सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
दूसरा अध्याय
दूसरा अध्याय
पहला खंड
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत.
विश्वासाहं १३ शतक्रतुं म १३ हिष्ठं चर्षणीनाम्.. (१)
हे यजमानो! आप इंद्र की स्तुति कीजिए. वे आप के द्वारा चढ़ाए गए सोमरूपी अन्न को
पीने वाले तथा शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. वे सैकड़ों प्रकार के कर्म करने वाले व मनुष्यों
को धन देने वाले हैं. (१)
पुरुहूतं पुरुष्टुतं गाथान्या ३ १३ सनश्रुतम्. इन्द्र इति ब्रवीतन.. (२)
हे यजमानो! आप इंद्र की उपासना कीजिए. वे बहुत प्रसिद्ध हैं. वे यज्ञ में अनेक लोगों
द्वारा बुलाए जाते हैं. अनेक लोगों द्वारा उन की उपासना की जाती है. (२)
इन्द्र इन्नो महोनां दाता वाजानां नृतुः. महाँ अभिज्ञा यमत्.. (३)
हे यजमानो! इंद्र अन्न और धन देने वाले हैं. वे महान देव हैं. वे हमारे सामने प्रकट हो
कर हमें अन्नधन आदि देने की कृपा करें. (३)
प्र व इन्द्राय मादन १३ हर्यश्वाय गायत. सखायः सोमपाव्ने.. (४)
हे यजमानो! इंद्र हरि नाम के घोड़े वाले हैं. वे सोमरस पीने वाले हैं. आप उन इंद्र के
लिए मादक स्तोत्र गाइए. (४)
श १३ सेदुक्थ १३ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः. यकृमा सत्यराधसे.. (५)
हे यजमानो! इंद्र श्रेष्ठ धनदाता और सत्यरूपी धन वाले हैं. हम विधिविधान सहित इंद्र
की स्तुति करते हैं. आप भी उन की स्तुति कीजिए. (५)
त्वं इन इन्द्र वाजयूस्त्वं गव्युः शतक्रतो. त्व १३ हिरण्ययुर्वसो.. (६)
हे इंद्र! आप सैकड़ों प्रकार के कर्म करने वाले हैं. आप हमें अन्न, गाएं व सोना दीजिए.
(६)
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (७)
हे इंद्र! हम आप को अपना बनाना चाहते हैं. हम मित्र भाव से आप की उपासना करते
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हैं. हम कण्वगोत्र के हैं. हमारी संतान भी आप की स्तुति करती है. (७)
न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ. तवेदु स्तोमैश्चिकेत.. (८)
हे इंद्र! आप वज्र धारण करने वाले हैं. यज्ञ अनुष्ठान में आप के स्तोत्र के अलावा हम
और कोई स्तोत्र नहीं पढ़ेंगे. हम आप के ही स्तोत्रों से स्तुति करना जानते हैं. (८)
इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति. यन्ति प्रमादमतन्द्राः.. (९)
सोमयज्ञ करने वालों पर देवगण की कृपा रहती है. केवल सपने देखने वालों से वे प्रेम
नहीं करते हैं. परिश्रम करने वाले ही आनंददायी सोम को प्राप्त कर सकते हैं. (९)
इन्द्राय मद्धने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः. अर्कमर्चन्तु कारवः.. (१०)
हे यजमानो! आप सराहनीय सोमरस की उपासना कीजिए. वे उपासना के योग्य हैं. इंद्र
सोमरस को चाहते हैं. हमारी वाणी को छाने हुए सोमरस की स्तुति करनी चाहिए. (१०)
यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त स ☷ सदः. इन्द्र ☷ सुते हवामहे.. (११)
इंद्र सारी शोभाओं से शोभित हैं. यज्ञ में सात पुरोहित इंद्र को हवि देने के लिए अनेक
मंत्र पढ़ते हैं. हम सोमयज्ञ में उन इंद्र को आमंत्रित करते हैं. (११)
त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः.. (१२)
यज्ञ उत्साहवर्द्धक है. सभी देव यज्ञ के तीन दिनों में यज्ञ की बढ़ोतरी करते हैं. हमारी
