सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
चौदहवां अध्याय
चौदहवां अध्याय
पहला खंड
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनु ॐ सत्यस्य सत्पतिम्.. (१)
हे यजमानो! इंद्र सत्यपति, सत्य के स्वामी, गोपति व पर्वतपति हैं. वे यथाशक्ति
आराधकों का संरक्षण करते हैं. आप इंद्र की अर्चना कीजिए. (१)
आ हरयः ससृजिरे ऽ रुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि संनवामहे.. (२)
इंद्र के घोड़े उन को घास के उन आसनों पर प्रतिष्ठापित करें, जिन पर हम यज्ञ में उन्हें
स्थापित कर के उन की उपासना करते हैं. (२)
इन्द्राय गाव आशिरं दुदुहे वज्रिणे मधु. यत्सीमुपह्वरे विदत्.. (३)
पास ही यज्ञ में जब इंद्र मधुर सोमरस का पान करते हैं, उस समय वज्रपाणि इंद्र के
लिए गाएं मीठा दूध देती हैं. (३)
आ नो विश्वास्वे हव्यमिन्द्र ॐ समत्सु भूषत.
उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन् परमज्या ऋचीषम.. (४)
हे इंद्र! हमारे यज्ञ आप की शोभा बढ़ाते हैं. आप के लिए गाई गई हमारी प्रार्थनाएं आप
की शोभा बढ़ाती हैं. हम युद्धों में अपनी सहायता के लिए आप को याद करते हैं. आप
वृत्रनाशक हैं. आप हमें मनपसंद धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४)
त्वं दाता प्रथमो राधसामस्यसि सत्य ईशानकृत्.
तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महः.. (५)
हे इंद्र! आप पहले दाता हैं. आप धनदाता और सत्य के स्वामी हैं. हम आप की
प्रकाशशीलता से जुड़ने एवं आप से बलवान और उत्तम संतान की कामना करते हैं. (५)
प्रत्नं पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत.
इन्द्रमभि जायमान ॐ समस्वरन्.. (६)
अमृत तुल्य सोमरस अपूर्व और सर्वश्रेष्ठ है. यह स्वर्गलोक से प्रकट हुआ. इंद्र के सामने
यजमान मंत्र गागा कर सोम की स्तुति करते हैं. (६)
आदीं के चित्पश्यमानास आप्यं वसुरुचो दिव्या अभ्यनूषत.
दिवो न वार ॐ सविता व्यूर्णते.. (७)
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तत्पश्चात वसुरुच देवगण सोम का दर्शन करते हैं. अंधेरे को दूर करने वाले सूर्य के उगने
से पहले पूजनीय सोम की स्तुति की जाती है. यह स्तुति ऐसे की जाती है, जैसे आदरणीय
भाई की की जाती है. (७)
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्पना.
यूथे न निष्ठा वृषभो वि राजसि.. (८)
हे सोम! आप परिष्कृत व पवित्र हैं. गायों के झुंड में बैल के समान आप स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक के बीच सुशोभित होते हैं. (८)
इममू षु त्वमस्माक ॐ सनिं गायत्रं नव्या ॐ सम्. अग्ने देवेषु प्र वोचः.. (९)
हे अग्नि! हमारे साम मंत्र गायक (पुरोहित) भलीभांति और भाव भरे साम मंत्र गाते हैं.
आप हमारी उन प्रार्थनाओं को निर्धारित देवताओं के पास पहुंचाने की कृपा कीजिए. (९)
विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ. सद्यो दाशुषे क्षरसि.. (१०)
हे अग्नि! आप समुद्र की लहरों की तरह हवि देने वाले को उत्तम फल देते हैं. आप
धनदाता और लपटों से सुशोभित हैं. (१०)
आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु. शिक्षा वस्वो अन्तमस्य.. (११)
आप हमें ज्येष्ठ, मध्यम, कनिष्ठ आदि सभी प्रकार की धनसंपत्ति व शिक्षा धन दीजिए.
हम आप को आमंत्रित करते हुए भजते हैं. (११)
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रह. अह ॐ सूर्य इवाजनि.. (१२)
हे इंद्र! हम जब पिता जैसे आप की श्रेष्ठ बुद्धि पाते हैं, तो हमें ऐसा लगता है मानो हम
सूर्य जैसे हो गए हों. (१२)
अहं प्रत्नेन जन्मना गिरः शुम्भामि कण्ववत्. येनेन्द्रः शुष्ममिद्दधे.. (१३)
हम कण्व ऋषि की भांति प्रयत्नपूर्वक रचे गए पुरातन वेदवाणी से मंत्रपाठ कर के इंद्र
की छवि बढ़ाते हैं. उन्हीं के प्रभाव से वे हम पर कृपालु होते हैं. (१३)
ये त्वामिन्द्र न तुष्टुवुऋषयो ये च तुष्टुवुः. ममेदद्धर्ध्वस्व सुष्टुतः.. (१४)
हे इंद्र! आप को प्रसन्न करने वाले और संतुष्ट ऋषियों में हमारी प्रार्थनाओं की प्रशंसा
होती है. उन के प्रभाव से आप संतुष्ट होइए, बढ़ोतरी पाइए. (१४)
दूसरा खंड
अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्जोषि ब्रह्म सहस्कृत.
