सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
जल बरसाने वाली व दुधारू गायों के समान आवाज करने वाली हैं. (३)
प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं २४ सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम्.
मर्य इव युवतिभिः समर्पति सोमः कलशे शतयामना पथा.. (४)
यह सोमरस इंद्र के पेट में पहुंचता है. मित्र की तरह सोम इंद्र को किसी भी प्रकार का
कोई कष्ट नहीं देते. युवक जैसे युवतियों के साथ घुलमिल कर रहता है, वैसे ही सोमरस जल
के साथ घुलमिल कर रहता है. वह छलनी के अनेक छेदों से छनछन कर मटके में जाता है.
(४)
धर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः.
हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजा २४ सि कृणुषे नदीष्वा.. (५)
सोमरस सब को धारण कर सकता है. यह कर्म करने वाला और देवताओं की शक्ति
बढ़ाने वाला है. यह छनछन कर घड़े में प्रवेश करता है. शक्तिशाली यजमान इस को निचोड़ते
हैं. यह शक्तिशाली घोड़े की तरह वेग से नदियों के जल में स्वयं को मिला लेता है. (५)
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः.
प्राणा सिन्धूनाँ कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः.. (६)
सोम सब की इच्छा पूरी करने वाले, विशेष कृपा दृष्टि रखने वाले, उषा और सूर्य की
शक्ति बढ़ाने वाले हैं. विद्वान् यजमान इसे छानते हैं. नदियों का जल मिला कर इसे तैयार
किया गया है. इंद्र के पेट में पहुंचने के लिए यह शब्द करता हुआ घड़े में प्रवेश करता है. (६)
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुहिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि.
चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत.. (७)
सोम श्रेष्ठ यज्ञ में निवास करने वाले हैं. इन के लिए इक्कीस गाएं नियमित रूप से शुद्ध
दूध देती हैं. चारों लोकों के जल, शुद्ध दूध होने के लिए कल्याणकारी रूप से बहते हैं. (७)
इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्रवापामीवा भवतु रक्षसा सह.
मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्त्विन्दवः.. (८)
हे सोम! भलीभांति आप का रस निकाला जाता है. आप को इंद्र के लिए तैयार किया
गया है. रोग और राक्षस आप के पास न फटकें. जो पापी लोग झूठा और सच्चा दोनों तरह
का व्यवहार करते हैं, उन पर आप की कृपा न हो. आप हमें इस यज्ञ में धन प्रदान कीजिए.
(८)
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्.
पुनानो वारमत्येष्यव्ययं २४ श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत्.. (९)
सोमरस प्रकाशमान, शक्तिवर्द्धक और हरा है. वह राजा के समान सुंदर और देखने
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योग्य है. गाय का दूध मिलाने और छानने के समय यह आवाज करता है. भेड़ों के बालों से
बनी छलनी से छान कर इसे साफ किया जाता है. यह जलमय है. श्येन पक्षी के समान यह
घड़े में स्थित रहता है. (९)
प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवो ऽ सिष्यदन्त गाव आ न धेनवः.
बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुसिया निर्णिजं धीरे.. (१०)
सोमरस मीठा है. इसे देवताओं के लिए तैयार किया जाता है. दुधारू गाएं जैसे अपने
बछड़ों के पास जाती हैं, वैसे ही सोमरस कलश में जाता है. यज्ञ मंडप में गाएं इंद्र के लिए
अपने स्तनों से टपकने वाले दूध में सोमरस धारण करती हैं. (१०)
अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतु ꣹ रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते.
सिन्धोरुच्छवासे पतयन्तमुक्षणं ꣹ हिरण्यपावाः पशुमप्सु गृभ्णते.. (११)
यजमान सोमरस में गाय के दूध को एकमेक कर के मिलाते हैं. देवतागण सोमरस का
आनंद लेते हैं. यजमान इस सोमरस में गाय का घी और शहद मिलाते हैं. नदी के जल में रहने
वाले सोम को सोने से शुद्ध कर के चमकाया जाता है. (११)
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः.
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदृहन्तः सं तदाशत.. (१२)
हे सोम! आप ज्ञान के स्वामी हैं. आप अपने पवित्र अंगों से सर्वव्यापक व सामर्थ्यवान
हैं. आप पीने वाले को बल (स्फूर्ति) देते हैं. जिस ने तप, व्रत आदि से अपने को नहीं तपाया,
उस पर आप कृपा नहीं करते. तपाने या परिपक्व होने के बाद ही उपासक यजमान पर आप
की कृपा होती है. (१२)
दसवां खंड
इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः. श्रुष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः.. (१)
सोमरस बहुत जल्दी तैयार किया गया है. यह ज्ञान की बढ़ोतरी करने वाला और हरा है.
