेक से प्रतीत होता है, इस कारण स्वाभाविक नहीं
कहला सकता । अतएव अविवेक ही इसका कारण है ।
प्र०—जब तुम प्रकृति के योग से बन्धन मानते हो और
प्रकृति भी काल और दशा की नाईं सर्वव्यापक है, तो उसके
योग से बन्धन किस प्रकार हो सकता है ?
( २२ )
उ०—तद्योगोऽप्यविवेकान्न समानत्वम् ॥ ५५ ॥
अर्थ—प्रकृति का योग भी अविवेक से होता है, इस-
वास्ते यह काल और दशा के समान नहीं ।
प्र०—अविवेक किसे कहते हैं ?
उ०—यह जानना कि यह वस्तु हमारे वास्ते लाभदायक है
अथवा हानिकारक, उसको अविवेक कहते हैं ।
प्र०—इस अविवेक का कारण क्या है ?
उ०—जीव की अल्पज्ञता ही अविवेक का कारण है ।
प्र०—क्या वह जीव की अल्पज्ञता जीव का स्वाभाविक गुण
है अथवा उसका भी कोई कारण है ?
उ०—उसका कोई कारण नहीं ।
प्र०—जब अल्पज्ञता स्वाभाविक गुण है, और स्वाभाविक का
नाश हो नहीं सकता, बस कारण रहा, तो कार्य-बन्धन सदैव
रहेगा ?
उ०—जिस प्रकार वायु स्वभाव से उष्ण, शीत से अलग है,
ऐसे ही जीव बन्धन मुक्ति से पृथक् है । यह दोनों गुण नैमित्तिक
हैं, इसलिये प्रवाह से अनादि हैं, और स्वरूप से सादि होते हैं ।
नियतकारणात्तदुच्छित्तिर्ध्वान्तवत् ॥ ५६ ॥
अर्थ—जिस प्रकार मन्द अन्धकार से जो सीप में चाँदी का
ज्ञान या रज्जु में सर्प का ज्ञान है, उसके नाश करने का नियत
उपाय है, अर्थात् प्रकाश का होना ; किन्तु प्रकाश के बिना किसी
अन्य उपाय से यह अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता । इसी प्रकार
अविवेक से उत्पन्न होनेवाला जो बन्धन है, उसके नष्ट करने
के उपाय विवेक अर्थात् पदार्थ के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान है ।
( २३ )
प्रधानाविवेकादन्याविवेकस्य तद्धाने हानम् ॥ ५७
अर्थ—जीव में प्रधान अर्थात् प्रकृति के अविवेक अर्थात्
पदार्थ ज्ञान के न होने से और कारण आदि से पदार्थों का
अज्ञान होता है। आशय यह कि बन्धन का कारण जीव की
अल्पज्ञता है, क्योंकि जीव अपनी स्वाभाविक अल्पज्ञता से
प्रकृति का विवेक नहीं रखता, जिससे प्राकृतिक पदार्थों में
मिथ्या ज्ञान उत्पन्न होता है, और मिथ्या ज्ञान से रागद्वेष
और राग-द्वेष से प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, और उससे बन्धन
अर्थात् तीन प्रकार का दुःख उत्पन्न होता है, और जिस समय
प्रकृति का मिथ्या ज्ञान नष्ट हो जाता है तब प्रकृति के पदार्थों
का अविवेक दूर होकर दुःख रूप बन्धन से छूट जाता है।
वाङ्_मात्रं नतु तत्वं चित्तस्थितेः ॥ ५८ ॥
अर्थ—दुःखादि को चित्त में रहनेवाला होने से उनका पुरुष
में कथनमात्र ही है; जैसे—लाल डाँक के लगाने से अँगूठी का
हीरा लाल मालूम होता है, ऐसे जीव मन के दुःखी होने से दुःखी
मालूम होता है, और मन के सुखी होने से सुखी मालूम होता है,
वास्तव में सुख दुःख से पृथक् है।
प्र०—यदि इस भाँति दुःख कथनमात्र ही है, तो युक्ति से
भी दूर हो जायगा, उसके लिये विवेक की क्या आवश्यकता है,
इसका उत्तर अगले सूत्र में देते हैं ?
