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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

सोलहवां अध्याय

सोलहवां अध्याय
पहला खंड
अभि त्वा पूर्वपीतये इन्द्र स्तोमेभिरायवः.
समीचीनास ऋभवः समस्वरन्नुदा गृणन्त पूर्व्यम्.. (१)
हे इंद्र! यजमान चाहते हैं कि आप सब से पहले सोमरस पीजिए. यजमान वैदिक मंत्रों
से आप की स्तुति कर रहे हैं. आप उचित दृष्टि वाले हैं. रुद्र और ऋभुगण आप की गणना
सर्वप्रथम करते हैं. वे भी आप ही की स्तुति करते हैं. (१)
अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्य २४ शवो मदे सुतस्य विष्णवि.
अद्या तमस्य महिमानमायवो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (२)
हे इंद्र! आप सोमरस पी कर प्रसन्न होते हैं. आप यजमान का वीर्य और शक्ति दोनों
बढ़ाते हैं. आप महिमावान हैं. यजमान आप की उसी महिमा का बखान करते हैं. (२)
प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (३)
हे इंद्र! हे अग्नि! यजमान आप की अर्चना करते हैं. सामगायक आप के गुण गा रहे हैं.
अन्न धन हेतु हम भी आप को आमंत्रित करते हैं. (३)
इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (४)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप ने एक ही बार एक साथ नब्बे नगरों को कंपकंपा दिया. (४)
इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः. ऋतस्य पथ्या ३ अनु.. (५)
हे इंद्र! हे अग्नि! यज्ञ के होता आदि पुरोहित सत्य के मार्ग से हमारे यज्ञ के पास
उपस्थित होते हैं. (५)
इन्द्राग्नी तविषाणि वा २४ सधस्थानि प्रया २४ सि च. युवोरप्तूर्य २४ हितम्.. (६)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप हित साधने वाले हैं. आप के प्रयास सदैव शुभ कार्यों की ओर
लगे रहते हैं. (६)
शग्ध्यू ३ षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः.
भगं न हि त्वा यशसं वसुविद्मनु शूर चरामसि.. (७)
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हे इंद्र! आप शचीपति, शक्तिमान, धनवान, सौभाग्यवान और यशस्वी हैं. हम आप का
अनुगमन करते हैं. (७)
पौरो अश्वस्य पुरुकृद्गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः.
न किर्हि दानं परि मर्धिषत्वे यद्यद्यामि तदा भर.. (८)
हे इंद्र! आप अश्व, गौ आदि पशुओं का पालन करते हैं. स्वर्णमयी मुद्रा से जैसे प्रसन्नता
होती है, वैसे ही आप को देख कर प्रसन्नता होती है. कोई भी आप के दान को भूल नहीं
सकता. आप हमें भरपूर धन दीजिए. (८)
त्व २३ होहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये.
उद्वावृषस्व मघवन्गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये.. (९)
हे इंद्र! आप हमें धन देने के लिए पधारिए. आप सन्मार्ग पर चलने वाले को
सौभाग्यवान बनाइए. आप हमारी गौ संबंधी इच्छाओं को पूरा कीजिए. (९)
त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय म २३ हसे.
आ पुरंदरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तो ऽ वसे.. (१०)
हे इंद्र! आप सैकड़ोंहजारों गायों के झुंड देने व शत्रु नगरियों को नष्ट करने की सामर्थ्य
रखते हैं. यजमान अपनी रक्षा के लिए साम मंत्र गा रहे हैं. इंद्र ब्राह्मणों के वचनों से युक्त हैं.
हम उन को आमंत्रित करते हैं. (१०)
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्.
मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये.. (११)
हे अग्नि! आप धनदाता, होता व आनंददाता हैं. सोमरस से भरे पात्र आप तक पहुंचें.
सर्वप्रथम हम आप की स्तुति करते हैं. वे स्तुतियां भी आप तक पहुंचें. (११)
अश्वं न गीर्भी रथ्य २३ सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः.
उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्षि राधो मघोनाम्.. (१२)
हे अग्नि! सारथी जैसे रथ में जोते गए घोड़ों को जोश दिलाने के लिए बोलता रहता है,
वैसे ही यजमान आप के लिए स्तुतियां बोलते हैं. आप राक्षसों से धन छीन कर अपने
उपासकों को देने की कृपा कीजिए. आप उत्तम कोटि के दानदाता हैं. (१२)
दूसरा खंड
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय. त्वामवस्युरा चके.. (१)
हे वरुण! आप हमारी इन स्तुतियों पर कान (ध्यान) दीजिए. आप हमें सुख दीजिए. हम
आप से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. (१)
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कया त्वं न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृषन्. कया स्तोतृभ्य आ भर.. (२)
हे इंद्र! आप किन साधनों से हमारी रक्षा करते हैं? आप हमें किस प्रकार बहुत प्रसन्नता
देते हैं? आप कैसे यजमानों (स्तोताओं) की इच्छापूर्ति करते हैं? (२)
इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयत्यध्वरे.
इन्द्र २४ समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये.. (३)
हे इंद्र! हम यज्ञ में व वीर भक्तगण संग्राम में आप को आमंत्रित करते हैं. हम धन हेतु
आप का आह्वान करते हैं. (३)
इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत्.
इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिरे इन्द्रे स्वानास इन्दवः.. (४)
हे इंद्र! आप महान हैं. आप ने स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का फैलाव किया. आप ने सूर्य
को प्रकाश से चमकाया. आप ने सकल भुवनों को शरण दी. हम आप के लिए सोमरस भेंट
करते हैं. (४)
विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व तन्व ३ २४ स्वा हि ते.
मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (५)
हे इंद्र! आप हवि से बढ़ोतरी पाते हैं. आप सभी कर्म साधते हैं. हम संसार के कल्याण
के लिए अपने को न्योछावर करते हैं. यज्ञ से विरोध रखने वाले लोगों का मनोबल टूटे. इंद्र
हमारे हो जाएं. बुद्धिजीवी लोग हमारे हो जाएं. (५)
अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषा २४ सि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः
धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः.
विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः.. (६)
हे सोम! आप का रस रुचिपूर्ण है व हरित आभा वाला है. आप उस से द्वेषियों का वैसे
ही संहार करते हैं, जैसे सूर्य अपनी किरणों से अंधेरे का संहार करते हैं. आप का रस
प्रकाशमान है. छलनी पर आप की धारा प्रकाशमान है. आगेपीछे सब ओर आप की धारा
शोभित होती है. आप अपने सात मुखों से निकलने वाली सात किरणों से कहीं ज्यादा
प्रकाशमान व उत्तम हैं. (६)
प्राचीमनु प्रदिशं याति चेकितत्स २४ रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः.
अग्मन्नुक्थानि पौ २४ स्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन्.
वज्रश्च यद्भवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता.. (७)
हे सोम! आप पूर्व दिशा में प्रस्थान करते हैं. तब आप का रथ बहुत चमकता है. आप
का रथ दिव्य व दर्शनीय है. यजमान मंत्र गागा कर अपनी स्तुतियां आप और इंद्र तक
पहुंचाते हैं. यजमान विजय पाने की इच्छा से आप को प्रसन्न करते हैं. वे आप से वज्र प्राप्त
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करते हैं. आप दोनों मिल कर किसी भी युद्ध में यजमान को हारने नहीं देते हैं. (७)
त्व ॐ ह त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे.
परावतो न साम तद्यत्रा रणन्ति धीतयः.