यह शीघ्र ही इच्छा पूर्ण करने वाले शक्तिमान इंद्र के पास पहुंचे. (१)
प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्रव. द्युमन्त ꣹ शुष्ममा भर स्वर्विदम्.. (२)
हे सोम! आप उत्साह और फुर्ती देने वाले हैं. आप इंद्र के पीने के लिए इस कलश में
प्रवेश कीजिए. आप हमें प्रकाशवान और ज्ञानवान बनाइए. (२)
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत. शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये.. (३)
हे यजमानो! आप हमारे मित्र हैं. आप आइए व बैठिए. आप सोम को छानते समय की
जाने वाली स्तुति गाइए. जैसे बच्चे को आभूषणों से सजाया जाता है, वैसे ही आप हवि और
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यज्ञ के अन्य साधनों से सोम को सजाइए. (३)
तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत. शिशुं न हव्यैः स्वदयन्त गूर्तिभिः.. (४)
हे मित्र यजमानो! आप प्रसन्नता बढ़ाने के लिए सोम की स्तुति कीजिए. आप छानते
हुए सोम की स्तुति कीजिए. आप बालक को सजाने की तरह हवियों से इन्हें सजाइए. (४)
प्राणा शिशुर्महीना २४ हिन्वन्मृतस्य दीधितिम्. विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता.. (५)
सोम आदरणीय जल के पुत्र हैं. ये यज्ञ को प्रकाशित और परिपूर्ण करने वाले हैं. इन का
रस सभी हवियों में रहता है. ये स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों में रहते हैं. (५)
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा. आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः.. (६)
हे सोम! देवताओं के पीने के लिए आप जल्दी से धाराधार हो कर छनिए. आप
मदकारी हैं. आप हमारे कलश में विराजिए. (६)
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति. अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत्.. (७)
सोमरस पवित्र और छना हुआ है. छनने में आवाज करता हुआ वह भेड़ के बालों से
बनी छलनी से छनता जाता है. (७)
प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उच्यते. भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते.. (८)
पवित्र तथा कर्म करने वाले सोम के लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं. सेवक की सेवा से जैसे
हम प्रसन्न हो जाते हैं, वैसे ही विशेष प्रार्थनाओं से हम उन को प्रसन्न करें. (८)
गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्विव. शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय.. (९)
हे सोम! आप शक्तिमान हैं. रस निचोड़ने के बाद आप हमें गोधन और अश्व धन
दीजिए, फिर गाय के दूध में मिल कर आप सफेद रंग वाले हो जाइए. हम सब तरह से आप
की स्तुति करते हैं. (९)
अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत. गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि.. (१०)
हे सोम! आप धनदाता हैं. हमें धन दीजिए. हम आप की स्तुति करते हैं. हम आप के
रस को गोरस में मिलाते हैं. (१०)
पवते हर्यतो हरिरति ह्ररा २४ सि र २४ ह्रा. अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः.. (११)
हे सोम! आप मनोहर व हरे रंग के हैं. आप छनते जाइए. न छनने वाले भाग को छलनी
में रहने दीजिए. आप हम उपासकों को यशस्वी पुत्र दीजिए. (११)
परि कोशं मधुश्चुत २४ सोमः पुनानो अर्षति.
अभि वाणीर्ऋषीणा २४ सप्ता नूषत.. (१२)
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पवित्र सोमरस छनछन कर घड़े में टपकता और अपना मीठा रस द्रोणकलश में
पहुंचाता है. सात छंदों (पदों) वाली ऋषियों की वाणी सोम की स्तुति करती है. (१२)
ग्यारहवां खंड
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः. महि द्युक्षतमो मदः.. (१)
हे सोम! आप अत्यंत मधुर हैं. आप यज्ञ के बारे में सब कुछ जानने वाले हैं. आप
सर्वोत्तम, प्रकाशमान व तेजस्वी हैं. आप इंद्र को आनंद देने के लिए पवित्र होइए. (१)
अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दीदिहि देव देवयुम्. वि कोशं मध्यमं युव.. (२)
हे सोम! आप अन्न के स्वामी, प्रकाशमान, स्तुति व देवताओं के पीने (पाने) योग्य हैं.
आप हमें यश और बल दीजिए. आप द्रोणकलशों को लबालब भर दीजिए. (२)
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुर ꣳ रजस्तुरम्. वनप्रक्षमूदप्रुतम्.. (३)
हे यजमानो! सोम घोड़े जैसे वेगवान व स्तुति करने योग्य हैं. वे पानी की तरह प्रवहमान
(बहने वाले) हैं तथा प्रकाश की किरणों की तरह कहीं भी शीघ्र पहुंचने वाले हैं. आप सोमरस
को निचोड़िए और उसी में जल मिलाइए. उस के बाद उसे गो दूध से सींचिए. (३)
एतमु त्यं मदच्युत ꣳ सहस्रधारं वृषभं दिवोदुहम्. विश्वा वसूनि बिभ्रतम्.. (४)
सोमरस प्रसन्नतादायी है, कई धाराओं से द्रोणकलश में झरता है, शक्ति बढ़ाने वाला है
तथा सभी धनों का स्वामी है. विद्वान् यजमान सोमरस निचोड़ते हैं. (४)
स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इडानाम्. सोमो यः सुक्षितीनाम्.. (५)
सोम धन, दूध आदि रस व शक्ति के स्वामी हैं. ये श्रेष्ठ संतान देने वाले हैं. यजमान श्रेष्ठ
सोमरस निचोड़ते हैं. (५)
त्वं ह्या ३ ङ्ग दैव्यं पवमान जनिमानि द्युमत्तमः अमृतत्वाय घोषयन्.. (६)
हे सोम! आप पवित्र, पूजनीय व प्रकाशवान हैं. आप देवताओं के बारे में सब कुछ
जानते हैं. आप उन की अमरता की घोषणा करते हैं. आप यजमान से उन की स्तुति कराते
हैं. (६)
एष स्य धारया सुतो ऽ व्या वारेभिः पवते मदिन्तमः. क्रीळन्नूर्मिरपामिव.. (७)
सोम अत्यंत आनंददायी हैं. ये जल की लहरों की तरह खेलतेकूदते हैं. सोमरस को भेड़
के बालों से बनी छलनी से कलश में धार बना कर छाना जाता है. (७)
य उस्रिया अपि या अन्तरश्मनि निर्गा अकृन्तदोजसा.
अभि व्रजं तत्निषे गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्पवा रुज.. (८)
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सोम बादलों में जल को छिन्नभिन्न करते हैं. वे बादल फैलाने वाले और जल को धारण
करने वाले हैं. वे राक्षसों द्वारा हरे गए गायों और घोड़ों को घेर लेते हैं. वे शत्रुनाशक हैं.
कवचधारी वीर के समान सोम शत्रुओं को मार देते हैं. (८)
आरण्यक पर्व
आरण्यक पर्व
छठा अध्याय
पहला खंड
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः.