युक्तितोऽपि न बाध्यते दिङ्_मूढवदपरोक्षादृते ५६
अर्थ—इस केवल कथनमात्र दुःख का भी युक्ति से नाश
नहीं हो सकता, बिना अपरोक्ष ज्ञान के। जैसे किसी मनुष्य को
पूर्व दिशा में उत्तर का भ्रम हो जावे तो जब तक उसे पूर्व और
सूत्र में भी दिखलाया गया है, कि जब तक दिशा का प्रत्यक्ष
( २४ )
उत्तर दिशा का भली-भाँति ज्ञान न हो जावे, तब तक यह भ्रम
जा ही नहीं सकता ; इस कारण विवेक की आवश्यकता है, और
सूत्र में भी दिखलाया गया है, कि जब तक दिशा का प्रत्यक्ष
न हो जावे तब तक भ्रमन्निवृत्ति नहीं हो सकती ; इसलिये जब
तक प्रकृति और पुरुष के धर्म का ठीक निश्चय करके प्रकृति से
निवृत्ति और पुरुष की प्राप्ति न हो तब तक दुःख दूर भी
न होगा।
उ०—अचाक्षुषाणामनुमानेन बोधो धूमादि-
भिरिव वह्नेः ॥ ६० ॥
अर्थ—प्रकृति पुरुष अर्थात् जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति
का तो प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान से ज्ञान होता है।
प्र०—क्या यह प्रकृति प्रत्यक्ष नहीं ?
उ०—नहीं, प्रत्युत जो प्रत्यक्ष है वह विकृति है, अर्थात् प्रकृति
का परिणाम है।
प्र०—सूत्र में तो पुरुष शब्द है, तुम इससे जीवात्मा और
परमात्मा किस प्रकार लेते हो ?
उ०—शरीर में रहने से जीवात्मा और संसार में व्यापक
होने से परमात्मा पुरुष शब्द से लिये गये और न्याय में आत्मा
और सांख्य में पुरुष शब्द एक ही अर्थ के बतलानेवाले हैं।
सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था, प्रकृतिः प्रकृतेर्म-
हान्, महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमि-
न्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पंचविंश-
तिर्गणः ॥ ६१ ॥
( २५ )
अर्थ—सत्वगुण प्रकाश करनेवाला, रजोगुण न प्रकाश और
न आवरण करनेवाला, तमोगुण आवरण करनेवाला। जब यह
तीनों गुण समान रहते हैं, उस दशा का नाम प्रकृति है; क्योंकि
वर्तमान दशा में सत्वगुण, तमोगुण का परस्पर विरोध है। इस
समय जिस शरीर में सत्त्वगुण रहता है, वहाँ तमोगुण का वास
नहीं और इसी तरह जहाँ तमोगुण का निवास है वहाँ सत्वगुण
नहीं; परन्तु कारण अर्थात् परमाणु की दशा में एक दूसरे के
विरुद्ध नहीं कर सकते, उस समय पास ही पास रह सकते हैं।
अब उस प्रकृति से महत्तत्त्व अर्थात् मन उत्पन्न होता है और
मन से अहङ्कार और अहङ्कार से पंच सूक्ष्म तन्मात्रा या रूप
रस, गंध, स्पर्श और शब्द उत्पन्न होते हैं, उनसे पाँच ज्ञानेन्द्रिय
और पाँच कर्मेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं, और पञ्चतन्मात्राओं से पाँच
भूत अर्थात् पृथिवी, अप, तेज, वायु, और आकाश होते हैं,
और जब इनसे पुरुष अर्थात् जीव और ब्रह्म मिल जाता है तो
२५ गुण कहलाते हैं।
प्र०—अनेक पुरुषों ने महत्तत्त्व का अर्थ बुद्धि किया है, तुम
'मन' किस प्रकार लेते हो ?
उ०—बुद्धि जीवात्मा का गुण है। जीव के सत्य होने से वह
नित्य है, वह प्रकृति का कार्य्य नहीं और मन सूक्ष्म अन्य का
विकार है, अतएव मन ही लेना चाहिये।
प्र०—मन की इन्द्रियों में गणना की जाती है, अतएव भिन्न
करने से बुद्धि का ही प्रयोजन प्रतीत होता है ?