स्तुति और वाणियां भी उस यज्ञ की बढ़ोतरी करें. (१२)
दूसरा खंड
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (१)
हे इंद्र! हम ने आप के लिए छान कर सोमरस तैयार किया है. यज्ञ की वेदी पर बिछे हुए
कुश के आसन पर उसे प्रतिष्ठित किया है. आप जल्दी ही उस के निकट पधारिए. उस
सोमरस को पीने की कृपा कीजिए. (१)
शाचिगो शचिपूजनाय ☷ रणाय ते सुतः. आखण्डल प्र हूयसे.. (२)
हे इंद्र! आप सामर्थ्यवान व प्रकाशमान किरणों वाले हैं. आप शक्तिमान, पूजनीय और
शत्रुओं का मानमर्दन करने वाले हैं. हम ने आप की तृप्ति के लिए यह सोमरस तैयार किया
है. आप पधारिए. इस सोमरस को ग्रहण कीजिए. (२)
यस्ते शृङ्गवृषो णपातप्रणपात्कुण्डपाय्यः. न्यस्मिन् दध्र आ मनः.. (३)
हे इंद्र! शृंगवृष ऋषि के पुत्र सूर्य को आप ने धुरी पर स्थापित किया है. कुंडपायी यज्ञ,
जिस में कुंडियों से सोमरस पिया जाता है, में मन लगाने की कृपा कीजिए. (३)
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आ तू न इन्द्र क्षमन्तं चित्रं ग्राभ २४ सं गृभाय. महाहस्ती दक्षिणेन.. (४)
हे इंद्र! आप बड़ेबड़े हाथों वाले हैं. आप दाएं हाथ में हमारे लिए यशस्वी, विलक्षण और
उपयुक्त धन धारण कीजिए. आप हमें उस धन को प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४)
विद्मा हि त्वा तुविकूर्मिं तुविदेष्णं तुवीमघम्. तुविमात्रमवोभिः.. (५)
हे इंद्र! आप बहुत शक्तिमान व बहुत देने योग्य संपत्ति वाले हैं. आप बहुत धनवान व
विशाल आकृति वाले हैं. हम जानते हैं कि आप के पास संरक्षण के बहुत सारे साधन हैं. (५)
न हि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सन्तम्. भीमं न गां वारयन्ते.. (६)
हे इंद्र! आप पराक्रमी हैं. आप दाता हैं. जैसे भारी भरकम भयंकर बैल को कोई नहीं
हटा सकता है, वैसे ही क्या देव, क्या मनुष्य कोई भी आप को नहीं डिगा सकता. (६)
अभि त्वा वृषभा सुते सुत २४ सृजामि पीतये. तृम्पा व्यश्नुही मदम्.. (७)
हे इंद्र! आप बलशाली हैं. हम आप के पीने के लिए अच्छी तरह छान कर सोमरस
तैयार करते हैं. आप उस मदमस्त बना देने वाले सोमरस को पी कर तृप्त होइए. (७)
मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. मा कीं ब्रह्मद्विषं वनः.. (८)
हे इंद्र! आप ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों की सेवा स्वीकार मत कीजिए. मूर्ख मनुष्य व
दूसरों की हंसी उड़ाने वालों पर अपनी कृपा मत कीजिए. ये लोग आप पर किसी तरह अपना
प्रभाव न जमा पाएं. (८)
इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (९)
हे इंद्र! यजमान आप से बहुत धन पाना चाहते हैं. वे गाय के दूध में मिले सोमरस से
आप को तृप्त करना चाहते हैं. हिरण जैसे तालाब में जल पीता है, वैसे ही आप इस यज्ञ में
(पधार कर) सोमरस पीजिए. (९)
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्. अनाभयिन्नरिमा ते.. (१०)
हे इंद्र! आप सर्वव्यापक हैं. आप पेट भर कर इस सोमरस को पीजिए. हम आप जैसे
निर्भय को सोमरस समर्पित करते हैं. (१०)
नृभिर्धौतः सुतो अश्वैरव्या वारैः परिपूतः. अश्वो न निक्तो नदीषु.. (११)
हे इंद्र! नदी के पानी में धो कर जैसे घोड़े को साफ करते हैं, वैसे ही पानी में पत्थरों से
कूट कर इस सोमरस को साफ किया है. पत्थरों से कूट कर इस का रस निचोड़ा है. भेड़ के