यद्धिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः.. (१)
हे इंद्र! आप वज्रपाणि (हाथ में वज्र धारण करने वाले) हैं. आप सुंदर ठुड्डी वाले हैं.
आप हमें यश और बलदायी अन्न प्रदान कीजिए. आप हमें स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों
को पुष्ट बनाने वाला धन प्रदान कीजिए. (१)
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमा विश्वरूपं यदस्य.
ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतं चिदर्वाक्.. (२)
इंद्र चराचर व पृथ्वी की सभी वस्तुओं और धनों के स्वामी हैं. वे दानदाता को सब प्रकार
का धन देते हैं. अच्छी तरह स्तुति किए जाने पर वे पर्याप्त धन देते हैं. (२)
यस्येदमा रजायुजस्तुजे जने वन ३४ स्वः. इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्.. (३)
तेजस्वी इंद्र का दान दानियों और स्वर्ग दोनों में प्रशंसनीय है. इंद्र का दान श्रेष्ठ और
संतोष देने वाला है. (३)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम ३४ श्रथाय.
अथादित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम.. (४)
हे वरुण! आप ऊपर और नीचे की ओर के बंधनों को हम से दूर कीजिए. आप हमारे
सारे बंधनों को शिथिल कीजिए. जिस से हम आप के विधिविधान के अनुसार चल कर पाप
और कष्ट रहित जीवन जी सकें. (४)
त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (५)
हे सोम! आप जग को पवित्र करने वाले हैं. आप की मदद से हम युद्ध में अपना कर्तव्य
भलीभांति निबाह सकें. अदिति, मित्र, वरुण, पृथ्वी, सिंधु देवता तथा स्वर्गलोक हमें यशस्वी
बनाने की कृपा करें. (५)
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इमं वृषणं कृणुतैकमिन्माम्.. (६)
हे देवताओ! आप इस सोम को बलवान बनाइए, ताकि वे हमारी मनोकामनाएं पूरी कर
सकें. हमें बलवान बना सकें. (६)
स न इन्द्राय यज्यवे मरुद्भ्यः वरिवोवित्परिस्रव.. (७)
हे सोम! आप धनदाता व पूजनीय हैं. आप इंद्र, मरुद्गण और वरुण के लिए धारा के
रूप में टपकिए. (७)
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (८)
सोम की कृपा से मनुष्यों के लिए चाहे गए सभी प्रकार के धन हमें प्राप्त हों. हम उन
धनों के श्रेष्ठ उपयोग की इच्छा रखते हैं. (८)
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम.
यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि.. (९)
मैं (अन्न) सभी देवताओं से पहले उत्पन्न हुआ हूं. मैं विनाशरहित हूं. जो व्यक्ति अच्छे
पात्र को मेरा दान करता है, वह सब का कल्याण करता है. जो किसी को दान नहीं करता है,
अकेला ही अन्न खाता है, उसे मैं समाप्त कर देता हूं. (९)
दूसरा खंड
त्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीषु च. परुष्णीषु रुशत्पयः.. (१)
हे इंद्र! काली, लाल और अनेक रंग वाली गायों में (सब में) आप ने एक जैसा
चमचमाता सफेद दूध स्थापित किया है. हम आप के इस आश्चर्यजनक सामर्थ्य की प्रशंसा
करते हैं. (१)
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः.
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः.. (२)
उषा के संबंधी सूर्य खास हैं. वे स्वयं प्रकाशमान और सब को प्रकाशित करने वाले हैं.
वे ही जल बरसाने वाले मेघ का रूप भी हैं. वे ही आकाश में गर्जना करते हैं. बुद्धिमान
देवताओं ने बुद्धि से इस जग को रचा. मनुष्यों को देखने वाले पितरों ने माता के पेट (गर्भ) में
इसे स्थापित किया. (२)
इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (३)
इंद्र के संकेत (इशारे) मात्र से घोड़े एक साथ रथ में जुत जाते हैं. इंद्र वज्रधारी व
आभूषणधारी हैं. (३)
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इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (४)
हे इंद्र! आप अत्यंत बलवान हैं. आप को कोई नहीं हरा सकता. आप छोटे और बड़े
सभी प्रकार के युद्धों में हमारी रक्षा कीजिए. (४)
प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्.
धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः.. (५)
वसिष्ठ के पुत्र प्रथ एवं भरद्वाज के पुत्र सप्रथ के लिए अनुष्टुप् छंद में स्तुति करते हैं. उन
के लिए श्रेष्ठ हवि समर्पित करते हैं. वसिष्ठ ऋषि ने रथंतर नामक सोम को धाता और सब को
उत्पन्न करने वाले विष्णु से प्राप्त किया. (५)
नियुत्वान्यायवा गह्यय 28 शुक्रो अयामिते. गन्तासि सुन्वतो गृहम्.. (६)
हे वायु! आप अपने वाहन से पधारिए. आप के लिए चमकता हुआ सोमरस तैयार
किया गया है. आप विधिविधान से सोमरस तैयार करने वाले यजमान के घर पधारते हैं. आप
हमारे यहां पधारिए. (६)
यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय. तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्.. (७)
हे इंद्र! आप अत्यंत वैभवशाली व अपूर्व हैं. वृत्रासुर के नाश के समय आप ने पृथ्वी को
दृढ़ और विस्तृत किया. स्वर्गलोक को भी भलीभांति स्थिर किया. आप की सामर्थ्य अद्भुत
है. (७)
तीसरा खंड
मयि वर्चो अथो यशो ऽ थो यज्ञस्य यत्पयः.
परमेष्ठी प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृ 28 हतु.. (१)
प्रजाओं का पालन करने वाले प्रजापति स्वर्गलोक में निवास करते हैं. वे हमें आत्मज्ञान
व यश देने की कृपा करें. वे हमें यज्ञ से संबंध रखने वाली उत्तम हवि और अन्न सामग्री प्रदान
करने की कृपा करें. (१)
सं ते पया 28 सि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः.
