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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( २१ )
है और शरीर होने से बन्धन भी है, उसके उत्पन्न होने की
आवश्यकता नहीं ।
अतिप्रसक्तिरन्यधर्म्मत्वे ॥ ५३ ॥
अर्थ—यदि और के धर्म्म से और का बन्धन मान लें तो
नियम टूट जायेंगे; क्योंकि उस अवस्था में बद्ध पुरुष के पाप
से मुक्त बन्धन में आजायेंगे, जो असंगत है ।
निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति ॥ ५४ ॥
अर्थ—यदि उपाधि के बिना पुरुष का बन्धन माना जावे
तो जिन सूत्रों में जीव को साक्षिरूप और निर्गुण बतलाया
है उनमें दोष आ जायगा ; इसलिये जीव स्वभाव से बद्ध है,
न मुक्त है, वरन् यह दोनों औपाधिक धर्म हैं। प्रकृति संसर्ग
से बद्ध हो जाता है और परमात्मा के संसर्ग से मुक्त हो जाता
है। यथार्थ में जीव सुख दुःख से पृथक् और तीनों तापों से
किनारे साक्षिरूप है। इस सूत्र में इति शब्द कहने से बन्धन
के कारण परीक्षा समाप्त कर दी गई ।
प्र०—जब दुःख स्वाभाविक भी नहीं और नैमित्तिक भी
नहीं तो प्रतीत कैसे होता है ?
उ०—जीव को अल्पज्ञता और प्रकृति संसर्ग से बन्धन की
प्रतीति होती है। चूँकि संसर्ग नित्य है, इसलिये नैमित्तिक नहीं
कहला सकता, और बन्ध संसर्ग से उत्पन्न होनेवाले
अविवेक से प्रतीत होता है, इस कारण स्वाभाविक नहीं
कहला सकता । अतएव अविवेक ही इसका कारण है ।
प्र०—जब तुम प्रकृति के योग से बन्धन मानते हो और
प्रकृति भी काल और दशा की नाईं सर्वव्यापक है, तो उसके
योग से बन्धन किस प्रकार हो सकता है ?