बालों की छलनी से छानछान कर इसे साफ किया है. (११)
तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः. इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे.. (१२)
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हे इंद्र! जौ से जिस प्रकार पुरोडाश (भोग) बनाया जाता है, उसी प्रकार सोम रस में
गाय का दूध मिला कर उसे हम ने तैयार किया है. वह सोमरस स्वादिष्ट है. हम उसी सोमरस
को पीने के लिए यज्ञ में आप को आमंत्रित करते हैं. (१२)
तीसरा खंड
इद ँ१ ह्यन्वोजसा सुत ँ१ राधानां पते. पिबा त्वा ३ स्य गिर्वणः.. (१)
हे इंद्र! आप धनपति, उपासना के योग्य व बलशाली हैं. आप नियमपूर्वक संस्कार किए
गए इस सोमरस को शीघ्र ग्रहण कीजिए. (१)
यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्. स त्वा ममत्तु सोम्य.. (२)
हे इंद्र! आप सोम के योग्य हैं. यह सोमरस आप के लिए तृप्तिदायी हो. यह सोमरस
अन्न स्वरूप है. आप इस सोमरस में सशरीर पधारिए. (२)
प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः. प्र बाहू शूर राधसा.. (३)
हे इंद्र! आप शक्तिमान हैं. विशुद्ध सोम प्रार्थनाओं से आप के सिर, दोनों भुजाओं व
कांखों तक पहुंचे. हम आप से धन चाहते हैं. (३)
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखाय स्तोमवाहसः.. (४)
हे यजमानो! आप इंद्र को प्रसन्न करने के लिए शीघ्र आइए, बैठिए. उन के लिए प्रार्थना
व उपासना कीजिए. (४)
पुरूतंमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्र ँ१ सोमे सचा सुते.. (५)
हे यजमानो! आप इकट्ठे होइए. इंद्र शत्रुओं को हराने की सामर्थ्य रखते हैं. वे ऐश्वर्य के
स्वामी हैं. आप सभी उन की उपासना कीजिए. (५)
स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या. गमद्वाजेभिरा स नः.. (६)
हे इंद्र! आप हमें वीर बनाइए और निखारिए. आप हमें समृद्धि प्रदान कीजिए. आप हमें
ज्ञान व पोषकता प्रदान कीजिए. आप हमारे समीप पधारने की कृपा कीजिए. (६)
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७)
हे यजमानो! हम पर बारबार कामों में अपनी रक्षा के लिए अपने मित्र इंद्र का आह्वान
करते हैं. (७)
अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्. यं ते पूर्वं पिता हुवे.. (८)
इंद्र स्वर्गवासी हैं. वे बहुत लोगों की मदद करते हैं. हमारे पिता (पूर्वजों) ने उन का
आह्वान किया था. हम भी उन का आह्वान करते हैं. (८)
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आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः. वाजेभिरुप नो हवम्.. (९)
हे यजमानो! हमें आशा है कि इंद्र हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होंगे. वे अपनी रक्षा और
वैभव के साथ हमारे पास अवश्य पधारेंगे. (९)
इन्द्र सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीष उक्थ्यम्. विदे वृधस्य रक्षस्य महाँ हि षः.. (१०)
हे इंद्र! आप के पुत्र आप के लिए सोमरस परिष्कृत करते हैं. आप महान हैं. आप उन
के यज्ञों तथा उन के स्तोत्रों की बढ़ोतरी करते हैं. (१०)
स प्रथमे व्योमनि देवाना २४ सदने वृधः. सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्.. (११)
हे यजमानो! इंद्र प्रथम देवता हैं. वे आकाश में देवताओं के आवास में निवास करते हैं.
