सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पंद्रहवां अध्याय

पंद्रहवां अध्याय
पहला खंड
कस्ते जामिर्जनानामग्ने को दाश्वध्वरः. को ह कस्मिन्नसि श्रितः.. (१)
हे अग्नि! मनुष्यों में कौन आप का सगा, पथ प्रदर्शक, यज्ञकर्त्ता व आप के स्वरूप का
ज्ञाता है? आप का आश्रय कहां है? (१)
त्वं जामिर्जनानामग्ने मित्रो असि प्रियः. सखा सखिभ्य ईड्यः.. (२)
हे अग्नि! मनुष्यों में कौन आप का मित्र है, प्रिय है? सखा सखियों में कौन आप को
सर्वाधिक प्रिय है? (२)
यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्. अग्ने यक्षि स्वं दमम्.. (३)
हे अग्नि! आप हमारे लिए मित्र और वरुण की पूजा करने की कृपा कीजिए. आप
बहुत से देवताओं की पूजा करने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ की पूजा कीजिए. (३)
ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमा २४ सि दर्शतः. समग्निरिध्यते वृषा.. (४)
हे अग्नि! आप पूजनीय, नमन के योग्य, तमहारी व दर्शनीय हैं. आप को समिधाओं से
भलीभांति प्रज्वलित किया जाता है. (४)
वृषो अग्निः समिध्यते ऽ श्चो न देववाहनः. त २४ हविष्मन्त ईडते.. (५)
हे अग्नि! आप शक्तिशाली हैं. घोड़े जैसे वाहन को ले जाते हैं, वैसे ही आप देवताओं के
वाहन को ले जाते हैं. हे हविमान! आप हमारी प्रार्थनाएं स्वीकारिए. (५)
वृषणं त्वा वयं वृषन्वृषणः समिधीमहि. अग्ने दीद्यतं बृहत्.. (६)
हे अग्नि! आप शक्तिमान हैं. हम शक्तिमान आप को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं. हम
समिधाओं से आप को प्रज्वलित करते हैं. आप दीप्तिमान व विशाल हैं. (६)
उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः. अग्ने शुक्रासि ईरते.. (७)
हे अग्नि! हम समिधाओं से आप को प्रज्वलित करते हैं. हमारी अधिक अर्चना से आप
ज्वालाओं से बढ़ोत्तरी प्राप्त करते हैं. (७)
उप त्वा जुह्वो ३ मम घृताचीर्यन्तु हर्यत. अग्ने हव्या जुषस्व नः.. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! हमारी घी से भरी हुई हवि आप का मन हरे. वह आप तक पहुंचे. हे अग्नि!
आप हमारी उपासना को स्वीकार करने की कृपा कीजिए. (८)
मन्द्र ॐ होतारमृत्विजं चित्रभानुं विभावसुम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (९)
हे अग्नि! आप देवताओं के होता, आनंददाता, अद्भुत, वैभववान व प्रकाशमान हैं.
आप हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा कीजिए. (९)
पाहि नो अग्न एकया पाहु ३ त द्वितीयया.
पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जां पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (१०)
हे अग्नि! आप एक स्तुति सुन कर हमारी रक्षा कीजिए. आप दूसरी स्तुति सुन कर
हमारी रक्षा कीजिए. आप तीसरी स्तुति सुन कर हमारी रक्षा कीजिए. आप चौथी स्तुति सुन
कर हमारी रक्षा कीजिए. (१०)
पाहि विश्वस्माद्रक्षसो अराव्णःप्र स्म वाजेषु नो ऽ व.
त्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतातय आपिं नक्षामहे वृधे.. (११)
हे अग्नि! आप सारी राक्षसी व स्वार्थी प्रवृत्तियों से हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे
हितैषी हैं. आप हमारे अभीष्ट देव हैं. हम आप की शरण में हैं. (११)
दूसरा खंड
इनो राजन्नरतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमाँ अदर्शि.
चिकिद्विभाति भासा बृहतासिक्र्नीमेति रुशतीमपाजन्.. (१)
हे अग्नि! आप राजा और शत्रुओं के लिए भयानक हैं. आप यजमानों की मनोकामना
पूरी करते हैं. आप चकित करने वाले आप भास्कर (प्रकाशमान) व विशाल हैं. आप रात्रि में
हवन के लिए चमकते हैं. (१)
कृष्णां यदेनीमभि वर्पसाभूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम्.
ऊर्ध्वं भानु ॐ सूर्यस्य स्तभायन् दिवो वसुभिररतिर्वि भाति.. (२)
हे अग्नि! आप पिता (सूर्य) के जाए हैं. आप स्त्री रूप को प्रकट करते हैं. अंधेरी रात
को अपनी ज्वालाओं से हटाते हैं (परास्त करते हैं). आप अपने दिव्य तेज से सूर्य का तेज
ऊपर स्वर्गलोक में ही रोक लेते हैं. आप अपने ही तेज से तेजस्वी होते हैं. (२)
भद्रो भद्रया सचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात्.
सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितष्ठन्नुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात्.. (३)
कल्याणकारी अग्नि की कल्याणकारिणी उषा सेवा करती हैं. अग्नि शत्रुनाशक हैं. वे
अपनी प्रिय बहन उषा के पास पहुंचते हैं. वे अंधेरे का नाश करते हैं. वे सर्वत्र गमनशील हैं. वे
ebook converter DEMO Watermarks*

