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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 192 में से

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पृष्ठ 26

( २५ )
अर्थ—सत्वगुण प्रकाश करनेवाला, रजोगुण न प्रकाश और
न आवरण करनेवाला, तमोगुण आवरण करनेवाला। जब यह
तीनों गुण समान रहते हैं, उस दशा का नाम प्रकृति है; क्योंकि
वर्तमान दशा में सत्वगुण, तमोगुण का परस्पर विरोध है। इस
समय जिस शरीर में सत्त्वगुण रहता है, वहाँ तमोगुण का वास
नहीं और इसी तरह जहाँ तमोगुण का निवास है वहाँ सत्वगुण
नहीं; परन्तु कारण अर्थात् परमाणु की दशा में एक दूसरे के
विरुद्ध नहीं कर सकते, उस समय पास ही पास रह सकते हैं।
अब उस प्रकृति से महत्तत्त्व अर्थात् मन उत्पन्न होता है और
मन से अहङ्कार और अहङ्कार से पंच सूक्ष्म तन्मात्रा या रूप
रस, गंध, स्पर्श और शब्द उत्पन्न होते हैं, उनसे पाँच ज्ञानेन्द्रिय
और पाँच कर्मेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं, और पञ्चतन्मात्राओं से पाँच
भूत अर्थात् पृथिवी, अप, तेज, वायु, और आकाश होते हैं,
और जब इनसे पुरुष अर्थात् जीव और ब्रह्म मिल जाता है तो
२५ गुण कहलाते हैं।
प्र०—अनेक पुरुषों ने महत्तत्त्व का अर्थ बुद्धि किया है, तुम
'मन' किस प्रकार लेते हो ?
उ०—बुद्धि जीवात्मा का गुण है। जीव के सत्य होने से वह
नित्य है, वह प्रकृति का कार्य्य नहीं और मन सूक्ष्म अन्य का
विकार है, अतएव मन ही लेना चाहिये।
प्र०—मन की इन्द्रियों में गणना की जाती है, अतएव भिन्न
करने से बुद्धि का ही प्रयोजन प्रतीत होता है ?
उ०—यदि १० इन्द्रियों में ११ वां मन भी लिया जाय तो
तुम्हारी संख्या ही अशुद्ध हो जायगी, इस हेतु से महत्तत्त्व का
अर्थ मन ही है।