वे भलीभांति हमारी रक्षा करते हैं. वे हमें यश प्रदान करते हैं. वे असुर विजेता हैं. हम उन का
आह्वान करते हैं. (११)
तमु हुवे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्. भवा नः सुम्ने अन्तम् सखा वृधे.. (१२)
हे इंद्र! हम अन्नप्राप्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. हम अपने भरणपोषण के
लिए आप का आह्वान करते हैं. हम सुमन (अच्छे मन वाले) व आप के सखा बनें. आप
हमारी बढ़ोतरी में हमारा सहयोग करने की कृपा कीजिए. (१२)
चौथा खंड
एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे.
प्रियं चेतिष्ठमरतिं २४ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्.. (१)
हे अग्नि! आप विश्व के दूत हैं. आप अमर, प्रिय व अक्षय हैं. हम अपने यज्ञ में आप का
आह्वान करते हैं. (१)
स योजते अरुषा विश्वमोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः.
सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देव २४ राधो जनानाम्.. (२)
अग्नि लोगों के लिए धन स्वरूप, विद्वान्, संयमशील व सब को जोड़ते हैं. आप समस्त
विश्व को ओज से पूर्ण करते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (२)
प्रत्यु अदर्श्यायत्यु ३ च्छन्ती दुहिता दिवः.
अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी.. (३)
उषा स्वर्गलोक की पुत्री व अंधकार को दूर करती हैं. वे अपनी किरणों से सभी को
प्रकाशित करती हैं. वे आंख की ज्योति हैं. वे अंधकार में ज्योति हैं. वे उत्तम नारी हैं. (३)
उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचा उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्.
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तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि.. (४)
सूर्य, नक्षत्र और ग्रह ये तीनों आकाश को प्रकाशमान करते हैं. सूर्य अपनी किरणों का
प्रसार करते हैं और प्रकाश से हम भक्तों तक पहुंचते हैं. (४)
इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना.
अयं वामह्ने ऽ वसे शचीवसू विशंविश 28 हि गच्छथ:.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! आप स्वर्गलोक के वासी हैं. स्वर्ग प्राप्त करने के इच्छुक लोग अपनी
इच्छापूर्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप स्तुति करने वालों के पास पहुंचते हैं. हम
आप का आह्वान करते हैं. (५)
युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदथा 28 सूनूतावते.
अर्वाग्रथ 28 समनसा नि यच्छतं पिबत 28 सोम्यं मधु.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! आप युवा नेता हैं और श्रेष्ठ आहार देने वाले व स्तुति करने वालों को
प्रेरित करते हैं. कृपया आप अपना रथ रोकिए. आप अपना मन लगा कर मधुर सोमरस का
पान कीजिए. (६)
पांचवां खंड
अस्य प्रत्नामनु द्युत 28 शुक्रं दुदुह्वे अहय:. पयः सहस्रामृषिम्.. (१)
सोमरस चमकीला, ज्ञान बढ़ाने वाला व मनोकामना पूरी करने वाला है. ऋषियों ने इस
के सहस्र स्वरूप का स्मरण कर के इसे तैयार किया है. (१)
अय 28 सूर्य इवोपद्गय 28 सरा 28 सि धावति. सप्त प्रवत आ दिवम्.. (२)
सोम सात धाराओं से उसी प्रकार दौड़ते हैं (प्रवाहित होते हैं), जिस तरह सूर्य स्वर्गलोक
से सात किरणों से धरती पर आने के लिए दौड़ते हैं. (२)
अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि. सोमो देवो न सूर्य:.. (३)
सोम सभी भुवनों के ऊपर प्रतिष्ठित हैं व समस्त संसार पर राज करते हैं. वे हमारे सूर्य
हैं. (३)
एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः. हरिः पवित्रे अर्षति.. (४)
सोमरस दिव्य है. देवता संस्कारपूर्वक उसे परिष्कृत करते हैं. वह हरा है और उसे पवित्र
छलनी में परिष्कृत किया जाता है. (४)
एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि. कविर्विप्रेण वावृधे.. (५)
सोम कवि और विद्वानों से प्रशंसा प्राप्त करते हैं. वे सभी देवताओं से ऊपर हैं. उन को
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संस्कारपूर्वक अनेक विधियों से परिष्कृत किया जाता है. (५)
दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यसे. क्रन्दं देवाँ अजीजनः.. (६)
सोमरस को छलनी से परिष्कृत किया जाता है और उसे बरतन (पात्र) में निचोड़ा जाता
है. सोम आवाज करते हुए पात्र में जाते हैं तो लगता है मानो वे देवताओं का आह्वान कर रहे
हों. (६)
उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रवे. पवमान विदा रयिम्.. (७)
हे सोम! आप अकल्याणकारियों को भयभीत कीजिए. आप हमारा मार्गदर्शन कीजिए.