उ०—यदि १० इन्द्रियों में ११ वां मन भी लिया जाय तो
तुम्हारी संख्या ही अशुद्ध हो जायगी, इस हेतु से महत्तत्त्व का
अर्थ मन ही है।
( २६ )
स्थूलात् पञ्चतन्मात्राय ॥ ६२ ॥
अर्थ—इन पांच प्रकाशवान् तत्त्वों से उन सूक्ष्म तन्मात्रों का
अनुमान होता है, जिस प्रकार कार्य्य को देखकर कारण का
अनुमान होता है ; जैसे लिखा है—
कारणगुणपूर्वकं कार्य्य गुणो दृष्टः ॥
अर्थ—कार्य्य के गुणों के अनुसार कारण और कारण के
अनुसार कार्य्य के गुणों का अनुमान होता है ।
इसी प्रकार यहां कार्य्य तत्त्वों को देख कर कारण तन्मात्रा
का ज्ञान हो जाता है ।
बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्चाहङ्कारंस्य ॥ ६३ ॥
अर्थ—बाहर की और आभ्यन्तर्रीय इन्द्रियों से पञ्च तन्मात्रा
रूप कार्य का ज्ञान होकर उसके कारण अहङ्कार का भी ज्ञान
होता है, क्योंकि स्पर्शादि विषयों का ज्ञान समाधि और सुषुप्ति
अवस्था में जबकि अहङ्कार रूप वृत्ति का अभाव होता है नहीं
होता, इससे अनुमान होता है कि यह इस वृत्ति से उत्पन्न होते
हैं, अर्थात् अहङ्कार के कार्य्य हैं और अहङ्कार इनका कारण
है ; क्योंकि यह नियम है कि जो जिसके बिना पैदा न हो सके
वह उसका कारण होता है, और भूत विना अहङ्कार के सुषुप्ति
अवस्था में दृष्टिगत नहीं होते, अतएव यही उनका कारण
अनुमान से प्रतीत होता है ।
तेनान्तःकरणस्य ॥ ६४ ॥
अर्थ—और अहङ्काररुपी कार्य्य से उसके कारण अन्तःकरण
का अनुमान होता है, क्योंकि प्रथम मन में वस्तु की अस्तित्व का
निश्चय करके उसमें अहङ्ककार किया जाता है, अर्थात् उसे अपना
( २७ )
मानते हैं। जिस समय तक वस्तु की अस्तित्व का निश्चय न हो
तब तक उसमें अभिमान नहीं होता है, अर्थात् मैं हूँ, और यह
मेरा है, यह ज्ञान जबतक अपने-अपने और चीज़ की अस्तित्व
का ज्ञान न हो, किस तरह हो सकता है ?
ततः प्रकृतेः ॥ ६५ ॥
अर्थ—और उस मन से प्रकृति, जो मन का कारण है, उसका
अनुमान होता है, क्योंकि मन मध्यम परिणाम वाला होने से
कार्य्य है और प्रत्येक कार्य का कारण अवश्य होता है ; अब मन
का कारण प्रकृति के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता । क्योंकि
पुरुष तो परिणाम रहित है, और मन का शरीर की तरह मध्यम
परिणामवाला होना श्रुति, स्मृति और युक्ति से सिद्ध है ; क्योंकि
मन, सुख-दुःख और मोह धर्मवाला है, इस वास्ते उसका कारण
भी मोह धर्मवाला होना चाहिये । दुःख परतन्त्रता का नाम है,
और पुरुष की परतन्त्रता हो नहीं सकती । परतन्त्रता केवल जड़
प्रकृति का धर्म है और उसका कार्य्य मन है ।
संहतपरार्थत्वात् पुरुषस्य ॥ ६६ ॥
अर्थ—प्रकृति के अवयवों की संहति सर्वदा दूसरे के वास्ते
होती है, अपने लिये नहीं । इससे पुरुष का अनुमान होता है ;
क्योंकि मन आदिक जो प्रकृति के कार्य्य हैं, उन से पुरुष को लाभ
होता है । मन आदिक अपने लिये कुछ भी नहीं कर सकते,
और जितने शरीर से लेकर अन्न, वस्त्र, पात्रादि प्रकृति के विकार
हैं, उन से दूसरों का ही उपकार होना है, और पुरुष की क्रिया
का भोग पदार्थ नहीं है ; क्योंकि उपनिषद् में लिखा है "नवाअरे
सर्वस्य कामाय सर्वंप्रियंभवति नतुकामायसर्वंप्रियंभवति”—अर्थात्
सम्पूर्ण वस्तुओं के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी नहीं,
( २८ )
किन्तु आत्मा के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी प्रतीत
होती हैं ।
प्र०—क्या प्रकृति का कोई कारण नहीं है, ब्रह्म को कारण
सुना जाता है ?
उ०—ब्रह्म जगत् का निमित्त-कारण है । प्रकृति का उपादान
कारण नहीं ।
प्र०—प्रकृति को क्यों अकारण मानते हो ?
