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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 192 में से

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( ३८ )
अर्थ—यह लक्षण बाह्य प्रत्यक्ष का है और योगियों को
अबाह्य प्रत्यक्ष भी होता है, इसलिये योगियों का प्रत्यक्ष बाह्य
रूप न होने से दोष नहीं। इसके लिये और युक्ति देते हैं।
लीनवस्तु लब्धातिशयसम्बन्धादऽदोषः ॥ ९१ ॥
योगी लोग ऐसी वस्तु का जो दूर हो अथवा दूसरे के चित्त
में हो उसके साथ भी सम्बन्ध रखते हैं, इस वास्ते योगियों के
ऐसे प्रत्यक्ष में दोष नहीं आता।
प्र०—योगियों का ऐसा प्रत्यक्ष क्यों माना जावे ? क्योंकि
यह साध्य अर्थात् प्रमाण की आवश्यकता रखता है, इसलिये
इन्द्रियग्राह्य पदार्थ का ही प्रत्यक्ष मानना चाहिए और अतीन्द्रिय
पदार्थ का प्रत्यक्ष न कहना चाहिए।
उ०—मन के इन्द्रिय होने से मानसिक प्रत्यक्ष भी मानना
चाहिए, इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष जो योगियों को होता है वह
सिद्ध है साध्य नहीं।
प्र०—प्रमाण वह होता है जो सबके लिये एक सम हो, जो
प्रत्यक्ष योगियों को हो अन्य पुरुषों को न हो, उसे प्रत्यक्ष नहीं
कह सकते ?
उ०—इन्द्रियों के विकारी होने से इन्द्रियजन्य ज्ञान किसी
को भी नहीं होता, जैसे—अन्धे को रूप का ज्ञान, बहिरे को शब्द-
ज्ञान इत्यादि।
प्र०—क्या सबके मन में दोष है जो मानसिक प्रत्यक्ष नहीं
होता ?
उ०—जिसके मन में मल, विक्षेप, आवरण, तीन दोष हों
उसे मानसिक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, जैसे—दर्पण से अपनी आँख
देख सकते हैं, परन्तु दर्पण के मैला तथा स्थिर न होने अथवा कोई
आवरण होने से नहीं देख सकते। जैसे गंगा में यह शक्ति है कि