अपनी लपटों से सर्वत्र प्रकाशित हो रहे हैं. (३)
कया ते अग्ने अङ्गिर ऊर्जो नपादुपस्तुतिम्. वराय देव मन्यवे.. (४)
हे अग्नि! आप अंगों को प्रकाशित करते हैं. आप ऊर्जा बढ़ाते हैं. सब आप को
अंगीकार करते हैं. हम आप के अलावा और किस को श्रेष्ठ देव मानें? (४)
दाशेम कस्य मनसा यज्ञस्य सहसो यहो. कदु वोच इदं नमः.. (५)
हे अग्नि! हम किस मन से आप का भजन करें? हम कब आप को नमन करें? कब
हमारी वाणियां आप को प्राप्त करें? (५)
अधा त्व ꣳ हि नस्करो विश्वा अस्मभ्य ꣳ सुक्षिती:. वाजद्रविणसो गिरः.. (६)
हे अग्नि! आप हम पर सब कृपा कीजिए. हम अपनी प्रार्थनाओं से आप को अपने प्रति
कृपालु बनाएं. आप हमें धनधान्यमय बनाइए. (६)
अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे.
आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे.. (७)
हे अग्नि! आप देवों को आमंत्रित करने वाले हैं. आप हमारी स्तुतियां सुनिए. आप अन्य
अग्नियों के साथ हमारे यज्ञस्थान पर पधारिए, कुश का आसन ग्रहण कीजिए. हमारी हवि से
युक्त आहुतियां स्वीकार करने की कृपा कीजिए. (७)
अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः सुचश्चरन्त्यध्वरे.
ऊर्जो नपातं घृतकेशमीमहे ऽ ग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (८)
हे अग्नि! आप सर्वत्र भ्रमणशील और बलवर्द्धक हैं. आप के यजमान पुत्र आप के पास
हवि पहुंचाने के लिए आतुर हैं. आप उन की आहुतियां अंगीकार कीजिए. आप ऊर्जा का
नाश रोकते हैं. हम आप की यज्ञ में सर्वप्रथम आराधना करते हैं. आप घी से बढ़ते हैं. (८)
अच्छा नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम्.
अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये.. (९)
हे अग्नि! आप दर्शनीय व लपटों वाले हैं. हमारी वाणियां शीघ्र आप तक पहुंचें. आप
यज्ञ में हमारा मार्ग प्रशस्त कीजिए. हम यज्ञ में आप को नमन करते हैं. आप बहुत प्रशंसनीय
हैं. आप भलीभांति प्रज्वलित हैं. (९)
अग्नि ꣳ सूनु ꣳ सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्.
द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वा होता मन्द्रतमो विशि.. (१०)
हे अग्नि! आप अमर हैं. आप पृथ्वी पर अमृत स्वरूप हैं. आप यज्ञ को सफल बना कर
आनंददायक हैं. आप को दान देने के लिए हम बारबार बुलाते हैं. (१०)
ebook converter DEMO Watermarks*

तीसरा खंड
अदाभ्यः पुरुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम्. तूर्णी रथः सदा नवः.. (१)
हे अग्नि! आप मनुष्यों के पथप्रदर्शक, आगे चलने वाले, रथ के समान वेगवान व युवा
हैं. आप को कोई नहीं दबा सकता है. (१)
अभि प्रया २९ सि वाहसा दाश्वाँ अश्नोति मर्त्यः. क्षयं पावकशोचिषः.. (२)
हे अग्नि! आप पवित्र, प्रकाशमान व हविवाहक हैं. हम हविदाता मनुष्य आप से अच्छा
घर मांगते हैं. (२)
साह्वान्विश्वा अभियुजः क्रतुर्देवानामामृक्तः. अग्निस्तुविश्रवस्तमः.. (३)
हे अग्नि! आप शत्रुओं की सेना को हराने वाले, दिव्यगुणदाता व भरपूर अन्नदाता हैं.
हम आप को सभी अग्नियों सहित आमंत्रित करते हैं. (३)
भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा उत प्रशस्तयः.. (४)
हे अग्नि! हम आप को आहुति देते हैं. आप हमारा कल्याण कीजिए. आप
सौभाग्यशाली हैं. आप की कृपा हमें प्राप्त हो. हम कल्याणकारी स्तुतियां गा रहे हैं. आप
हमारा कल्याण कीजिए. (४)
भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहिः.
अव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धतां वनेमा ते अभिष्टये.. (५)
हे अग्नि! आप हमारा मन कल्याणकारी बनाइए, पापमय विचारों व बुरी प्रवृत्तियों को
दूर कीजिए. हम कल्याण के लिए आप की स्तुति करते हैं. आप हमें स्थिर बनाइए और हमें
बहुत सा धन दीजिए. (५)
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो. अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः.. (६)
हे अग्नि! आप बलवान, ईश्वर व गायों के स्वामी हैं. आप सब कुछ जानते हैं. आप हमें
भरपूर वैभव प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६)
स इधानो वसुष्कविरग्निरीडेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (७)
हे अग्नि! आप सब के लिए आवासदाता हैं. ज्ञान से भरी स्तुति से आप की उपासना
की जाती है. आप प्रकाशमान हैं. आप हमें प्रकाशमान संपदा दीजिए. (७)
क्षपो राजन्नुत त्मानाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (८)
हे अग्नि! आप प्रकाशमान हैं. आप दिनरात (हर समय) दुष्टों को पीड़ा पहुंचाइए. आप
तेजस्वी हैं. आप राक्षसों को जला कर भस्म कर दीजिए. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*

