सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पहला अध्याय
उत्तरार्चिक
पहला अध्याय
पहला खंड
उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते.. (१)
हे यजमानो! आप देवताओं के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. आप छान कर साफ किए गए
सोमरस की स्तुति कीजिए. (१)
अभि ते मधुना पयो ऽ थर्वाणो अशिश्रयुः. देवं देवाय देवयु.. (२)
सोमरस दिव्य है. यह देवताओं को प्रिय है. इसे देवताओं ने देवताओं के लिए खोजा है.
अथर्वा ऋषियों ने गाय का दूध मिला कर इसे यजमान के लिए तैयार किया है. (२)
स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते. शं राजन्नोषधीभ्यः.. (३)
हे सोम! आप हितकारी हैं. आप हमारी गौओं को सुख दीजिए. आप हमारे पुत्रपौत्रों
(आने वाली पीढ़ियों) व घोड़ों को सुख दीजिए. आप ओषधियों को हमारे लिए कल्याणकारी
बनाइए. (३)
दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या कृपा. सोमाः शुक्रा गवाशिरः.. (४)
सोमरस बहुत चमकीला है. इस की धारा सब ओर टपकती हुई आवाज करती है. साफ
निथारे हुए सोमरस को गाय के दूध में मिलाया जाता है. (४)
हिन्वानो हेतुभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत्. सीदन्तो वनुषो यथा.. (५)
जैसे युद्धों में शूरवीर की प्रशंसा होती है व उसे प्रतिष्ठा मिलती है, वैसे ही यज्ञ में
सोमरस की यजमान प्रशंसा करते हैं व यज्ञ भूमि में सोम को प्रतिष्ठा मिलती है. (५)
ऋध्वक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे. पवस्व सूर्यो दृशे.. (६)
हे सोम! आप बुद्धिमान व परमवीर हैं. आप सूर्य की भांति ऊपर चढ़ दिव्य प्रकाशमय
हो कर सब का कल्याण कीजिए. (६)
पवमानस्य ते कवे वाजिन्सर्गा असृक्षत. अर्वन्तो न श्रवस्यवः.. (७)
हे सोम! आप शक्तिवर्धक हैं. छानते समय आप की धार ऐसी गतिशील होती है, जैसे
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अस्तबल से निकलते समय घोड़े गतिशील होते हैं। (७)
अच्छा कोशं मधुश्रुतमसृग्रं वारे अव्यये. अवावशन्त धीतयः.. (८)
मधुर रस से भरे द्रोणकलश में भेड़ के बालों से बनी छलनी से यजमान सोमरस को
छानछान कर तैयार करते हैं. यजमान की अंगुलियां बारबार उस सोमरस को शुद्ध करना
चाहती हैं. (८)
अच्छा समुद्रमिन्दवो ऽ स्तं गावो न धेनवः. अग्मन्नृतस्य योनिमा.. (९)
मनुष्यों को अपने दूध से तृप्त करने वाली दुधारू गाएं जैसे अपने बाड़े में जाती हैं, वैसे
ही छान कर घड़े में भरे हुए सोम यज्ञ स्थल में जाते हैं. (९)
दूसरा खंड
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१)
हे अग्नि! हम आप की स्तुति करते हैं. देवताओं को हवि पहुंचाने के लिए हम आप का
आह्वान करते हैं. आप यज्ञ में कुश के आसन पर विराजिए. (१)
तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (२)
हे अग्नि! आप सुंदर व तरुण (युवा) हैं. हम समिधा और घी से आप को प्रज्वलित
करते हैं. आप प्रज्वलित होइए. (२)
स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (३)
हे अग्नि! आप हमें यश और यशदायी क्षमता दोनों ही प्रदान कीजिए. लोग उस यश के
बारे में सुनने (जानने) के लिए इच्छुक रहें. (३)
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ⁑ सि सुक्रतू.. (४)
हे मित्र और वरुण! आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं. आप हमारे गौ स्थानों को घी, दूध से
सींचने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए परलोक के निवास स्थानों को भी श्रेष्ठ, मधुर रसों
से सींचने की कृपा कीजिए. (४)
उरुश ⁑ सा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः. द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता.. (५)
हे मित्रावरुण! आप पवित्र कार्य करने वाले हैं. आप अनेक लोगों से प्रशंसित हैं. हवि के
अन्न से आप बढ़ते हैं. आप अपनी शक्ति से सुशोभित होते हैं. (५)
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्. पात ⁑ सोममृतावृधा.. (६)
हे मित्रावरुण! जमदग्नि ऋषि आप की स्तुति करते हैं. आप यज्ञ स्थान में पधारिए,
विराजिए. आप हमारे द्वारा तैयार किए गए सोमरस को ग्रहण कीजिए. आप हमारे यज्ञ के
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कर्मफल को बढ़ाने की कृपा कीजिए. (६)
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (७)
हे इंद्र! आप हमारे यज्ञ में पधारिए. हम ने आप के लिए स्वच्छ सोमरस तैयार किया है.
