सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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भावेत्तद्योगेन तत्सिद्धिरभावे तद्भावात्
कुतस्तरां तत्सिद्धिः ॥ ८० ॥
अर्थ—कारण के होने से उसके संयोग से कार्य्य बन सकता
है, और कारण के अभाव में किसके योग से द्रव्यरूप कार्य
बनेगा, जैसे—मिट्टी के होने से तो उसका घट बन जायगा। जब
मृत्तिका ही न तो किसका घट बनेगा ?
प्र०—तुम प्रधान अर्थात् प्रकृति को क्यों कारण मानते हो ?
कर्म को मानना चाहिये ।
उ०—न कर्मण उपादानत्वायोगात् ॥ ८१ ॥
अर्थ—कर्म से जगत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि
कर्म द्रव्य तो हैं ही नहीं। द्रव्य के विना गुणादि में उपादान
कारण होने की योग्यता नहीं। कारण यह है, कि द्रव्य का उपादान
कारण द्रव्य ही होता है। यदि कहो हम ऐसी कल्पना करते
हैं, तो कल्पना दृष्ट के अनुसार प्रामाणिक और विरुद्ध होने से
अप्रामाणिक है और वैशेषिक में कहे हुये गुण और कर्म कहीं
उपादान कारण होते नहीं। देखो यहाँ कर्म शब्द से अविद्या और
गुणों को भी लेना चाहिये, वह भी उपादान के योग्य नहीं।
यहाँतक तो यह बतलाया गया कि प्रकृति में परिणाम है,
परन्तु पुरुष अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा में परिणाम नहीं।
दूसरे प्रकृति के जितने कार्य्य हैं, वह दूसरे के वास्ते हैं, क्योंकि
उसमें स्वयम् भोगशक्ति नहीं। अब पाँच सूत्रों में मुक्ति का कारण
कर्म नहीं विवेक है, यह कहेंगे ।
नानुश्रविकादपि तत्सिद्धिः साध्यत्वेनावृत्ति-
योगादपुरुषार्थत्वम् ॥ ८२ ॥