चौथा खंड
विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्.
अग्निं वो दुर्यं वच स्तुषे शूषस्य मन्मभिः.. (१)
हे अग्नि! आप मेहमान की तरह सत्कार के योग्य एवं सभी को प्रिय हैं. आप को सभी
हवि प्रदान करते हैं. हम मन से और यज्ञवेदी में आप को स्थापित कर के आप की बारबार
स्तुति करते हैं. (१)
यं जनासो हविष्मन्तो मित्रं न सर्पिरासुतिम्. प्रश ॐ सन्ति प्रशस्तिभिः.. (२)
हे अग्नि! हम हविदाता आप के मित्र हैं. आप बहुत पूजनीय हैं. हम वैदिक प्रशस्तियों
से आप की प्रशंसा करते हैं. (२)
पन्या ॐ सं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता. हव्यान्यैरयद्दिवि.. (३)
हे अग्नि! आप सारे ज्ञानों से परिपूर्ण हैं. आप हवि को स्वर्गलोक में पहुंचाते हैं. हम
आप की स्तुति करते हैं. (३)
समिद्धमग्निं समिधा गिरा गृणे शुचिं पावकं पुरो अध्वरे ध्रुवम्.
विप्र ॐ होतारं पुरुवारमद्रुहं कवि ॐ सुम्नैरीमहे जातवेदसम्.. (४)
हे अग्नि! आप पवित्र हैं. आप समिधाओं से प्रकट होते हैं. आप स्थिर व यज्ञ में
अग्रस्थानी हैं. ब्राह्मण, होता, सर्वज्ञाता, विद्वान् आदि सभी को आप धन देते हैं. हम बहुत
अच्छे मन से आप की उपासना करते हैं. (४)
त्वां दूतमग्ने अमृतं युगेयुगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम्.
देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विशपतिं नमसा नि षेदिरे.. (५)
हे अग्नि! आप अमर हैं. हम युगों से आप को अपना दूत मानते हैं. आप हविवाहक हैं.
आप देवताओं और मनुष्यों दोनों को जाग्रत करते हैं. आप संसार व धन के स्वामी हैं. हम
आप को नमन एवं आप की स्तुति करते हैं. (५)
विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवाना ॐ रजसी समीयसे.
यत्ते धीति ॐ सुमति मावृणीमहे ऽ ध स्म नस्त्रिवरूथः शिवो भव.. (६)
हे अग्नि! आप देव और मनुष्य दोनों की शोभा बढ़ाते हैं. आप व्रतप्रिय, देवों के दूत,
हविवाहक व तीनों लोकों में भ्रमणशील हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. हम आप से सुख
चाहते हैं. आप कल्याणकारी होइए. (६)
उपत्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः. वायोरनीके अस्थिरन्.. (७)
हे अग्नि! हमारी स्तुतियां बहनों के समान आप का गुण गाती हैं. हम वायु की सहायता
ebook converter DEMO Watermarks*

से आप को प्रज्वलित करते हैं. हम यज्ञ स्थान में आप की स्थापना करते हैं. (७)
यस्य त्रिधात्ववृतं बर्हिस्तस्थावसन्दिनम्. आपश्चिन्न्रि दधा पदम्.. (८)
हे अग्नि! आप में जल भी विद्यमान हैं. आप के चारों ओर यज्ञकुंड के पास कुश के
आसन बिछे हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (८)
पदं देवस्य मीढुषो ऽ नाधृष्टाभिरूतिभिः. भद्रा सूर्य इवोषदृक्.. (९)
हे अग्नि! आप प्रकाशवान, सराहनीय, शत्रुहीन और धैर्यशाली हैं. आप का दर्शन करना
सूर्य के दर्शन के समान कल्याणकारी है. (९)