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवा 28 स्युत्तमानि धिष्व.. (२)
हे सोम! आप शत्रुनाशक हैं. आप हवि के लिए निर्धारित दुग्ध सामग्री प्राप्त कीजिए.
अमरता पाने के लिए आप स्वर्गलोक में श्रेष्ठ अन्न और श्रेष्ठ बल को प्राप्त कीजिए. (२)
त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः.
त्वमातनोर्वा ३ न्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (३)
हे सोम! आप ने पृथ्वीलोक में मौजूद सारी ओषधियों को उत्पन्न किया है. आप ने जल
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को उत्पन्न किया है. आप ने गायों को उत्पन्न किया है. आप ने आकाश को फैलाया है. आप
ने अंधकार को दूर किया है. (३)
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतार 𑖊 रत्नधातमम्.. (४)
हम यजमान संसार का कल्याण करने की इच्छा रखते हैं. हम अग्नि की स्तुति करते हैं.
वे यज्ञ में देवताओं के दूत हैं. हम यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित करते हैं. वे हमें सुख और ऐश्वर्य
प्रदान करते हैं. (४)
ते मन्वत प्रथमं नाम गोनां त्रिः सप्त परमं नाम जानन्.
ता जानतीरभ्यनूषत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्यशसा गावः.. (५)
ऋषियों ने सब से पहले यह जाना कि वाणी के शब्द पूजनीय हैं. उस के बाद उन्होंने
सात के तिगुने यानी इक्कीस छन्दों में स्तोत्र होते हैं, यह ज्ञान प्राप्त किया. उस के बाद वाणी
से उषा की स्तुति की. उस के बाद सूर्य के तेज के साथ ही प्रकाशमान अन्य स्तुतियां
(वाणियां) उत्पन्न हुईं. (५)
समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति.
तमू शुचि 𑖊 शुचयो दीदिवा 𑖊 समपात्रापातमुप यन्त्यापः.. (६)
बरसात का पानी जमीन पर गिर कर जमीन के पानी के साथ मिल जाता है. ये दोनों
पानी नदी का रूप धारण कर लेते हैं और समुद्र में मिल जाते हैं. वहां ये पानी समुद्री अग्नि
को आनंद देते हैं. इसी प्रकार सोमरस पानी में मिल कर आनंदित करता है. (६)
आ प्रागाद्भद्रा युवतिरहः केतून्त्समीर्त्सति.
अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री.. (७)
सूर्य की किरणों को समेटने वाली रात्रि रूपी स्त्री आ गई है. यह सारे संसार को आराम
देने वाली है. यह सारे संसार का कल्याण चाहने वाली है. (७)
प्रक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू महः प्र नो वचो विदथा जातवेदसे.
वैश्वानराय मतिर्नव्यसे शुचिः सोम इव पवते चारुरग्नये.. (८)
अग्नि सर्वत्र व्याप्त व प्रकाशमान हैं. हम उन की स्तुति करते हैं. हम यज्ञ में उन के लिए
स्तोत्र गाते हैं. वे सभी मनुष्यों का हित करने वाले हैं. उन के पास स्तोत्र वैसे ही जाते हैं, जैसे
यज्ञ में सोम जाते हैं. (८)
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञमुभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म.
मा वो वचा 𑖊 सि परिचक्ष्याणि वोच 𑖊 सुम्नेष्विद्धो अन्तमा मदेम.. (९)
सभी देवगण हमारे पूजनीय स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
दोनों हमारे स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें. अग्नि हमारे स्तोत्र सुनें. हम कभी भी अप्रिय और
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त्याज्य वाणी न बोलें. हम देवताओं की कृपा में रहें. उन के द्वारा दिए गए सुख से सुखी रहें.
(९)
यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती.
यशो भगस्य विन्दतु यशो मा प्रतिमुच्यताम्.
यशसा ३ स्याः स ꣳ सदो ऽ हं प्रवह्रिता स्याम्.. (१०)
हम यजमानों को स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का यश प्राप्त हो. हमें इंद्र और बृहस्पति
का यश भी प्राप्त हो. सूर्य का यश मुझे मिले. यह यश कभी हम से मुंह न मोड़े. इस सभा में
मुझे यश मिले. इस में मैं विचार व्यक्त करने की अच्छी क्षमता (देवताओं की कृपा से) पा
जाऊं. (१०)
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री.
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्.. (११)
इंद्र वज्रधारी और शक्तिशाली हैं. वे बादलों को भेद कर बरसात करने वाले हैं. उन्होंने
नदियों के तट बना कर पर्वतों से जल बहाया. मैं उन के इन अच्छे कामों का बारबार वर्णन
करता हूं. (११)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्.
त्रिधातुरर्को रजसो विमानो ऽ जसं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम्.. (१२)
मैं (आत्मा) जन्म से ही अग्नि स्वरूप हूं. सब कुछ जानने वाला हूं, प्रकाशमान हूं. मुंह
में अमरता देने वाली वाणी है. मैं प्राण, अपान, व्यान इन तीनों प्रकार का प्राण हूं, आकाश
को नापने वाला वायु हूं, प्रकाशमान सूर्य हूं, सभी की हवि हूं. (१२)
पात्यग्निर्विपो अग्रं पदं वेः पाति यह्वश्चरण ꣳ सूर्यस्य.
पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपमादमृष्वः.. (१३)
अग्नि देव सर्वव्यापक हैं. वे पृथ्वी के मुख्य स्थानों की रक्षा करते हैं. वे महान हैं. वे सूर्य
के मार्ग व अंतरिक्ष की रक्षा करते हैं. वे अंतरिक्षलोक में मरुद्गणों व देवताओं को प्रिय लगने
वाले यज्ञ की रक्षा करते हैं. वे सुंदर तथा दर्शनीय हैं. (१३)
चौथा खंड
भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि.