आप हमें धनधान्य से परिपूर्ण करने की कृपा कीजिए. (७)
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषुः.. (८)
सोमरस को निचोड़ा जाता है. तत्पश्चात उस को परिष्कृत किया जाता है. फिर जल में
मिलाया जाता है. आप को गाय के दूध में मिलाया जाता है. देवता भी सोम को बुलाते हैं.
(८)
उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते... (९)
हे यजमानो! आप देवताओं के गुण गाने की अपेक्षा सोम के गुण गाइए. (९)
छठा खंड
प्र सोमासो विपश्चितो ऽ पो नयन्त ऊर्मयः. वनानि महिषा इव.. (१)
सागर की लहरें सागर में जैसे मिल जाती हैं, वैसे सोमरस जल में मिल जाता है. वन में
मिले भैंसों की तरह सोमरस जल में एकमेक हो जाता है. (१)
अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया. वाजं गोमन्तमक्षरन्.. (२)
सोमरस चमकीला है. वह अपनी ऋत की धारा से भूरा सोम गाय के दूध में झरता है.
वह शक्तिमान है. (२)
सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमा अर्षन्तु विष्णवे.. (३)
सोम इंद्र, वायु, मरुद्गणों व विष्णु को प्राप्त हों. (३)
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा.
अ ॐ शोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्रुतम्.. (४)
हे सोम! आप को पानी से भरीपूरी नदियों की तरह पानी में मिलाया जाता है. आप
मदिर (आनंददायी) व जाग्रत हैं. मधुरता चुआते हुए सोमरस (पात्र में) इकट्ठा होता है. (४)
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आ हर्यतो अर्जुनो अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः.
तमी ॐ हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः.. (५)
सोमरस को बच्चे की तरह साफसुथरा बना लिया है. प्रिय सोमरस को तेज गति से जल
में मिलाया जाता है. वह वैसे ही वेग से पानी में मिलता है, जैसे युद्ध में तेज गति से कोई रथ
जाता है. (५)
प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम्. सुता विदथे अक्रमूः.. (६)
सोमरस आनंद बरसाने वाला व यशदाता है. वह यज्ञ में निरंतर पहुंच कर इच्छाओं की
पूर्ति करता है. (६)
आदी ॐ ह ॐ सो यथा गणं विश्वस्यावीवशनमतिम्.
अत्यो न गोभिरज्यते.. (७)
सोमरस हंस की गति से जाता है. वह संसार के बुद्धिमानों की बुद्धि तक पहुंच रखता
है. (७)
आदीं त्रितस्य योषणे हरि ॐ हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (८)
सोमरस हरा है. इसे पत्थरों से कूट कर निचोड़ा जाता है. उस को तीन ऋषियों की
अंगुलियों से इंद्र के पीने के लिए निचोड़ा जाता है. (८)
अया पवस्व देवयू रेभन्पवित्रं पर्योषि विश्वतः. मधोर्धारा असृक्षत.. (९)
हे सोम! आप देवताओं से मिलने के इच्छुक हैं. आप पवित्र और अविरल मीठी धारा से
झरते हैं व आवाज करते हुए प्रवाहित होते हैं. (९)
पवते हर्यतो हरिरति ह्वरा ॐ सि र ॐ ह्या. अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः.. (१०)
सोमरस पवित्र और हरा है. वह पराक्रमी संतान और यश प्राप्ति के इच्छुक यजमानों के
लिए प्रवाहित होता है. (१०)
प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः.
अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः.. (११)
परिष्कृत किए जाते समय सोमरस आवाज करता है. दुष्ट लोग इस आवाज को न सुनें.
भृगुओं ने जैसे मख को दूर किया, उसी तरह पापी और कुत्तों को यज्ञ से दूर किया जाए.
(११)
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