आप इस सोमरस को पीजिए. आप इस कुश के आसन पर विराजमान होइए. (७)
आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (८)
हे इंद्र! आप के केश वाले मनोहर घोड़े मंत्र सुनते ही वाहन में जुत जाते हैं. आप के
घोड़े आप को यज्ञ में लाने का कष्ट करें. आप हमारे पास यज्ञ में पधार कर भलीभांति हमारी
प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (८)
ब्रह्माणस्त्वा युजा वय १४ सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (९)
हे इंद्र! यजमान सोमयज्ञ (कर्ता) करने वाले हैं. सोमरस तैयार करने वाले यजमान
ब्राह्मण हैं. हम आप के योग्य प्रार्थनाओं से सोमरस पीने वाले आप को आमंत्रित करते हैं.
(९)
इन्द्राग्नी आ गत १४ सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्य पातं धियेषिता.. (१०)
हे अग्नि! हे इंद्र! सोमरस को हम ने अपनी स्तुतियों से पवित्र बनाया है. सोम स्वर्ग से
आए हैं. इन्होंने हमारे भक्ति भाव को स्वीकार किया है. आप इस सोमरस को स्वीकार करने
की कृपा कीजिए. (१०)
इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः. अया पातमम १४ सुतम्.. (११)
हे अग्नि! हे इंद्र! आप यजमान पर कृपा कीजिए. आप उन की मदद कीजिए. सोमरस
चेतनादायी है. उस से हम यज्ञ करते हैं. आप उस सोमरस को ग्रहण करने की कृपा कीजिए.
(११)
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे. ता सोमस्येह तृम्पताम्.. (१२)
हे अग्नि! हे इंद्र! सोम यज्ञ के प्रमुख साधन हैं. हम उन की प्रेरणा से प्रेरित होते हैं. आप
दोनों देवता यजमान के लिए उपयुक्त फलदाता हैं. आप सोमरस पी कर तृप्त होइए और हमें
यज्ञफल प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१२)
तीसरा खंड
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे. उग्र १४ शर्म महि श्रवः.. (१)
हे सोम! स्वर्गलोक में आप ने जन्म पाया है. आप शक्तिवर्द्धक, सुखदायी व यशदायी
हैं. यजमान भूमिलोक पर अन्न के रूप में आप को प्राप्त करते हैं. (१)
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स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः. वरिवोवित्परि स्रव.. (२)
हे सोम! आप धनदाता हैं. आप इंद्र, वरुण और मरुद्गण के लिए प्रवाहित होने की
कृपा कीजिए. (२)
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (३)
हे सोम! आप की कृपा से हम ने मनुष्य को प्राप्त होने योग्य सब सुख (वैभव) पाया है.
फिर भी हम सेवा भावना से आप की स्तुति करते हैं. (३)
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि.
आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः.. (४)
हे सोम! आप सोने की तरह चमकते हैं. आप यज्ञ स्थान में विराजिए. पानी मिला कर
छाने जाने पर धारा रूप में आप कलश में पधारते हैं. आप धन देने वाले हैं. (४)
दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्न ँ सधस्थमासदत्.
आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यर्षसि नृभिर्धौतो विचक्षणः.. (५)
यजमानों ने सोमरस छाना है. यह मधुर और आनंददायी है. यह अपने प्राचीन स्थान पर
पहुंचता है. हे सोम! आप खास निरीक्षण करने वाले हैं. जो यजमान अच्छा यज्ञ करने की
भावना रखते हैं, आप उस यजमान पर अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं. (५)
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष.
अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्ता ऽ च्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति.. (६)
हे सोम! आप जल्दी हमारे यज्ञ में पधारिए. आप जल्दी कलश में स्थापित हो जाइए.
यजमान आप को छानते हैं. छन कर आप हवि के रूप में हवि अन्न को प्राप्त कीजिए.
शक्तिमान घोड़ों को शुद्ध करने की तरह यजमान आप को शुद्ध करते हैं. लगाम पकड़ कर
घोड़े को जैसे ले जाया जाता है, वैसे ही अंगुलियों से यजमान आप को यज्ञ स्थान तक ले
जाते हैं. (६)
स्वायुधः पवते देव इन्दुश्स्तिहा वृजना रक्षमाणः.
पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः.. (७)
हे सोम! आप उत्तम कोटि के अस्त्रशस्त्र वाले शत्रुनाशक, संरक्षक, उपद्रव दूर करने
वाले, पालक, संरक्षक, देवताओं को उत्पन्न करने वाले हैं तथा पृथ्वीलोक को धारण करते हैं.
आप स्वर्गलोक को विशेष आधार देते हैं. ऐसा दिव्य सोमरस यजमान छानते हैं. (७)
ऋषिर्विप्रः पुर एता जनानामभूर्धिर उशना काव्येन.
स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यां ३ गुह्यं नाम गोनाम्.. (८)
उशना ऋषि विद्वान्, परमज्ञानी, वैदिक कर्मकांड में दक्ष, धीर, प्रकाशमान और नेतृत्व
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करने वाले हैं. उन्हीं उशना ऋषि ने स्तोत्रों के माध्यम से गायों में गुप्त रूप से रहने वाले सोम
रस को मेहनत से प्राप्त किया. (८)
चौथा खंड
अभि त्वा शूर नोनुमो ऽ दुग्धा इव धेनवः.
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः.. (१)
हे इंद्र! आप शक्तिमान, सर्वज्ञाता व जगत् के स्वामी हैं. जैसे बिना दुही हुई गाएं रंभाती
हुई अपने बछड़ों की ओर भागती हैं, वैसे ही हम आप के दर्शन और कृपा के लिए लालायित
हैं. (१)
न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते.
अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (२)
हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप जैसा न कोई स्वर्गलोक और न इस पृथ्वीलोक में हुआ है
और न होगा. हम गोधन व धनधान्य के लिए आप की स्तुति करते हैं. (२)
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (३)
इंद्र सदैव बढ़ने वाले हैं. वे विलक्षण, अत्यंत शक्तिमान व हमारे सखा हैं. हम किस बुद्धि
और किन संतुष्टिदायी पदार्थों से आप की उपासना करें? किनकिन शक्तियों से आप हमारे
सहयोगी होंगे? (३)
कस्त्वा सत्यो मदानां म ॐ हिष्ठो मत्सदन्धसः. दृढा चिदारुजे वसु.. (४)
सोम आदरणीय व सत्यनिष्ठों के लिए आनंददायी हैं. उन्हें आनंद देने में वे सब से आगे
हैं. सोम बलवान शत्रुओं के धन को नष्ट करने के लिए इंद्र को उत्साह और सामर्थ्य प्रदान
करते हैं. (४)
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतये.. (५)
हे इंद्र! आप हमारे मित्र व यजमानों के संरक्षक हैं. आप हमारी सैकड़ों प्रकार से रक्षा
करने के लिए अच्छी तैयारी कर लीजिए. (५)
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः.
अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (६)
गोशाला में गाएं जैसे बछड़ों के लिए लालायित हो कर रंभाती हैं, वैसे ही हम इंद्र की
स्तुति के लिए लालायित हो कर प्रार्थना करते हैं. वे शत्रुओं से रक्षा करते हैं. वे प्रकाशमान व
सोमरस से संतुष्ट होने वाले हैं. (६)
द्युक्ष ॐ सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरु भोजसम्.
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क्षुमन्तं वाज २४ शतिन २४ सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (७)
हे इंद्र! आप स्वर्गलोकवासी हैं. आप उत्तम दान के दाता, बहुत क्षमतावान व पालनहार
हैं. हम सैकड़ोंहजारों की संख्या में गोधन आप से चाहते हैं. हम प्रचुर अन्न, धन आप से
चाहते हैं. (७)
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्र २४ सबाध ऊतये.
बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्.. (८)
बच्चे अपनी सहायता के लिए जैसे अपने भरणपोषण करने वालों को पुकारते हैं, वैसे
ही हम यजमान अपनी सहायता के लिए इंद्र को पुकारते हैं. इंद्र वेगवान घोड़ों वाले व
वैभवशाली हैं. हे याजको! आप सोमयज्ञ में अपनी रक्षा के लिए बृहत्साम का गायन करते
हुए उन की उपासना कीजिए. (८)
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदेषु शिप्रमन्धसः.
आदृ्त्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्.. (९)
इंद्र सुंदर ठुड्डी वाले हैं. शक्तिशाली राक्षस व मरणधर्मा मनुष्य (कितने ही शक्तिशाली
हों) भी उन्हें नहीं हरा सकते. वे सोमरस के आनंद में सोम यज्ञ करने वालों को प्रचुर यशदायी
धन देते हैं. हम मन से उन की स्तुति करते हैं. (९)
पांचवां खंड
स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (१)
इंद्र के पीने के लिए स्वादिष्ट और मीठा सोमरस तैयार किया गया है. वह सोमरस
अपनी पूर्ण मददायी धाराओं से इंद्र के लिए झरे. (१)
रक्षोहा विश्वचर्षणििरभि योनिमयोहत. द्रोणे सधस्थमासदत्.. (२)
सोम राक्षसनाशक हैं. जगद्रष्टा हैं. वे सोने के द्रोणकलश में विराजमान हो कर यज्ञस्थल
में प्रतिष्ठित हो गए. (२)
वरिवोधातमो भुवो म २४ हिष्ठो वृत्रहन्तमः. पर्षि राधो मघोनाम्.. (३)
हे सोम! आप धनदाता हैं. आप शत्रुओं के प्रबल नाशक हैं. आप धनवान शत्रुओं के
पास मौजूद रहने वाले धन हमें प्रदान कीजिए. (३)
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम ऋतुवित्तमो मदः. महि द्युक्षतमो मदः.. (४)
हे सोम! आप अत्यंत मधुर हैं. आप यजमान को कर्मों का फल देते हैं. आप प्रकाशमान
व तृप्तिदायी हैं. आप इंद्र के लिए पात्र में छन कर तैयार हो जाइए. (४)
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यस्य ते पीत्वा वृषभो वृषायते ऽस्य पीत्वा स्वर्विदः.