त्रिधातुभिरुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे.. (८)
हे सोम! आप ने व्यापारियों से धन पाया. आप मातृ जल से पवित्र किए जाते हैं. आप
के लिए गाए जाने वाले सामगान यज्ञ स्थान से बहुत दूर दूर तक गूंजते हैं. आप स्वर्गलोक,
अंतरिक्षलोक एवं पृथ्वीलोक तीनों ही जगह सुशोभित होते हैं. आप हमें दीर्घायु कीजिए. (८)
तीसरा खंड
उत नो गोषणिं धियमश्वसां वाजसामुत. नृवत्कृणुहूतये.. (१)
हे पूषा! आप हमारी बुद्धि की रक्षा कीजिए. हमारी बुद्धि हमें गोधन, अश्वधन व धन
प्राप्त कराती है. (१)
शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः. विदाकामस्य वेनतः.. (२)
हे मरुद्गण! सत्य हमारा बल है. हम यज्ञ करते हुए पसीने से तर हो गए हैं. आप ऐसे
उपासकों की मनोकामनाएं पूरी करने की कृपा कीजिए. (२)
उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये. सुमृडीका भवन्तु नः.. (३)
हे मरुद्गण! आप प्रजापति के पुत्र हैं. आप अमर हैं. आप हमें सुखी बनाने की कृपा
कीजिए. आप स्तुतियां सुनने की कृपा कीजिए. (३)
प्र वां महि द्यावी अभ्युपस्तुतिं भरामहे. शुची उप प्रशस्तये.. (४)
हे स्वर्गलोक! हे पृथ्वीलोक! हम स्तुतियों से आप के समीप पहुंचते हैं. हम आप दोनों
लोकों के लिए भरपूर स्तुतियां उच्चारते हैं. (४)
पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः. ऊह्याथे सनादृतम्.. (५)
हे देवी! आप स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को पवित्र करती हैं. आप प्रकाशवती हैं. आप
यज्ञ की परिपाटियों का निर्वाह करती हैं. (५)
मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्. परिं यज्ञं निषेधथुः.. (६)
हे देवियो! हे अंतरिक्षलोक! यजमान आप के सखा हैं. आप यजमान की मनोकामनाएं
पूरी करते हैं. आप यज्ञ को पूर्ण कराते हैं. आप यज्ञ को पूरा सहयोग देते हैं. (६)
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्. वचस्तच्चिन्न ओहसे.. (७)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां स्नेह से आप के पास उसी तरह पहुंचती हैं, जैसे कबूतर प्रेम से
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कबूतरी के पास पहुंचता है. (७)
स्तोत्र ॐ राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते. विभूतिरस्तु सूनृता.. (८)
हे इंद्र! आप धनों के स्वामी व वीर हैं. आप वाणी से स्तुति योग्य, अच्छे ऋत (सत्य)
वाले और वैभववान हैं. (८)
ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये ऽ स्मिन् वाजे शतक्रतो. समन्येषु ब्रवावहै.. (९)
हे इंद्र! आप सैकड़ों कार्य करने वाले हैं. आप हमारे संरक्षण के लिए प्रयास कीजिए.
आप उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित हैं. हम आप से कुछ अन्य बातों के बारे में भी परामर्श
(निवेदन) करते रहें. (९)
गाव उप वदावटे मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (१०)
हे गौओ! यज्ञ स्थान के पास आप को बुलाया जा रहा है. आप रंभा कर आवाज
कीजिए. आप यज्ञ फल देने वाली हैं. आप के दोनों ही कान सोने के हैं. (१०)
अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु. अवटस्य विसर्जने.. (११)
हम पत्थर से कूट कर निकाला गया, बचा हुआ सोमरस परम वीर इंद्र के विसर्जन पर
भेंट करने के लिए द्रोणकलश में स्थापित करते हैं. (११)
सिञ्चन्ति नमसावटमुच्चाचक्रं परिज्मानम्. नीचीनबारमक्षितम्.. (१२)
हम यजमान उस परम शक्ति को नमस्कार करते हैं, नमनपूर्वक यज्ञ विधान करते हैं.
उस परम शक्ति का चक्र ऊपर (लोक) स्थित है, नीचे का द्वार चारों ओर झुका हुआ है. वह
द्वार अक्षत है. (१२)
चौथा खंड
मा भेम मा श्रमिष्मोग्रस्य सख्ये तव.
महत्ते वृष्णो अभिचक्ष्यं कृतं पश्येम तुर्वशं यदुम्.. (१)
हे इंद्र! हम आप के मित्र हैं, इस कारण हम कभी भी श्रम से थके नहीं, कभी भी किसी
से डरे नहीं. आप महान हैं. आप की कृपा सराहनीय है. तुर्वश और यदु दोनों ही प्रसन्न
दिखाई देते हैं. (१)
सव्यामनु स्फिग्यं वावसे वृषा न दानो अस्य रोषति.
मध्वा संपृक्ताः सारघेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पिब.. (२)
हे इंद्र! आप क्षमतावान हैं. आप बाएं हाथ से ही (आसानी से) सब को शरण दे देते हैं.