उ०—मूले मूला भावादमूलं मूलम् ॥ ६७ ॥
अर्थ—२२ तत्त्वों का मूल उपादान कारण प्रकृति है, और
मूल अर्थात् जड़ की जड़ नहीं होती, इसवास्ते मूल बिना मूल के
ही होता है ।
प्र०—प्रकृति को मूल क्यों मानते हो ?
उ०—यदि मूल का मूल मानोगे, तो उसके मूले की भी आ-
वश्यकता होगी । इस प्रकार अनवस्था आजायगी ।
प्र०—जैसे घट का कारण मृत्तिका है, और मृत्तिका का
कारण परमाणु है ?
उ०—पारम्पर्येऽप्येकत्र परिनिष्ठेति संज्ञा-
मात्रम् ॥ ६८ ॥
कारणों की परम्परा के विचार से परमाणु ही घट का कारण
है, मृत्तिका तो नाममात्र है ।
समानः प्रकृतेर्द्वयोः ॥ ६६ ॥
घट और मृत्तिका के साथ प्रकृति का समान सम्बन्ध है,
अर्थात् परम्परा से प्रकृति ही घट और मृत्तिका का कारण है,
और निरवयव होने से नित्य है, उसका कोई कारण नहीं ।
( २६ )
अधिकारित्रैविध्यान्ननियमः ॥ ७० ॥
यद्यपि प्रकृति सबका उपादान कारण है; परन्तु प्रत्येक
कार्य्य में जो तीन प्रकार के कारण माने जाते हैं अर्थात् ☸ १
उपादान, २ निमित्त, और ३ साधारण—इन की भी व्यवस्था न
रहेगी, क्योंकि जब कुम्हार मिट्टी दण्डादि का कारण प्रकृति ही
ठहरी, तो इन तीन कारणों की अनावश्यकता होने से बहुत
गोलमाल हो जायगा। इस में हेतु यह है, कि फिर कोई भी किसी
का निमित्त व असाधारण कारण न रहेगा, अतएव जहाँ-जहाँ
कारणत्व कहा जाय, वहाँ-वहाँ प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये,
क्योंकि प्रकृति तो सबका कारण है ही, उसके कहने की कोई
भी आवश्यकता नहीं है; जैसे—कुम्हार के पिता को घट का कारण
कहना अनावश्यक है, क्योंकि वह तो अन्यथा सिद्ध है। यदि
वही न होता तो कुलाल कहां से आता ? परन्तु घट के बनने में
कुलाल के पिता की कोई भी आवश्यकता नहीं है, ऐसा ही नवीन
नैयायिक भी मानते हैं, कि कारणत्व प्रकृति को छोड़कर कहना
चाहिये।
☸ १ उपादान कारण, जैसे घट का मृत्तिका। २ निमित्त
कारण, जैसे घट का कुलाल। ३ साधारण, जैसे घट के दण्ड आदि।
महदाख्यमाद्यं कार्य्यं तन्मनः ॥ ७१ ॥
अर्थ—प्रकृति का पहिला कार्य महत् है, और वह मन
कहलाता है। मन से अहङ्कारादि उत्पन्न होते हैं, मन की
उत्पत्ति ६१ सूत्र में कहचुके हैं।
चरमोऽहङ्कारः ॥ ७२ ॥
अर्थ—और प्रकृति का दूसरा कार्य अहङ्कार है। इन
तीनों सूत्रों का अभिप्राय यह है कि यदि प्रकृति को कारणत्व
सूत्रों से स्पष्ट करते हैं।
( ३० )
कहा जावे, तो केवल इन्हीं दो कार्यों का कहना अन्य कार्यों
का कारण महदादि को कहना चाहिये। इसी बात को अगले
सूत्रों से स्पष्ट करते हैं।
तत्कार्यत्वमुत्तरेषाम् ॥ ७३ ॥
अर्थ—महत् और अहङ्कार को छोड़ बाक़ी सब प्रकृति
के कार्य नहीं, किन्तु उनके कारण महदादि हैं।
प्र०—जब तुमने पहिले इसको प्रकृति का कार्य कहा,
अब उसे अलग करते हो, कि औरों को महदादिकों का कार्य
कहना चाहिये। अब यहाँ यह सन्देह होता है, कि पहिले प्रकृति
को सबका कारण कहचुके। अब महदादिकों को क्यों कारण
कहते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि—
उ०—आद्यहेतुता तद्द्वारा पारम्पर्येऽप्यणुवत् ७४
अर्थ—जिस प्रकार परम्परा सम्बन्ध से घटादि के कारण
अणु माने थे, उसी भाँति परम्परा सम्बन्ध से महदादिकों का
कारण भी प्रकृति ही है, अतएव कुछ दोष न रहेगा।
पूर्वभावित्वे द्वयोरेकतरस्य हानेऽन्यतरयोगः ७५
अर्थ—पहिले होने में एक यह भी युक्ति है, कि कार्य नाश
होकर कारण में मिल जाता है, और अन्त में सब कार्य पदार्थ
प्रकृति में लय हो जाते हैं।
यदि कोई शङ्का करे कि जब प्रकृति और पुरुष दोनों कार्य
जगत् से पहिले थे, तो अकेली प्रकृति को क्यों कारण माना
जावे ? इसका उत्तर यह है कि पुरुष परिणामी नहीं और उपादान
कारण का परिणाम ही कार्य कहलाता है, और पुरुष के
अपरिणामी होने में १५-१६ के सूत्र प्रमाण हैं। यदि प्रकृति
( ३१ )
सम्बन्ध से प्रकृति द्वारा पुरुष में परिणाम मानें और दोनों को
कारण मानें तो वृथा गौरव होगा।
प्र०—कारण से उपादान-कारण का क्यों ग्रहण करते हो,
निमित्त को क्यों नहीं लेते ?
