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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( २२ )
उ०—तद्योगोऽप्यविवेकान्न समानत्वम् ॥ ५५ ॥
अर्थ—प्रकृति का योग भी अविवेक से होता है, इस-
वास्ते यह काल और दशा के समान नहीं ।
प्र०—अविवेक किसे कहते हैं ?
उ०—यह जानना कि यह वस्तु हमारे वास्ते लाभदायक है
अथवा हानिकारक, उसको अविवेक कहते हैं ।
प्र०—इस अविवेक का कारण क्या है ?
उ०—जीव की अल्पज्ञता ही अविवेक का कारण है ।
प्र०—क्या वह जीव की अल्पज्ञता जीव का स्वाभाविक गुण
है अथवा उसका भी कोई कारण है ?
उ०—उसका कोई कारण नहीं ।
प्र०—जब अल्पज्ञता स्वाभाविक गुण है, और स्वाभाविक का
नाश हो नहीं सकता, बस कारण रहा, तो कार्य-बन्धन सदैव
रहेगा ?
उ०—जिस प्रकार वायु स्वभाव से उष्ण, शीत से अलग है,
ऐसे ही जीव बन्धन मुक्ति से पृथक् है । यह दोनों गुण नैमित्तिक
हैं, इसलिये प्रवाह से अनादि हैं, और स्वरूप से सादि होते हैं ।
नियतकारणात्तदुच्छित्तिर्ध्वान्तवत् ॥ ५६ ॥
अर्थ—जिस प्रकार मन्द अन्धकार से जो सीप में चाँदी का
ज्ञान या रज्जु में सर्प का ज्ञान है, उसके नाश करने का नियत
उपाय है, अर्थात् प्रकाश का होना ; किन्तु प्रकाश के बिना किसी
अन्य उपाय से यह अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता । इसी प्रकार
अविवेक से उत्पन्न होनेवाला जो बन्धन है, उसके नष्ट करने
के उपाय विवेक अर्थात् पदार्थ के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान है ।