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सर्वकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 310 में से

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पृष्ठ 126

उगते ही स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक आदि सभी उन के प्रकाश से जगमगा जाते
हैं. (३)
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४)
सूर्य गतिशील व तेजस्वी हैं. वे उदित हो कर ऊपर स्थित हो जाते हैं. सब से पहले वे
पृथ्वीलोक (माता), फिर स्वर्गलोक (पिता) फिर अंतरिक्षलोक को प्राप्त होते हैं. (४)
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (५)
सूर्य का प्रकाश अपनी किरणों से आकाश में घूमता है. सूर्य के उगने पर ये किरणें
दिखती हैं और अस्त होने पर गायब हो जाती हैं. सूर्य अंतरिक्षलोक को विशेष रूप से
प्रकाशित करते हैं. (५)
त्रि ꣳ शद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (६)
दिन की तीस घड़ियों तक सूर्य अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं. इन सूर्य के लिए हर
एक मुख वेदवाणी उचारता है (स्तुति करता है). (६)
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (७)
दिन में जैसे चोर छिप जाते हैं, वैसे ही सूर्य के उगने पर ग्रह, नक्षत्र, तारागण आदि छिप
जाते हैं. (७)
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (८)
जैसे हम जलती हुई अग्नि की ज्वाला देख सकते हैं, वैसे ही सूर्य की प्रकाशित किरणों
को हम देख सकते हैं. वे सब को देख सकती हैं. (८)
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमाभासि रोचनम्.. (९)
हे सूर्य! आप सब को पार लगाने वाले हैं. आप सारे संसार को देख सकते हैं. आप सब
को प्रकाशित कर सकते हैं. चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि को आप ही चमकाते हैं. (९)
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्व ꣳ स्वर्द्दशे.. (१०)
हे सूर्य! आप मरुद्गणों के देखते हुए उन के सामने उदित होते हैं. आप मनुष्यों के
देखते हुए उदित होते हैं. आप सभी के देखते हुए यानी सब के सामने प्रकट होते हैं. (१०)
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (११)
हे सूर्य! आप सभी को पवित्र व प्रकाशित करने वाले हैं. आप जिस प्रकाश से सब को
प्रकाशित करते हैं हम उस की उपासना करते हैं. (११)
उद्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (१२)
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