उ०—उपादान-कारण के गुण ही कार्य में रहा करते हैं।
हमें जगत् में जिस आनन्द की खोज है, यदि वह जगत् के
कारण में होगा तो मिलेगा अन्यथा पुरुषार्थ निरर्थक जायगा ;
इसलिये विवेक के लिये उपादान कारण की ही आवश्यकता है।
प्र०—प्रकृति एक-देशी है वा व्यापक ?
परिच्छिन्नं न सर्वोपादानम् ॥ ७६ ॥
उ०—एक-देशी और अनित्य पदार्थ सर्व जगत् का उपादान
कारण नहीं हो सकते ; क्योंकि अनित्य पदार्थ को कार्य होने से
स्वयम् कारण की आवश्यकता है।
प्र०—एक देशी पदार्थ की उत्पत्ति में क्या प्रमाण है ?
उ०—तदुत्पत्तिश्रुतेश्च ॥ ७७ ॥
अनित्य और एक-देशी पदार्थों की उत्पत्ति श्रुति में मानी
है और जिसकी उत्पत्ति है उसका विनाश अवश्य होगा।
प्र०—अविद्या सम्बन्ध से जगदुत्पत्ति है, इस में क्या दोष
है ? इसका उत्तर महात्मा कपिलजी यह देते हैं।
नावस्तुनो वस्तुसिद्धिः ॥ ७८ ॥
उ०—जो अविद्या द्रव्य नहीं है केवल गुण मात्र है या कोई
वस्तु नहीं है, उस से यह जगत् जो द्रव्य और वस्तु है, किस प्रकार
उत्पन्न होसकता है ? क्योंकि गुण द्रव्य का एक अवयव होता है।
एक अवयव से अवयवी की उत्पत्ति नहीं हो सकती और न
( ३२ )
अभाव से भाव की उत्पत्ति होती है ; जैसे—मनुष्य के सींग नहीं
तो उस सींग से कमान कैसे बन सकती है ।
प्र०—यह संसार भी अवस्तु है, इसवास्ते यह अविद्या से
बना है ?
अवाधाददुष्टकारणजन्यत्वाच्चनावस्तुत्वम् ॥ ७६
उ०—यदि कहो जगत् भी अवस्तु है, तो यह कहना ठीक
नहीं, क्योंकि न तो स्वप्न के पदार्थों के तुल्य जगत् का किसी
अवस्था विशेष में बाध होता है, जैसे—स्वप्न के पदार्थों का जाग्रत
अवस्था में बाध होजाता है, और न जगत् किसी इन्द्रिय के दोष
से प्रतीत होता है, जैसे—पीलिया रोग की अवस्था में सब वस्तुओं.
को पीला प्रतीत करता है परन्तु यह पीलापन सत्य नहीं
जगत् । इस प्रकार के किसी दोषयुक्त कारण से उत्पन्न नहीं
हुआ, इस कारण जगत् को अवस्तु नहीं कह सकते ।
प्र०—जब श्रुतियों में जगत् का मिथ्या होना कहा गया है
तब जगत् वस्तु नहीं हो सकता ?