अत्यंत क्रूर भी आप का कुछ बिगाड़ नहीं सकते. मीठे दूध वाली गायों के समान सुखदायी
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आप की स्तुति हम करते हैं. आप उन्हीं के समान सुखद हैं. आप जितनी जल्दी हो सके
हमारे यज्ञ स्थान पर पधारिए व सोमपान करिए. (२)
इमा उत्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम.
पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितो ऽ भि स्तोमैरनूषत.. (३)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां आप का यशवर्धन करें. हमारी स्तुतियां श्रेष्ठ ज्ञानमय हैं. ज्ञानी
और तेजस्वी यजमान आप की स्तुति करते हैं. (३)
अय ॐ सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे.
सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (४)
हे इंद्र! आप समुद्र की भांति विस्तृत हैं. आप हजारों ऋषियों जैसे बलवान हैं. आप
सत्यवान व शक्तिमान हैं. ब्रह्मज्ञानी लोगों के निर्देशन में आप की स्तुतियां गाई जाती हैं. (४)
यस्यायं विश्व आर्यो दासः शेवाधिपा अरिः.
तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्यो अज्यते रयिः.. (५)
हे इंद्र! यह सारा विश्व आप का है. आर्य दास की भांति आप की सेवा करते हैं. आप
शत्रुओं के अधीश हैं. रुश्म और पवि शक्तिमान हो कर भी आप की पूजा करते हैं. (५)
तुरण्यवो मधुमन्तं घृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचुः.
अस्मे रयिः पप्रथे वृष्ण्य ॐ शवो ऽ स्मे स्वानास इन्दवः.. (६)
हे इंद्र! हम आप की अर्चना करते हैं. यजमान ब्राह्मण यज्ञ करते हैं. वे यज्ञ में शहद और
घी से भरी हुई आहुतियां व हम हवि रूपी धन देते हैं. सोम प्रसिद्धि प्राप्त करें. (६)
गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्विव. शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय.. (७)
हे सोम! आप हमें गोवान व अश्ववान बनाइए. आप गाय के दूध में मिल कर पवित्र
सफेद रंग प्राप्त करते हैं. (७)
स नो हरीणां पत इन्दो देवप्सरस्तमः. सखेव सख्ये नर्यो रुचे भव.. (८)
हे सोम! आप हरे हैं. आप देवताओं द्वारा ईप्सिततम (सब से ज्यादा चाहे गए) हैं. आप
उसी तरह हम में रुचि लेते हैं, जैसे एक मित्र दूसरे मित्र का सहयोग करने के लिए रुचि लेता
है. (८)
सनेमि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम्. साह्वां इन्दो परि बाधो अप द्वयुम्.. (९)
हे इंद्र! आप प्राचीन काल से चले आ रहे सुख हमें दीजिए. आप सुख में बाधा पैदा
करने वाले शत्रुओं, दोगले व्यवहार वालों व स्वार्थियों का भी नाश कीजिए. (९)
अज्जते व्यज्जते समज्जते ऋतु ॐ रिहन्ति मध्वाभ्यज्जते.
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सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षण २४ हिरण्यपावाः पशुमप्सु गृभ्णते.. (१०)
हे सोम! सोमरस में यजमान गाय का दूध मिलाते हैं. उसे पी कर प्रसन्न होते हैं, अनेक
प्रकार से उसे अनेक रूपों में तैयार करते हैं. उसे मीठे दूध व सोने जैसे चमकते हुए जल में
मिलाते हैं. सोम ऊंचे स्थान से, जल के ऊंचे भाग से गिरते हैं. वे सर्वद्रष्टा हैं. (१०)
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति.
अहिर्न जूर्णामिति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीडन्नसरद्वृषा हरिः.. (११)
हे यजमानो! आप सोम के गुण गाइए. सोम ज्ञानी व हरे हैं. वे विशाल धाराएं धारण
करते हैं. सांप के केंचुली बदलने की तरह वे अपनी पुरानी छाल बदल देते हैं. वे घोड़े जैसे
खेलते हुए द्रोणकलश में जाते हैं. (११)
अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः.
हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतीरथः पवते राय ओक्यः.. (१२)
सोम अग्रगामी हैं, राजा हैं, जल में मिलते हैं और प्रशंसा प्राप्त करते हैं. वे लोकों में दिन
के (समय के) मापक, सुंदर व हरे हैं. वे जलवासी, ज्योतिर्मय रथ वाले व धन का भंडार हैं.
(१२)
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