सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 310 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्याज्य वाणी न बोलें. हम देवताओं की कृपा में रहें. उन के द्वारा दिए गए सुख से सुखी रहें.
(९)
यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती.
यशो भगस्य विन्दतु यशो मा प्रतिमुच्यताम्.
यशसा ३ स्याः स ꣳ सदो ऽ हं प्रवह्रिता स्याम्.. (१०)
हम यजमानों को स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का यश प्राप्त हो. हमें इंद्र और बृहस्पति
का यश भी प्राप्त हो. सूर्य का यश मुझे मिले. यह यश कभी हम से मुंह न मोड़े. इस सभा में
मुझे यश मिले. इस में मैं विचार व्यक्त करने की अच्छी क्षमता (देवताओं की कृपा से) पा
जाऊं. (१०)
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री.
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्.. (११)
इंद्र वज्रधारी और शक्तिशाली हैं. वे बादलों को भेद कर बरसात करने वाले हैं. उन्होंने
नदियों के तट बना कर पर्वतों से जल बहाया. मैं उन के इन अच्छे कामों का बारबार वर्णन
करता हूं. (११)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्.
त्रिधातुरर्को रजसो विमानो ऽ जसं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम्.. (१२)
मैं (आत्मा) जन्म से ही अग्नि स्वरूप हूं. सब कुछ जानने वाला हूं, प्रकाशमान हूं. मुंह
में अमरता देने वाली वाणी है. मैं प्राण, अपान, व्यान इन तीनों प्रकार का प्राण हूं, आकाश
को नापने वाला वायु हूं, प्रकाशमान सूर्य हूं, सभी की हवि हूं. (१२)
पात्यग्निर्विपो अग्रं पदं वेः पाति यह्वश्चरण ꣳ सूर्यस्य.
पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपमादमृष्वः.. (१३)
अग्नि देव सर्वव्यापक हैं. वे पृथ्वी के मुख्य स्थानों की रक्षा करते हैं. वे महान हैं. वे सूर्य
के मार्ग व अंतरिक्ष की रक्षा करते हैं. वे अंतरिक्षलोक में मरुद्गणों व देवताओं को प्रिय लगने
वाले यज्ञ की रक्षा करते हैं. वे सुंदर तथा दर्शनीय हैं. (१३)
चौथा खंड
भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि.
स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशे ऽ दाः.. (१)
हे अग्नि! आप चमचमाते हैं. आप का मुख प्रकाशित है. उस मुख में जीभ अग्नि की
ज्वाला में डाली गई हवि खाती है. आप धन देने वाले हैं. आप अन्न व रमणीय धन दीजिए.
(१)
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