स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशे ऽ दाः.. (१)
हे अग्नि! आप चमचमाते हैं. आप का मुख प्रकाशित है. उस मुख में जीभ अग्नि की
ज्वाला में डाली गई हवि खाती है. आप धन देने वाले हैं. आप अन्न व रमणीय धन दीजिए.
(१)
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वसन्त इन्तु रन्त्यो ग्रीष्म इन्तु रन्त्यः.
वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्तु रन्त्यः.. (२)
वसंत ऋतु लुभावनी है. ग्रीष्म ऋतु लुभावनी है. वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतुएं
भी लुभावनी हैं. (२)
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.
स भूमि ꣳ सर्वतो वृत्वार्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. (३)
पूर्ण पुरुष हजारों सिरों वाला है. वह हजारों आंखों वाला है, हजारों पैरों वाला है. वह
सारे ब्रह्मांड को घेर सकने में समर्थ है. फिर भी वह बाकी रहता है. (३)
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादो ऽ स्येहाभवत्पुनः.
तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि.. (४)
पूर्ण पुरुष तीन पैरों वाला है. वह ऊंचे स्थान पर वास करता है. इस पूर्ण पुरुष से ही
सारा संसार पैदा होता है. चेतन और अचेतन सभी में इसी पूर्ण पुरुष का विस्तार है. यह
विविध स्वरूपों वाला है. यह सर्वत्र व्याप्त है. (४)
पुरुष एवेद ꣳ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्.
पादो ऽ स्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (५)
भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों का कर्ता पूर्ण पुरुष ही है. इस के तीन पैर अमर
स्वर्गलोक में हैं. इस के शेष चौथे चरण में सारे प्राणी हैं. (५)
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँ श्च पूरुषः. उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. (६)
पूर्ण पुरुष जड़चेतन और समस्त पृथ्वी से भी विस्तृत (बड़ा) है. वह अमरता का स्वामी
है. अन्न से बढ़ने वाले प्राणियों का भी स्वामी है. (६)
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः.
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः.. (७)
उस पुरुष से विराट् (ब्रह्मांड) पुरुष उत्पन्न हुआ. उस से अन्य पुरुष उत्पन्न हुए. उस के
बाद उस ने पशुपक्षियों और अन्य जीवों को उत्पन्न किया. (७)
मन्ये वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ ये अप्रथेथाममितमभि योजनम्.
द्यावापृथिवी भवत ꣳ स्योने ते नो मुञ्चतम ꣳ हसः.. (८)
हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक! आप हमारे पालनहार हैं. हम आप को इसी रूप में
जानते हैं. आप हमारा अपार वैभव बढ़ाइए. हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के देवता! आप हमें
सुख दीजिए. आप हमें पापों से दूर कीजिए. (८)
हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरितौ हरी.
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तं त्वा स्तुवन्ति कवयः परुषासो वनर्गवः.. (९)
हे इंद्र! आप की दाढ़ीमूंछें हरी हैं. आप के घोड़े भी हरे हैं. आप श्रेष्ठ गोपालक हैं.
विद्वान् कविजन आप की स्तुति करते हैं. (९)
यद्वर्चो हिरण्यस्य यद्वा वर्चो गवामुत.
सत्यस्य ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा स ॐ सृजामसि.. (१०)
स्वर्ण, गाय और सत्यज्ञान में जो तेजस्विता है, हम उस तेजस्विता को अपने में धारण
करना (पाना) चाहते हैं. (१०)
सहस्तन्न इन्द्र दद्ध्वयोज ईशे ह्यस्य महतो विरप्शिन्.
ऋतुं न नृम्ण ॐ स्थविरं च वाजं वृत्रेषु शत्रून्तसहना कृधी नः.. (११)
हे इंद्र! आप शत्रु का नाश करने वाले हैं. आप हमें बल प्रदान कीजिए क्योंकि आप
महान बल के स्वामी हैं. आप हमारे यज्ञ की स्थिति जैसा धन और सामर्थ्य हमें दीजिए. आप
हमें ऐसी शक्ति दीजिए, जिस से हम संग्रामों में अपने दुश्मनों को हरा सकें. (११)
सहर्षभाः सहवत्सा उदेत विश्वा रूपाणि बिभ्रतीद्वर्यूध्नीः.
उरुः पृथुर्यं वो अस्तु लोक इमा आपः सुप्रपाणा इह स्त.. (१२)
कई रंगों वाली, बड़ेबड़े थनों (स्तनों) वाली गौएं, बछड़ों और बैलों के साथ हमें प्राप्त
हों. यह पृथ्वीलोक महान व विशाल है. यह आप के निवास योग्य है. आप को यहां सुख से
पीने योग्य जल प्राप्त हो. (१२)
पांचवां खंड
अग्न आयू ॐ षि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१)
हे अग्नि! आप हमारे अन्नों की आयु बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप हमारी आयु
बढ़ाइए. हमारे बल की आयु बढ़ाइए. आप दुष्टों को हम से दूर कीजिए. (१)
विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्.
वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा वि राजति.. (२)
सूर्य बहुत प्रकाशमान हैं. वे खूब सोमरस पीएं. वे यजमानों को निष्कंटक रखें. उन्हें
दीर्घायु करें. वायु सूर्य की किरणों को दूरदूर तक पहुंचाते हैं. उन से वे प्रजा का पालन करते
हैं. अनेक प्रकार से प्रकाशित होने में समर्थ होते हैं. (२)
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (३)
सूर्य देवताओं के दिव्य तेज का समूह हैं. वे मित्र, वरुण तथा अग्नि के नेत्र हैं. सूर्य के
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उगते ही स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक आदि सभी उन के प्रकाश से जगमगा जाते
हैं. (३)
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४)
सूर्य गतिशील व तेजस्वी हैं. वे उदित हो कर ऊपर स्थित हो जाते हैं. सब से पहले वे
पृथ्वीलोक (माता), फिर स्वर्गलोक (पिता) फिर अंतरिक्षलोक को प्राप्त होते हैं. (४)
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (५)
सूर्य का प्रकाश अपनी किरणों से आकाश में घूमता है. सूर्य के उगने पर ये किरणें
दिखती हैं और अस्त होने पर गायब हो जाती हैं. सूर्य अंतरिक्षलोक को विशेष रूप से
प्रकाशित करते हैं. (५)
त्रि ꣳ शद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (६)
दिन की तीस घड़ियों तक सूर्य अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं. इन सूर्य के लिए हर
एक मुख वेदवाणी उचारता है (स्तुति करता है). (६)
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (७)
दिन में जैसे चोर छिप जाते हैं, वैसे ही सूर्य के उगने पर ग्रह, नक्षत्र, तारागण आदि छिप
जाते हैं. (७)
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (८)
जैसे हम जलती हुई अग्नि की ज्वाला देख सकते हैं, वैसे ही सूर्य की प्रकाशित किरणों
को हम देख सकते हैं. वे सब को देख सकती हैं. (८)
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमाभासि रोचनम्.. (९)
हे सूर्य! आप सब को पार लगाने वाले हैं. आप सारे संसार को देख सकते हैं. आप सब
को प्रकाशित कर सकते हैं. चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि को आप ही चमकाते हैं. (९)
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्व ꣳ स्वर्द्दशे.. (१०)
हे सूर्य! आप मरुद्गणों के देखते हुए उन के सामने उदित होते हैं. आप मनुष्यों के
देखते हुए उदित होते हैं. आप सभी के देखते हुए यानी सब के सामने प्रकट होते हैं. (१०)
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (११)
हे सूर्य! आप सभी को पवित्र व प्रकाशित करने वाले हैं. आप जिस प्रकाश से सब को
प्रकाशित करते हैं हम उस की उपासना करते हैं. (११)
उद्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (१२)
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हे सूर्य! आप देहधारियों को प्रकाशित करते हैं. आप दिन को रात्रि से नापते हैं. आप
स्वर्गलोक और अंतरिक्षलोक को भी अपने प्रकाश से प्रकाशित कर देते हैं. (१२)
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्र्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (१३)
सूर्य ने रथ में घोड़े जोत रखे हैं. वे सातों घोड़े शुद्धकारी हैं. किरण रूपी घोड़ों से सूर्य
सर्वत्र जाते हैं. (१३)
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षण.. (१४)
हे सूर्य! आप प्रकाशित करने वाले हैं. सात किरण रूपी घोड़े आप के रथ को ले जाते
हैं. ये किरणें शुद्ध करने वाली हैं. (१४)
पहला अध्याय
उत्तरार्चिक
पहला अध्याय
पहला खंड
उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते.. (१)
हे यजमानो! आप देवताओं के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. आप छान कर साफ किए गए
सोमरस की स्तुति कीजिए. (१)
अभि ते मधुना पयो ऽ थर्वाणो अशिश्रयुः. देवं देवाय देवयु.. (२)
सोमरस दिव्य है. यह देवताओं को प्रिय है. इसे देवताओं ने देवताओं के लिए खोजा है.
अथर्वा ऋषियों ने गाय का दूध मिला कर इसे यजमान के लिए तैयार किया है. (२)
स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते. शं राजन्नोषधीभ्यः.. (३)
हे सोम! आप हितकारी हैं. आप हमारी गौओं को सुख दीजिए. आप हमारे पुत्रपौत्रों
(आने वाली पीढ़ियों) व घोड़ों को सुख दीजिए. आप ओषधियों को हमारे लिए कल्याणकारी
बनाइए. (३)
दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या कृपा. सोमाः शुक्रा गवाशिरः.. (४)
सोमरस बहुत चमकीला है. इस की धारा सब ओर टपकती हुई आवाज करती है. साफ
निथारे हुए सोमरस को गाय के दूध में मिलाया जाता है. (४)
हिन्वानो हेतुभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत्. सीदन्तो वनुषो यथा.. (५)
जैसे युद्धों में शूरवीर की प्रशंसा होती है व उसे प्रतिष्ठा मिलती है, वैसे ही यज्ञ में
सोमरस की यजमान प्रशंसा करते हैं व यज्ञ भूमि में सोम को प्रतिष्ठा मिलती है. (५)
ऋध्वक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे. पवस्व सूर्यो दृशे.. (६)
हे सोम! आप बुद्धिमान व परमवीर हैं. आप सूर्य की भांति ऊपर चढ़ दिव्य प्रकाशमय
हो कर सब का कल्याण कीजिए. (६)
पवमानस्य ते कवे वाजिन्सर्गा असृक्षत. अर्वन्तो न श्रवस्यवः.. (७)
हे सोम! आप शक्तिवर्धक हैं. छानते समय आप की धार ऐसी गतिशील होती है, जैसे
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अस्तबल से निकलते समय घोड़े गतिशील होते हैं। (७)
अच्छा कोशं मधुश्रुतमसृग्रं वारे अव्यये. अवावशन्त धीतयः.. (८)
मधुर रस से भरे द्रोणकलश में भेड़ के बालों से बनी छलनी से यजमान सोमरस को
छानछान कर तैयार करते हैं. यजमान की अंगुलियां बारबार उस सोमरस को शुद्ध करना
चाहती हैं. (८)
अच्छा समुद्रमिन्दवो ऽ स्तं गावो न धेनवः. अग्मन्नृतस्य योनिमा.. (९)
मनुष्यों को अपने दूध से तृप्त करने वाली दुधारू गाएं जैसे अपने बाड़े में जाती हैं, वैसे
ही छान कर घड़े में भरे हुए सोम यज्ञ स्थल में जाते हैं. (९)
दूसरा खंड
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१)
हे अग्नि! हम आप की स्तुति करते हैं. देवताओं को हवि पहुंचाने के लिए हम आप का
आह्वान करते हैं. आप यज्ञ में कुश के आसन पर विराजिए. (१)
तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (२)
हे अग्नि! आप सुंदर व तरुण (युवा) हैं. हम समिधा और घी से आप को प्रज्वलित
करते हैं. आप प्रज्वलित होइए. (२)
स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (३)
हे अग्नि! आप हमें यश और यशदायी क्षमता दोनों ही प्रदान कीजिए. लोग उस यश के
बारे में सुनने (जानने) के लिए इच्छुक रहें. (३)
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ⁑ सि सुक्रतू.. (४)
हे मित्र और वरुण! आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं. आप हमारे गौ स्थानों को घी, दूध से
सींचने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए परलोक के निवास स्थानों को भी श्रेष्ठ, मधुर रसों
से सींचने की कृपा कीजिए. (४)
उरुश ⁑ सा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः. द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता.. (५)
हे मित्रावरुण! आप पवित्र कार्य करने वाले हैं. आप अनेक लोगों से प्रशंसित हैं. हवि के
अन्न से आप बढ़ते हैं. आप अपनी शक्ति से सुशोभित होते हैं. (५)
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्. पात ⁑ सोममृतावृधा.. (६)
हे मित्रावरुण! जमदग्नि ऋषि आप की स्तुति करते हैं. आप यज्ञ स्थान में पधारिए,
विराजिए. आप हमारे द्वारा तैयार किए गए सोमरस को ग्रहण कीजिए. आप हमारे यज्ञ के
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कर्मफल को बढ़ाने की कृपा कीजिए. (६)
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (७)
हे इंद्र! आप हमारे यज्ञ में पधारिए. हम ने आप के लिए स्वच्छ सोमरस तैयार किया है.