स सुप्रकेतो अभ्यक्रमीदिषो ऽच्छा वाजं नैतशः.. (५)
हे सोम! आप बहुत शक्तिमान हैं. आप को पी कर इंद्र और शक्तिमान हो जाते हैं. आप
को पी कर बुद्धिमान भी प्रसन्न होते हैं. आप के प्रभाव से इंद्र युद्धों में घोड़े की तरह शत्रुओं
के धनों को शीघ्र ही अपने अधीन कर लेते हैं. (५)
इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः. शृष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः.. (६)
सोमरस चमकीला और हरा है. वह बहुत जल्दी छन कर पात्र में पहुंच गया है. वह
जल्दी से जल्दी इंद्र को प्राप्त हो. (६)
अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः. सोमो जैत्रस्य चेतति यथा विदे.. (७)
सभी लोगों को यह पता है कि सोमरस सेवन करने योग्य है. इसे छान कर तैयार किया
गया है. इसे इंद्र के लिए मटकों में भरा गया है. सोमरस जीतने की इच्छा रखने वाले इंद्र को
युद्धों में बहुत जोश देता है. (७)
अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णाति सानसिम्. वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित्.. (८)
सेवन करने योग्य सोम को पी कर और प्रसन्न हो कर इंद्र धनुष धारण करते हैं. जल
प्रवाह को जीतने वाले इंद्र वज्र को धारण करते हैं. (८)
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे.
अप श्वान ॐ श्रथिष्टन सखायो दीर्घजिह्वयम्.. (९)
हे यजमानो! निस्संदेह यह सोमरस जीत दिलाने वाला है. यह आप पूरी तरह मान
लीजिए. यह प्रसन्नतादायी है. आप इस की ओर लपकने वाले लंबीलंबी जीभ वाले कुत्तों
(राक्षसों) को इस से दूर भगाइए. (९)
यो धारया पावकया परिप्रस्यन्दते सुतः. इन्दुरश्वो न कृत्व्यः.. (१०)
यज्ञ में सोमरस यजमान का सहायक है. यह पारदर्शी धाराओं से घोड़े की तरह वेगवान
हो कर कलश में जाता है. (१०)
तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया. यज्ञाय सन्वद्रयः.. (११)
हे यजमानो! सोम दुष्टों का विनाश करने वाले हैं. आप उन को आमंत्रित कीजिए. आप
यज्ञ का आदर करते हुए सब के कल्याण की भावना व्यक्त कीजिए. (११)
अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते.
आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विष्वञ्चमरुहद्दिविचक्षणः.. (१२)
हे सोम! आप कल्याणकारी, अन्न स्वरूप व संसार को तृप्ति देने वाले हैं. आप जल को
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सब तरह से पवित्र करने वाले हैं. अंतरिक्षलोक के जल में सोम ज्यादा बढ़ते हैं. सोम सर्वद्रष्टा
हैं. ये सूर्य के सब ओर जा सकने में समर्थ रथ पर चढ़ते हैं. (१२)
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः.
दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यं ३ नाम तृतीयमधि रोचनं दिवः.. (१३)
सोम तो जैसे यज्ञ की जीभ ही हैं. सोमरस छनते समय आवाज करता है. यह मीठा
और प्रिय रस वाला है. सोम यज्ञ संबंधी क्रियाकलापों को जानने वाले व निर्भय हैं. वे अपने
मातापिता का नाम नहीं जानते. ये यजमान द्वारा तैयार किए जाते हैं. ये स्वर्गलोक को
चमचमाने वाले हैं. ये छन कर तैयार हो जाने पर सोमजयी नामक तीसरे नाम को ग्रहण करते
हैं. (१३)
अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमाणः कोश आ हिरण्यये.
अभी ऋतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजसि.. (१४)
यजमान सोने के कलश में सोमरस को छानते हैं. कलश में जाते समय सोमरस आवाज
करता है. इस सोमरस की यजमान उपासना करते हैं. सोमरस सुबह, दोपहर और शाम—इन
तीनों सवनों (संध्याओं) में प्रकाशित होता है. (१४)
छठा खंड
यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे.
