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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 192 में से

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मानते हैं। जिस समय तक वस्तु की अस्तित्व का निश्चय न हो
तब तक उसमें अभिमान नहीं होता है, अर्थात् मैं हूँ, और यह
मेरा है, यह ज्ञान जबतक अपने-अपने और चीज़ की अस्तित्व
का ज्ञान न हो, किस तरह हो सकता है ?
ततः प्रकृतेः ॥ ६५ ॥
अर्थ—और उस मन से प्रकृति, जो मन का कारण है, उसका
अनुमान होता है, क्योंकि मन मध्यम परिणाम वाला होने से
कार्य्य है और प्रत्येक कार्य का कारण अवश्य होता है ; अब मन
का कारण प्रकृति के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता । क्योंकि
पुरुष तो परिणाम रहित है, और मन का शरीर की तरह मध्यम
परिणामवाला होना श्रुति, स्मृति और युक्ति से सिद्ध है ; क्योंकि
मन, सुख-दुःख और मोह धर्मवाला है, इस वास्ते उसका कारण
भी मोह धर्मवाला होना चाहिये । दुःख परतन्त्रता का नाम है,
और पुरुष की परतन्त्रता हो नहीं सकती । परतन्त्रता केवल जड़
प्रकृति का धर्म है और उसका कार्य्य मन है ।
संहतपरार्थत्वात् पुरुषस्य ॥ ६६ ॥
अर्थ—प्रकृति के अवयवों की संहति सर्वदा दूसरे के वास्ते
होती है, अपने लिये नहीं । इससे पुरुष का अनुमान होता है ;
क्योंकि मन आदिक जो प्रकृति के कार्य्य हैं, उन से पुरुष को लाभ
होता है । मन आदिक अपने लिये कुछ भी नहीं कर सकते,
और जितने शरीर से लेकर अन्न, वस्त्र, पात्रादि प्रकृति के विकार
हैं, उन से दूसरों का ही उपकार होना है, और पुरुष की क्रिया
का भोग पदार्थ नहीं है ; क्योंकि उपनिषद् में लिखा है "नवाअरे
सर्वस्य कामाय सर्वंप्रियंभवति नतुकामायसर्वंप्रियंभवति”—अर्थात्
सम्पूर्ण वस्तुओं के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी नहीं,