उ०—क्या तुम श्रुति को जगत् के अन्दर मानते हो या
बाहर । यदि अन्दर मानो तो जगत् के मिथ्या होने से श्रुति का
स्वयं ही बाध होजायगा और वह मिथ्या श्रुति प्रमाण ही न
रहेगी । यदि जगत् से बाहर मानो, तो अद्वैतवादी के सिद्धान्त की
हानि होगी ।
प्र०—“नेति नेति” इस प्रकार की श्रुतियों का क्या अर्थ
करोगे ?
उ०—यह श्रुतियें ब्रह्म का जगत् से भेद याने भिन्नता को
बताने वाली हैं और जगत् को स्वरूप से अवस्तु बतलाने वाली
नहीं ।
( ३३ )
भावेत्तद्योगेन तत्सिद्धिरभावे तद्भावात्
कुतस्तरां तत्सिद्धिः ॥ ८० ॥
अर्थ—कारण के होने से उसके संयोग से कार्य्य बन सकता
है, और कारण के अभाव में किसके योग से द्रव्यरूप कार्य
बनेगा, जैसे—मिट्टी के होने से तो उसका घट बन जायगा। जब
मृत्तिका ही न तो किसका घट बनेगा ?
प्र०—तुम प्रधान अर्थात् प्रकृति को क्यों कारण मानते हो ?
कर्म को मानना चाहिये ।
उ०—न कर्मण उपादानत्वायोगात् ॥ ८१ ॥
अर्थ—कर्म से जगत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि
कर्म द्रव्य तो हैं ही नहीं। द्रव्य के विना गुणादि में उपादान
कारण होने की योग्यता नहीं। कारण यह है, कि द्रव्य का उपादान
कारण द्रव्य ही होता है। यदि कहो हम ऐसी कल्पना करते
हैं, तो कल्पना दृष्ट के अनुसार प्रामाणिक और विरुद्ध होने से
अप्रामाणिक है और वैशेषिक में कहे हुये गुण और कर्म कहीं
उपादान कारण होते नहीं। देखो यहाँ कर्म शब्द से अविद्या और
गुणों को भी लेना चाहिये, वह भी उपादान के योग्य नहीं।
यहाँतक तो यह बतलाया गया कि प्रकृति में परिणाम है,
परन्तु पुरुष अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा में परिणाम नहीं।
दूसरे प्रकृति के जितने कार्य्य हैं, वह दूसरे के वास्ते हैं, क्योंकि
उसमें स्वयम् भोगशक्ति नहीं। अब पाँच सूत्रों में मुक्ति का कारण
कर्म नहीं विवेक है, यह कहेंगे ।
नानुश्रविकादपि तत्सिद्धिः साध्यत्वेनावृत्ति-
योगादपुरुषार्थत्वम् ॥ ८२ ॥
( ३४ )
अर्थ—यह तो पहिले कह चुके हैं कि दृष्ट पदार्थों वा कर्म से
दुखात्यन्त निवृत्ति नहीं होती। अब कहते हैं, कि ज्ञान के बिना
वेदोक्त कर्म से भी मुक्ति नह होती ; क्योंकि वैदिक कर्मों से जो
स्वर्गादि सुख मिलते हैं उनका भी नाश हो जाता है, इस वास्ते
यह पुरुषार्थ नहीं। पहिले “न कर्मणा अन्य धर्मत्वात्” इस सूत्र में
कर्म से बन्धन नहीं होता, इसका खण्डन किया गया था, अब
कर्म से मुक्ति होती है इसका भी खण्डन कर दिया ।
प्र०—श्रुति में बतलाया गया है कि इस प्रकार के कर्म से
ब्रह्मलोक कोँ प्राप्त होकर ब्रह्मलोक की आयु तक पुनरावृत्ति
नहीं होती ?