प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न श ॐ सिषम्.. (१)
हे यजमानो! आप उपासना करने वाले हैं. आप को हर यज्ञ में प्रज्वलित हो कर बढ़ने
वाले अग्नि की वाणी से स्तुति करनी चाहिए. अग्नि अमर, ज्ञानी व हमारे मित्र हैं. हम उन की
उपासना करते हैं. (१)
ऊर्जो नपात ॐ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये.
भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम्.. (२)
अग्नि लगातार अन्न और शक्तिदाता हैं. वे हमारा कल्याण चाहते हैं. हम देवताओं तक
हवि पहुंचाने के लिए अग्नि देवता को हवि प्रदान करते हैं. वे युद्धों में हमारे रक्षक और हमारे
लिए प्रगतिकारी हैं. वे हमारे पुत्रों के भी रक्षक होने की कृपा करें. हम उन की उपासना करते
हैं. (२)
एह्यू षु ब्रवाणि ते ऽ ग्न इत्थेतरा गिरः. अभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (३)
हे अग्नि! आप आइए. हम आप के लिए विधिविधान से स्तोत्र उचारते हैं. आप हमारी
और दूसरों की स्तुतियों को सुनिए. सोमरस आप को बढ़ोतरी प्रदान करें. (३)
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्. तत्र योनिं कृणवसे.. (४)
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हे अग्नि! आप का मन जहां कहीं भी, जिस पर भी है, आप उसे श्रेष्ठ बल और श्रेष्ठ
आवास प्रदान करने की कृपा करें. (४)
न हि ते पूर्तमक्षिपद्वन्नेमानां पते. अथा दुवो वनवसे.. (५)
हे अग्नि! आप नियम आदि की रक्षा करने वाले, उन का पालन करने वाले यजमान की
रक्षा करते हो. उन का पालन करते हो. आप हमारी सेवा को स्वीकार कीजिए. आप का तेज
हमारी आंखों को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाए. (५)
वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद्भरन्तो ऽ वस्यव:. वज्रिं चित्र हवामहे.. (६)
हे इंद्र! आप अपूर्व, वज्र धारण करने वाले, विलक्षण व सर्वोत्तम हैं. हम आप को
सोमरस चढ़ाना चाहते हैं. हम आप से रक्षा का अनुरोध करते हैं. हम आप को उसी तरह
पुकारते हैं, जैसे निर्बल व्यक्ति अपनी सहायता के लिए सबल को पुकारता है. (६)
उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्.
त्वामिध्यवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (७)
हे इंद्र! हम यज्ञ में अपनी रक्षा के लिए आप की शरण लेते हैं. आप शत्रुनाशक व युवा
हैं. आप हमारे पास आइए. हमारी मित्रता स्वीकारिए. आप के बारे में प्रसिद्ध है कि आप
सेवा करने योग्य हैं. सब की रक्षा करते हैं. (७)
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे. उदेव ग्मन्त उदभि:.. (८)
हे इंद्र! आप उपासना करने योग्य हैं. हम आप से उसी प्रकार अपनी इच्छा पूर्ति की
प्रार्थना करते हैं, जैसे पानी ले जाने वाले मनुष्य उस से अपनी इच्छानुसार खेलते हैं. (८)
वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वा सं चिदद्रिवो दिवेदिवे.. (९)
हे इंद्र! आप वज्रधारी व वीर हैं. नदियां जैसे समुद्र तक पहुंच कर उसे बढ़ाती हैं, उसी
प्रकार हमारी स्तुतियां आप तक पहुंच कर आप के यश को और बढ़ाती हैं. (९)
युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे वचोयुजा. इन्द्रवाहा स्वर्विदा.. (१०)
इंद्र गतिशील हैं. उन के घोड़े उन के बड़े जुए वाले बड़े रथ में कहने मात्र से ही जुत
जाते हैं. ये घोड़े गंतव्य स्थान को भी स्वयं ही जानने वाले हैं. ये यजमान की स्तुति सुनते ही
निर्धारित जगह के लिए चल पड़ते हैं. (१०)
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