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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 192 में से

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( २८ )
किन्तु आत्मा के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी प्रतीत
होती हैं ।
प्र०—क्या प्रकृति का कोई कारण नहीं है, ब्रह्म को कारण
सुना जाता है ?
उ०—ब्रह्म जगत् का निमित्त-कारण है । प्रकृति का उपादान
कारण नहीं ।
प्र०—प्रकृति को क्यों अकारण मानते हो ?
उ०—मूले मूला भावादमूलं मूलम् ॥ ६७ ॥
अर्थ—२२ तत्त्वों का मूल उपादान कारण प्रकृति है, और
मूल अर्थात् जड़ की जड़ नहीं होती, इसवास्ते मूल बिना मूल के
ही होता है ।
प्र०—प्रकृति को मूल क्यों मानते हो ?
उ०—यदि मूल का मूल मानोगे, तो उसके मूले की भी आ-
वश्यकता होगी । इस प्रकार अनवस्था आजायगी ।
प्र०—जैसे घट का कारण मृत्तिका है, और मृत्तिका का
कारण परमाणु है ?
उ०—पारम्पर्येऽप्येकत्र परिनिष्ठेति संज्ञा-
मात्रम् ॥ ६८ ॥
कारणों की परम्परा के विचार से परमाणु ही घट का कारण
है, मृत्तिका तो नाममात्र है ।
समानः प्रकृतेर्द्वयोः ॥ ६६ ॥
घट और मृत्तिका के साथ प्रकृति का समान सम्बन्ध है,
अर्थात् परम्परा से प्रकृति ही घट और मृत्तिका का कारण है,
और निरवयव होने से नित्य है, उसका कोई कारण नहीं ।