सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

( ३६ )
प्र०—क्या आत्म निज मुक्त है ?
उ०—अविद्यादि दोषों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसके
दूर होने से जीवात्मा मुक्ति सुख को लेता है। यहाँ आचार्य ऋषि
का यह आशय है कि स्वभाव से तो जीवात्मा बद्ध नहीं केवल
अविवेक से बद्ध होता है और अविवेक के नाश से मुक्त होता
है, तो मुक्ति ध्वंस अर्थात् नाशरूप है, भावरूप नहीं।
द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थ परिच्छित्तिः
प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम् ॥ ८७ ॥
अर्थ—ज्ञाता और ज्ञेय के पास-पास होने से जो ज्ञान होता
है, उसे प्रमा कहते हैं। इस प्रमा के साधन तीन प्रकार के
प्रमाण हैं—एक प्रत्यक्ष, दूसरा अनुमान, तीसरा शब्द। जो
पदार्थ भौतिक और नजदीक हैं, उनका ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से
होता है, और जो पदार्थ अभौतिक तथा दूर हैं, उनका शब्द
और अनुमान से होता है, यहाँ दूर का आशय परोक्ष है। जिन
पदार्थों का तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उनका शब्द प्रमाण से
बोध होता है। यहाँ शब्द का आशय योगी और ईश्वर की आज्ञा
है। जहाँ भौतिक पदार्थों का परोक्ष होने में शब्द प्रमाण लिया
गया है, वहाँ सत्यवादी आप्त पुरुष का वाक्य समझना चाहिये।
प्र०—एक शब्द प्रमाण के दो अर्थ क्यों लिये जावें ?
उ०—शब्द कहते हैं आप्त के वाक्य को और आप्त कहते हैं
जिसने धर्म से धर्मों का निश्चय किया हो, सो अभौतिक पदार्थों
का यथार्थ ज्ञान तो बिना परमात्मा और योगी के दूसरे को हो
नहीं सकता और भौतिक पदार्थों के ज्ञान के साधन इन्द्रियों के
होने से आप्त पुरुष का वाक्य भी प्रमाण मानना चाहिये।
प्र०—क्या यह तीन ही प्रमाण हैं उपमानादि नहीं ?