आप इस सोमरस को पीजिए. आप इस कुश के आसन पर विराजमान होइए. (७)
आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (८)
हे इंद्र! आप के केश वाले मनोहर घोड़े मंत्र सुनते ही वाहन में जुत जाते हैं. आप के
घोड़े आप को यज्ञ में लाने का कष्ट करें. आप हमारे पास यज्ञ में पधार कर भलीभांति हमारी
प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (८)
ब्रह्माणस्त्वा युजा वय १४ सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (९)
हे इंद्र! यजमान सोमयज्ञ (कर्ता) करने वाले हैं. सोमरस तैयार करने वाले यजमान
ब्राह्मण हैं. हम आप के योग्य प्रार्थनाओं से सोमरस पीने वाले आप को आमंत्रित करते हैं.
(९)
इन्द्राग्नी आ गत १४ सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्य पातं धियेषिता.. (१०)
हे अग्नि! हे इंद्र! सोमरस को हम ने अपनी स्तुतियों से पवित्र बनाया है. सोम स्वर्ग से
आए हैं. इन्होंने हमारे भक्ति भाव को स्वीकार किया है. आप इस सोमरस को स्वीकार करने
की कृपा कीजिए. (१०)
इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः. अया पातमम १४ सुतम्.. (११)
हे अग्नि! हे इंद्र! आप यजमान पर कृपा कीजिए. आप उन की मदद कीजिए. सोमरस
चेतनादायी है. उस से हम यज्ञ करते हैं. आप उस सोमरस को ग्रहण करने की कृपा कीजिए.
(११)
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे. ता सोमस्येह तृम्पताम्.. (१२)
हे अग्नि! हे इंद्र! सोम यज्ञ के प्रमुख साधन हैं. हम उन की प्रेरणा से प्रेरित होते हैं. आप
दोनों देवता यजमान के लिए उपयुक्त फलदाता हैं. आप सोमरस पी कर तृप्त होइए और हमें
यज्ञफल प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१२)
तीसरा खंड
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे. उग्र १४ शर्म महि श्रवः.. (१)
हे सोम! स्वर्गलोक में आप ने जन्म पाया है. आप शक्तिवर्द्धक, सुखदायी व यशदायी
हैं. यजमान भूमिलोक पर अन्न के रूप में आप को प्राप्त करते हैं. (१)
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स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः. वरिवोवित्परि स्रव.. (२)
हे सोम! आप धनदाता हैं. आप इंद्र, वरुण और मरुद्गण के लिए प्रवाहित होने की
कृपा कीजिए. (२)
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (३)
हे सोम! आप की कृपा से हम ने मनुष्य को प्राप्त होने योग्य सब सुख (वैभव) पाया है.
फिर भी हम सेवा भावना से आप की स्तुति करते हैं. (३)
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि.
आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः.. (४)
हे सोम! आप सोने की तरह चमकते हैं. आप यज्ञ स्थान में विराजिए. पानी मिला कर
छाने जाने पर धारा रूप में आप कलश में पधारते हैं. आप धन देने वाले हैं. (४)
दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्न ँ सधस्थमासदत्.
आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यर्षसि नृभिर्धौतो विचक्षणः.. (५)
यजमानों ने सोमरस छाना है. यह मधुर और आनंददायी है. यह अपने प्राचीन स्थान पर
पहुंचता है. हे सोम! आप खास निरीक्षण करने वाले हैं. जो यजमान अच्छा यज्ञ करने की
भावना रखते हैं, आप उस यजमान पर अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं. (५)
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष.
अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्ता ऽ च्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति.. (६)
हे सोम! आप जल्दी हमारे यज्ञ में पधारिए. आप जल्दी कलश में स्थापित हो जाइए.
यजमान आप को छानते हैं. छन कर आप हवि के रूप में हवि अन्न को प्राप्त कीजिए.
शक्तिमान घोड़ों को शुद्ध करने की तरह यजमान आप को शुद्ध करते हैं. लगाम पकड़ कर
घोड़े को जैसे ले जाया जाता है, वैसे ही अंगुलियों से यजमान आप को यज्ञ स्थान तक ले
जाते हैं. (६)
स्वायुधः पवते देव इन्दुश्स्तिहा वृजना रक्षमाणः.
पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः.. (७)
हे सोम! आप उत्तम कोटि के अस्त्रशस्त्र वाले शत्रुनाशक, संरक्षक, उपद्रव दूर करने
वाले, पालक, संरक्षक, देवताओं को उत्पन्न करने वाले हैं तथा पृथ्वीलोक को धारण करते हैं.
आप स्वर्गलोक को विशेष आधार देते हैं. ऐसा दिव्य सोमरस यजमान छानते हैं. (७)
ऋषिर्विप्रः पुर एता जनानामभूर्धिर उशना काव्येन.
स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यां ३ गुह्यं नाम गोनाम्.. (८)
उशना ऋषि विद्वान्, परमज्ञानी, वैदिक कर्मकांड में दक्ष, धीर, प्रकाशमान और नेतृत्व
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करने वाले हैं. उन्हीं उशना ऋषि ने स्तोत्रों के माध्यम से गायों में गुप्त रूप से रहने वाले सोम
रस को मेहनत से प्राप्त किया. (८)
चौथा खंड
अभि त्वा शूर नोनुमो ऽ दुग्धा इव धेनवः.
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः.. (१)
हे इंद्र! आप शक्तिमान, सर्वज्ञाता व जगत् के स्वामी हैं. जैसे बिना दुही हुई गाएं रंभाती
हुई अपने बछड़ों की ओर भागती हैं, वैसे ही हम आप के दर्शन और कृपा के लिए लालायित
हैं. (१)
न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते.
अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (२)
हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप जैसा न कोई स्वर्गलोक और न इस पृथ्वीलोक में हुआ है
और न होगा. हम गोधन व धनधान्य के लिए आप की स्तुति करते हैं. (२)
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (३)
इंद्र सदैव बढ़ने वाले हैं. वे विलक्षण, अत्यंत शक्तिमान व हमारे सखा हैं. हम किस बुद्धि
और किन संतुष्टिदायी पदार्थों से आप की उपासना करें? किनकिन शक्तियों से आप हमारे
सहयोगी होंगे? (३)
कस्त्वा सत्यो मदानां म ॐ हिष्ठो मत्सदन्धसः. दृढा चिदारुजे वसु.. (४)
सोम आदरणीय व सत्यनिष्ठों के लिए आनंददायी हैं. उन्हें आनंद देने में वे सब से आगे
हैं. सोम बलवान शत्रुओं के धन को नष्ट करने के लिए इंद्र को उत्साह और सामर्थ्य प्रदान
करते हैं. (४)
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतये.. (५)
हे इंद्र! आप हमारे मित्र व यजमानों के संरक्षक हैं. आप हमारी सैकड़ों प्रकार से रक्षा
करने के लिए अच्छी तैयारी कर लीजिए. (५)
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः.
अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (६)
गोशाला में गाएं जैसे बछड़ों के लिए लालायित हो कर रंभाती हैं, वैसे ही हम इंद्र की
स्तुति के लिए लालायित हो कर प्रार्थना करते हैं. वे शत्रुओं से रक्षा करते हैं. वे प्रकाशमान व
सोमरस से संतुष्ट होने वाले हैं. (६)
द्युक्ष ॐ सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरु भोजसम्.
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क्षुमन्तं वाज २४ शतिन २४ सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (७)
हे इंद्र! आप स्वर्गलोकवासी हैं. आप उत्तम दान के दाता, बहुत क्षमतावान व पालनहार
हैं. हम सैकड़ोंहजारों की संख्या में गोधन आप से चाहते हैं. हम प्रचुर अन्न, धन आप से
चाहते हैं. (७)
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्र २४ सबाध ऊतये.
बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्.. (८)
बच्चे अपनी सहायता के लिए जैसे अपने भरणपोषण करने वालों को पुकारते हैं, वैसे
ही हम यजमान अपनी सहायता के लिए इंद्र को पुकारते हैं. इंद्र वेगवान घोड़ों वाले व
वैभवशाली हैं. हे याजको! आप सोमयज्ञ में अपनी रक्षा के लिए बृहत्साम का गायन करते
हुए उन की उपासना कीजिए. (८)
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदेषु शिप्रमन्धसः.
आदृ्त्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्.. (९)
इंद्र सुंदर ठुड्डी वाले हैं. शक्तिशाली राक्षस व मरणधर्मा मनुष्य (कितने ही शक्तिशाली
हों) भी उन्हें नहीं हरा सकते. वे सोमरस के आनंद में सोम यज्ञ करने वालों को प्रचुर यशदायी
धन देते हैं. हम मन से उन की स्तुति करते हैं. (९)
पांचवां खंड
स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (१)
इंद्र के पीने के लिए स्वादिष्ट और मीठा सोमरस तैयार किया गया है. वह सोमरस
अपनी पूर्ण मददायी धाराओं से इंद्र के लिए झरे. (१)
रक्षोहा विश्वचर्षणििरभि योनिमयोहत. द्रोणे सधस्थमासदत्.. (२)
सोम राक्षसनाशक हैं. जगद्रष्टा हैं. वे सोने के द्रोणकलश में विराजमान हो कर यज्ञस्थल
में प्रतिष्ठित हो गए. (२)
वरिवोधातमो भुवो म २४ हिष्ठो वृत्रहन्तमः. पर्षि राधो मघोनाम्.. (३)
हे सोम! आप धनदाता हैं. आप शत्रुओं के प्रबल नाशक हैं. आप धनवान शत्रुओं के
पास मौजूद रहने वाले धन हमें प्रदान कीजिए. (३)
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम ऋतुवित्तमो मदः. महि द्युक्षतमो मदः.. (४)
हे सोम! आप अत्यंत मधुर हैं. आप यजमान को कर्मों का फल देते हैं. आप प्रकाशमान
व तृप्तिदायी हैं. आप इंद्र के लिए पात्र में छन कर तैयार हो जाइए. (४)
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