उ०—तत्रप्राप्तविवेकस्यानावृत्तिश्रुतिः ॥ ८३ ॥
अर्थ—इस श्रुति में भी प्राप्तविवेक ही के वास्ते वैदिक कर्मों
से अनावृत्ति मानी गई है । यदि ऐसा न मानो तो दूसरी श्रुतियों से
जो ब्रह्मलोक से पुनरावृत्ति का कथन करती हैं, विरोध होकर
दोनों का प्रमाण नहीं रहेगा ; इसलिये प्राप्तविवेक ही से मुक्ति
माननी चाहिये ।
दुःखाद् दुःखं जलाभिषेकवन्न जाड्यविमोकः ८४
अर्थ—जो कर्म शरीर से उत्पन्न होता है और शरीर वे
न होने पर नहीं होता, इसवास्ते कर्म स्वयम् दुःख रूप य
अविद्या स्वरूप है । जिस प्रकार दुःख से दुःख का नाश नई
होता, उसी प्रकार कर्म से दुःख का नाश नहीं हो सकता, जैसे—
जल में नहाने से शीत बढ़ता है, नाश नहीं होता, ऐसे ही विवेक
रहित कर्म से मुक्ति नहीं होती ।
काम्येऽकाम्येऽपि साध्यत्वाविशेषात् ॥ ८५ ॥
( ३५ )
अर्थ—चाहे कर्म निष्काम हो चाहे सकाम हो, परन्तु ज्ञान
के बिना मुक्ति का साधन नहीं हो सकता ; क्योंकि दोनों प्रकार
के कर्मों में साध्यत्व अर्थात् शरीर से उत्पत्तिवाली होना समान
है, और श्रुति में भी लिखा है “न कर्मणा न प्रजया” इत्यादि
अर्थात् न तो कर्म से मुक्ति होती, न प्रजा से, न धन से, ज्ञान के
बिना किसी साधन से मुक्ति नहीं होती ।
प्र०—ज्ञान दुःख का विरोधी नहीं, इसलिये ज्ञान से दुःख
का नाश कैसे हो सकता है ?
उ०—दुःख जन्म-मरण से होता है ; जन्म-मरण कर्म से
होते हैं, कर्म प्रवृत्ति से होता है, प्रवृत्ति राग-द्वेष से होती है,
राग-द्वेष मिथ्याज्ञान से होते हैं, ज्ञान मिथ्या-ज्ञान का विरोधी है,
जब मिथ्या ज्ञान का नाश ज्ञान से हो जायगा तब उसकी
सन्तान को दुःखादि उत्पन्न ही नहीं होंगे ।
प्र०—जब ज्ञान को साधन मानोगे तो ज्ञान साध्य होने से
भी मुक्ति दुःखरूप हो जायगी ; क्योंकि ज्ञान भी तो देहस्थ
आत्मा ही को होगा और ज्ञान साध्य होने से मुक्ति ऐसी ही
अनित्य होगी जैसा कर्म का फल है ?
उ०—निजमुक्तस्य बन्धध्वंसमात्रं परं न
समानत्वम् ॥ ८६ ॥
अर्थ—कर्म का फल तो भावरूप सुख है, इसलिये वह
अनित्य है ; परन्तु ज्ञान का फल तो अविद्या का विनाश रूप
है । जब कार्याभाव रूप नहीं तो उसका नाश न होगा । दूसरे
कर्म देहात्मविशिष्ट से होता है और उसका फल भी देहात्मा
मिलकर भोगते हैं, परन्तु देह विनाशी है, इसलिये कर्म का फल
भी विनाशी ज्ञानात्मा का धर्म आत्मा में नित्य हो सकता है ।
( ३६ )
प्र०—क्या आत्म निज मुक्त है ?
उ०—अविद्यादि दोषों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसके
दूर होने से जीवात्मा मुक्ति सुख को लेता है। यहाँ आचार्य ऋषि
का यह आशय है कि स्वभाव से तो जीवात्मा बद्ध नहीं केवल
अविवेक से बद्ध होता है और अविवेक के नाश से मुक्त होता
है, तो मुक्ति ध्वंस अर्थात् नाशरूप है, भावरूप नहीं।
द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थ परिच्छित्तिः
प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम् ॥ ८७ ॥
अर्थ—ज्ञाता और ज्ञेय के पास-पास होने से जो ज्ञान होता
है, उसे प्रमा कहते हैं। इस प्रमा के साधन तीन प्रकार के
प्रमाण हैं—एक प्रत्यक्ष, दूसरा अनुमान, तीसरा शब्द। जो
पदार्थ भौतिक और नजदीक हैं, उनका ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से
होता है, और जो पदार्थ अभौतिक तथा दूर हैं, उनका शब्द
और अनुमान से होता है, यहाँ दूर का आशय परोक्ष है। जिन
पदार्थों का तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उनका शब्द प्रमाण से
बोध होता है। यहाँ शब्द का आशय योगी और ईश्वर की आज्ञा
है। जहाँ भौतिक पदार्थों का परोक्ष होने में शब्द प्रमाण लिया
गया है, वहाँ सत्यवादी आप्त पुरुष का वाक्य समझना चाहिये।
प्र०—एक शब्द प्रमाण के दो अर्थ क्यों लिये जावें ?
