सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय
ग्यारहवां अध्याय
पहला खंड
सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते. होतः पावक यक्षि च.. (१)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले हैं. आप यजमान के कल्याण हेतु देवताओं का
आह्वान करिए. देवताओं को हवि पहुंचाने के लिए हवि स्वीकार कीजिए. आप यज्ञ को
सफल बनाने की कृपा कीजिए. (१)
मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे. अद्या कृणुहूतये.. (२)
हे अग्नि! आप विद्वान् व ऊपर की ओर जाने वाले हैं. आप हमारे कल्याण के लिए
तनमन के निमित्त पोषक मधुरता से भरी हवियों को देवताओं के लिए स्वीकार कीजिए. उन
हवियों को स्वीकारने के बाद देवताओं तक पहुंचाने की कृपा भी कीजिए. (२)
नराश ॐ समिह प्रियमस्मिन्यज्ञ उप ह्वये. मधुजिह्व ॐ हविष्कृतम्.. (३)
हे अग्नि! आप देवताओं को प्रिय, उन के लिए प्रसन्नतादायी, मीठी जिह्वा वाले व
पूजनीय हैं. हम इस यज्ञ में अपनी हवियों को देवों तक पहुंचाने का अनुरोध करते हैं. (३)
अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईडित आ वह. असि होता मनुर्हितः.. (४)
हे अग्नि! आप देवताओं को साथ ले कर अपने सुखदायी रथ में यज्ञ स्थान तक
पधारिए. आप देवताओं को बुलाने वाले व मनुष्यों का हित साधने वाले हैं. (४)
यदद्य सूर उदिते ऽ नागा मित्रो अर्यमा. सुवाति सविता भगः.. (५)
सूर्य के उदित होने पर पवित्र मित्र, अर्यमा, सविता व भग हमें मनचाहा धन प्राप्त कराने
की कृपा करें. (५)
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः. ये नो अ ॐ हो ऽ तिपिप्रति.. (६)
हे देवताओ! आप उत्कृष्ट कल्याण करने वाले, हमारे श्रेष्ठ रक्षक व यज्ञ स्थान के वासी
हैं. आप अहम्, दंभ आदि राक्षसों (बुरी प्रवृत्तियों) से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. (६)
उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये. महो राजान ईशते.. (७)
देवताओं की माता अदिति समेत सभी देवतागण हमारे व्रत सिद्ध करें. वे इन्हें सिद्ध
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करने की सामर्थ्य रखते हैं. वे महान, राजा व ईश्वर हैं. (७)
उ त्वा मदन्तु सोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः. अव ब्रह्मद्विषो जहि.. (८)
हे इंद्र! आप सामर्थ्यवान हैं. सोमरस आप को मदमस्त बना दे. आप हमें वैभव प्रदान
करें. आप ब्रह्मज्ञान के द्वेषियों का नाश करें. (८)
पदा पणीनराधसो नि बाधस्व महाँ असि. न हि त्वा कश्च न प्रति.. (९)
हे इंद्र! आप महान व बहुत क्षमतावान हैं. आप किसी के भी प्रति कृपा में कमी नहीं
रखते हैं. आप दान न देने वालों को बाधा पहुंचाइए. (९)
त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्. त्व ४ राजा जनानाम्.. (१०)
हे इंद्र! आप सब लोगों के राजा हैं. आप पुत्रों के और अपुत्रों के भी स्वामी हैं. (१०)
दूसरा खंड
आ जागृविर्विप्र ऋतं मतीना ४ सोमः पुनानो असदच्चमूषु.
सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः.. (१)
सोम जाग्रत हैं, स्तुतियों को जानने वाले हैं. वे छनछन कर द्रोणकलश में झरते हैं.
धनवान अच्छे हाथों वाले संपत्ति पाने के इच्छुक पुरोहित इसे इकट्ठा कर के संभाल कर
रखते हैं. (१)
स पुनान उप सूरे दधान ओभे अप्रा रोदसी वी ष आवः.