उ०—शब्द कहते हैं आप्त के वाक्य को और आप्त कहते हैं
जिसने धर्म से धर्मों का निश्चय किया हो, सो अभौतिक पदार्थों
का यथार्थ ज्ञान तो बिना परमात्मा और योगी के दूसरे को हो
नहीं सकता और भौतिक पदार्थों के ज्ञान के साधन इन्द्रियों के
होने से आप्त पुरुष का वाक्य भी प्रमाण मानना चाहिये।
प्र०—क्या यह तीन ही प्रमाण हैं उपमानादि नहीं ?
( ३७ )
उ०—तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धिः॥८८॥
अर्थ—इन तीन प्रमाणों के सिद्ध होने से सब पदार्थों की
सिद्धि हो जाती है, इसलिये और प्रमाण माँगने की आवश्यकता
नहीं ; क्योंकि महात्मा मनु ने भी लिखा है ।
प्रत्यक्षञ्चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् ।
त्रयं सुविदितं कार्य्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता ।
अर्थ—प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र के अनुकूल जानकर
कार्य करना चाहिये ; क्योंकि धर्म की शुद्धि की इच्छावालों की
इच्छा इनसे पूरी होसकती है और उपमानादि प्रमाण इन्हीं के
अन्दर आजाते हैं ।
यत्सम्बद्धं सत्तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत्
प्रत्यक्षम् ॥ ८९ ॥
जिस सामने उपस्थित पदार्थ के साथ ज्ञानेन्द्रिय का सम्बन्ध
हो और मन को भी उस इन्द्रिय के द्वारा उसका यथार्थ बोध
होजाय, तो उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और इस ज्ञान का कारण
ज्ञानेन्द्रिय और मन की वृत्ति है । इसलिये मन और इन्द्रियें
प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाती हैं और इनका विषय केवल प्राकृत पदार्थ
ही हैं । प्रत्यक्ष से अप्राकृत पदार्थों का ज्ञान नहीं होसकता ।
प्र०—योगियों को तीनों काल के पदार्थों का साक्षात
ज्ञान हो सकता है और योगी समाधि अवस्था में आत्मा और
अन्दर के पदार्थों को प्रत्यक्ष करता है, इस वास्ते तुम्हारा प्रत्यक्ष
का लक्षण ठीक नहीं ?
उ०—योगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वान्नदोषः ॥ ९० ॥
( ३८ )
अर्थ—यह लक्षण बाह्य प्रत्यक्ष का है और योगियों को
अबाह्य प्रत्यक्ष भी होता है, इसलिये योगियों का प्रत्यक्ष बाह्य
रूप न होने से दोष नहीं। इसके लिये और युक्ति देते हैं।
लीनवस्तु लब्धातिशयसम्बन्धादऽदोषः ॥ ९१ ॥
योगी लोग ऐसी वस्तु का जो दूर हो अथवा दूसरे के चित्त
में हो उसके साथ भी सम्बन्ध रखते हैं, इस वास्ते योगियों के
ऐसे प्रत्यक्ष में दोष नहीं आता।
प्र०—योगियों का ऐसा प्रत्यक्ष क्यों माना जावे ? क्योंकि
यह साध्य अर्थात् प्रमाण की आवश्यकता रखता है, इसलिये
इन्द्रियग्राह्य पदार्थ का ही प्रत्यक्ष मानना चाहिए और अतीन्द्रिय
पदार्थ का प्रत्यक्ष न कहना चाहिए।
उ०—मन के इन्द्रिय होने से मानसिक प्रत्यक्ष भी मानना
चाहिए, इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष जो योगियों को होता है वह
सिद्ध है साध्य नहीं।
प्र०—प्रमाण वह होता है जो सबके लिये एक सम हो, जो
प्रत्यक्ष योगियों को हो अन्य पुरुषों को न हो, उसे प्रत्यक्ष नहीं
कह सकते ?
उ०—इन्द्रियों के विकारी होने से इन्द्रियजन्य ज्ञान किसी
को भी नहीं होता, जैसे—अन्धे को रूप का ज्ञान, बहिरे को शब्द-
ज्ञान इत्यादि।
प्र०—क्या सबके मन में दोष है जो मानसिक प्रत्यक्ष नहीं
होता ?
उ०—जिसके मन में मल, विक्षेप, आवरण, तीन दोष हों
उसे मानसिक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, जैसे—दर्पण से अपनी आँख
देख सकते हैं, परन्तु दर्पण के मैला तथा स्थिर न होने अथवा कोई
आवरण होने से नहीं देख सकते। जैसे गंगा में यह शक्ति है कि