प्रिया चिद्यस्य प्रियसास ऊती सतो धनं कारिणे न प्र य ४ सत्.. (२)
सोम पवित्र हैं, स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को अपनी आभा से पूर्ण करते हैं. इन की
रसधार बहुत प्रिय लगने वाली है. वह हमारी रक्षा और हमें वैभव प्रदान करती है. यह
सोमरस इंद्र के पास पहुंचता है. (२)
स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढ्वां अभि नो ज्योतिषावित्.
यत्र नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमिष्णन्.. (३)
सोम बढ़ोतरी पाने वाले, देवताओं की बढ़ोतरी करने वाले और अभीष्ट साधने वाले हैं.
छना हुआ सोमरस सब प्रकार से हमारी रक्षा करे. आत्म तत्त्व ज्ञाता हमारे पूर्व पितर अपनी
यज्ञीय गायों को सोम से भरे हुए पहाड़ों के पास ले जाया करते थे. (३)
मा चिदन्यद्वि श ४ सत सखायो मा रिषण्यत.
इन्द्रमित्स्तोता वृषण ४ सचा सुते मुहुरुक्था च श ४ सत.. (४)
हे मित्र यजमानो! इंद्र बलवान हैं. आप सोमरस परिष्कृत कर के इंद्र की ही स्तुति
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कीजिए, किसी दूसरे देवता की नहीं. आप बारबार और देवताओं की स्तुति में समय और
क्षमता नष्ट मत कीजिए. आप सामूहिक रूप से इंद्र की उपासना कीजिए. (४)
अवक्रक्षिणं वृषभं यथा जुवं गां न चर्षणीसहम्.
विद्वेषण २४ संवननमुभयङ्करं म १४ हिष्ठमुभयाविनम्.. (५)
इंद्र महान हैं. वे भौतिक और पारलौकिक दोनों वैभव देने वाले, यजमानों के आराध्य
देव, शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शत्रुओं के नाशक, शीघ्र जाने वाले और बैल की तरह
बलपूर्वक संघर्ष करने वाले हैं. आप उन्हीं इंद्र की स्तुति कीजिए. (५)
उदु त्ये मधुमत्तमा गिरः स्तोमास ईरते.
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (६)
हे इंद्र! आप वैभवदाता व निरंतर रक्षक हैं. मधुर वाणी वाली स्तुतियां घोड़े वाले रथ के
समान हैं, युद्ध में प्रिय लगने वाले अस्त्रशस्त्र (उपकरणों) के समान हैं. (६)
कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीतमाशत.
इन्द्र २४ स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमैधासो अस्वरन्.. (७)
कण्व ऋषि की तरह भृगुओं ने भी इंद्र का साक्षात्कार किया. वे सूर्य की तरह अखिल
विश्व में व्याप्त हैं. भृगु इंद्र की महिमा वैसे ही बखान करने लगे, जैसे यजमान (इंद्र की)
महिमा का बखान करते हैं. (७)
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः. द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे.. (८)
हे सोम! आप की कृपा से कर्जा खत्म हो जाता है. आप दुश्मनों के नाश के लिए उसी
प्रकार प्रेरित होने की कृपा कीजिए, जिस प्रकार पराक्रमी इंद्र वृत्रासुर का नाश करने के लिए
प्रेरित हुए थे. आप हमें अच्छे पोषक अन्न प्रदान करें. (८)
अजीजनो हि पवमान सूर्य विधारे शक्मना पयः.
गोजीरया र २४ हमाणः पुरन्ध्या.. (९)
हे सोम! आप पवित्र हैं. आप सूर्य को उत्पन्न करने की और सूर्य जल धारण करने की
सामर्थ्य रखते हैं. सूर्य पृथ्वीलोक में जीवन को गतिशील बनाने में समर्थ हैं. (९)
अनु हि त्वा सुत २४ सोम मदामसि महे समर्यरराज्ये.
वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे.. (१०)
हे सोम! हम आप के अनुगामी, आप के पुत्र और आप की कृपा से सुखपूर्वक निवास
करते हैं. हम आप की कृपा और क्षमता से ही कोई कार्य कर पाते हैं. (१०)
परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय.. (११)
हे सोम! आप स्वादिष्ट हैं. आप मित्र, पूषा, भग और धन्वेन्द्र (गोस्वामी इंद्र) के लिए
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प्रवाहित होइए. (११)
एवामृताय महे क्षयाय स शुक्रो अर्ष दिव्यः पीयूषः.. (१२)
हे सोम! आप चमकीले, दिव्य, अमृतमय और अमरता के लिए पृथ्वी पर क्षरित
(प्रवाहित) होने की कृपा कीजिए. (१२)
इन्द्रस्ते सोम सुतस्य पेयात्क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः.. (१३)
हे सोम! आप अपने पुत्रों की प्रार्थना सुन लीजिए. यज्ञ में इंद्र व सभी देवता आप के
रस को पीने की कृपा करें. (१३)
तीसरा खंड
सूर्यस्येव रश्मयो द्रावयित्नवो मत्सरासः प्रसुतः साकमीरते.
तन्तुं ततं परि सर्गास आशवो नेन्द्रादृते पवते धाम किंचन.. (१)
सोम की धाराएं द्रवित होती हुई पात्र में सूर्य की किरणों की तरह फैल रही हैं. इंद्र के
अलावा वे किसी अन्य को नहीं मिलतीं. (१)
उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरा सनि.
पवमानः सन्तनिः सुन्वतामिव मधुमान् द्रप्सः परि वारमर्षति.. (२)
सोम मधुर व बुद्धिवर्द्धक हैं. सोमरस इंद्र को प्रेरित करने वाला है. यजमान सोमरस
निचोड़ते व उसे जल में मिलाते हैं, उस को और परिष्कृत करते हैं. (२)
उक्षा मिमेति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुप यन्ति निष्कृतम्.
अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमतकं न निक्तं परि सोमो अव्यत.. (३)
निचोड़ा जाता हुआ सोमरस आवाज करता है व दिव्य रूप को प्राप्त करता है. गायों के
दूध से उस को शुद्ध बनाया जाता है. वह दिव्य, प्रकाशमान व अव्यय है. (३)
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्.
दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्.. (४)
हे नरो! अग्नि पूजनीय हैं. वे हमारा भरणपोषण करते हैं. वे गृहपति, अच्युत और दूर से
ही दर्शनीय हैं. आप सभी अरणि मंथन से अग्नि को प्रकट करने की कृपा कीजिए. (४)
तमग्निमस्ते वसवो नृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्.
दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः.. (५)
हे अग्नि! आप ज्वलनशील प्रकाशमान हैं. आप को हम घर में प्रज्वलित करते हैं. आप
सुंदर (दर्शनीय) स्वरूप वाले हैं. यजमान अपनी रक्षा के लिए आप को यज्ञ में प्रतिष्ठित करते
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हैं. (५)
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नो ऽ जस्रया सूर्म्या यविष्ठ.
त्वा ꣳ शश्वन्त उप यन्ति वाजाः.. (६)
हे अग्नि! आप शाश्वत, शक्तिशाली और अजस्र हैं. आप भलीभांति प्रज्वलित होइए.
आप ज्वालाओं से प्रज्वलित होने की कृपा कीजिए. हम आप को जौ मिश्रित हवि भेंट करते
हैं. (६)
आयंगौः पृश्निरक्रमीदसदनमातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (७)
हे अग्नि! आप बहुरंगी, गतिशील व (सूर्य रूप में) पूर्व दिशा में उदित होते हैं. आप
पितृलोक (अंतरिक्षलोक) में प्रतिष्ठित होते हैं. (७)
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (८)
हे सूर्य! आप स्वर्गलोक को प्रकाश और तेज से भर देते हैं. आप का तेज आकाश और
पृथ्वी के बीच चमकता रहता है. (८)
त्रि ꣳ शद्धाम वि राजति वाक्यपतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (९)
तीस घड़ियों (१२ घंटे) तक अग्नि (सूर्य रूप में) अपनी तेजोमयता से प्रकाशमान रहते
हैं. उस समय स्वर्गलोक द्वारा आप को यजमानों की बुद्धिपूर्वक की गई स्तुतियां प्राप्त होती
हैं. (९)
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