ये देवत्रा य आयुषु तेभिर्नो महया गिरः.. (१)
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हे अग्नि! आप सभी अग्नियों के साथ हमारी प्रार्थनाओं को सुनिए व प्रार्थनाओं की
महिमा बढ़ाइए. जो अग्नि स्वरूप हैं, जो मनुष्यों में हैं उन सब से हमारा अनुरोध है. (१)
प्र स विश्वेभिरग्निभिरग्निः स यस्य वाजिनः.
तनये तोके अस्मदा सम्यङ्वाजैः परीवृतः.. (२)
यज्ञ की अग्नि शक्तिशाली है. उस में सभी हवि भेंट करते हैं. वे अग्नि अन्य सभी
अग्नियों सहित शक्ति से घिर कर हमारे कल्याण हेतु पधारने व हमारे सज्जनों (पुत्रों) का भी
कल्याण करने की कृपा करें. (२)
त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं च वर्धय.
त्वं नो देवतातये रायो दानाय चोदय.. (३)
हे अग्नि! आप अन्य देवताओं को हमें धनदान करने के लिए प्रेरित करने की कृपा
कीजिए. आप अन्य अग्नियों सहित हमारे आत्म ज्ञान व यज्ञ की भी बढ़ोतरी करने की कृपा
कीजिए. (३)
त्वे सोम प्रथमा वृत्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः.
स त्वं नो वीर वीर्याय चोदय.. (४)
हे सोम! प्रमुख यजमान अन्न बल के बारे में आप के लिए श्रेष्ठ बुद्धि धारण करते हैं.
आप हम वीरों को (और अधिक) वीरता के लिए प्रोत्साहित करने की कृपा कीजिए. (४)
अभ्यभि हि श्रवसा ततर्दिथोत्सं न कं चिज्जनपानमक्षितम्.
शर्याभिर्न भरमाणो गभस्त्योः.. (५)
हे सोम! आप का रस छनछन कर छलनी से टपकता हुआ द्रोणकलश को उसी तरह
लबालब भर देता है, पीने वाले जल को चुल्लू से डालडाल कर जैसे पानी के हौज को पूरा
भर देते हैं. (५)
अजीजनो अमृत मर्त्याय कमृतत्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः.
सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत्.. (६)
हे सोम! आप अमृतमय हैं. आप मनुष्यों के लिए सत्य और मंगलकारी तत्त्व धारण
करते हैं. आप ने सूर्य को प्रकट किया, देवगण की सेवा की और सदैव यजमानों को अन्न, धन
देने हेतु लालायित रहते हैं. (६)
एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु. प्र राधा ᳵ सि चोदयते महित्वना.. (७)
हे यजमानो! आप इंद्र को सोमरस से सींचिए. वे मधुर सोम रस को पीते हैं. वे अपने
महत्त्व से धनों को आप लोगों (के पास आने) के लिए प्रेरित करते हैं. (७)
उपो हरीणां पतिं राधः पृञ्चन्तमब्रवम्. नून ᳵ श्रुधि स्तुवतो अश्व्यस्य.. (८)
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हे इंद्र! आप अश्वपति व धनपति हैं. हम आप के लिए प्रार्थनाएं बोलते हैं. आप स्तुति
करते हुए अश्व्य ऋषि की स्तुति अवश्य ही सुनने की कृपा कीजिए. (८)
न ह्यं ३ ग पुरा च न जज्ञे वीरतरस्त्वत्. न की राया नैवथा न भन्दना.. (९)
हे इंद्र! आप से वीरतर कोई देव व धनदाता पहले नहीं हुआ है. आप से पहले न ही
कोई आप जैसा उपासना योग्य देव हुआ है. (९)
नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम्. पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि.. (१०)
हे यजमानो! इंद्र युवती उषा को उपजाने वाले हैं, चंद्र किरणों को उत्पन्न करने वाले
और गोपालक हैं. वे गाय के दूध को पोषक अन्न के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं.
इंद्र सब कुछ करने में समर्थ हैं. (१०)
तीसरा खंड
देवो वो द्रविणोदा:. पूर्णां विवष्ट्वासिचम्.
उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्धो देव ओहते.. (१)
हे यजमानो! धनदाता अग्नि को घी और सोमरस से सींचिए. उन्हें पूरी हवि दीजिए. वे
आप का पालनपोषण करने वाले हैं. (१)
त ऴ् होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत.
दधाति रत्नं विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे.. (२)
देवताओं ने श्रेष्ठ बुद्धिमान अग्नि को अपना होता बनाया है. वे हवि से हवन करते हैं,
यजमान के लिए रत्न धारते हैं, अच्छी संतान देते हैं, दानदाता यजमान को शक्ति प्रदान करते
हैं. (२)
अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधु:.
उपो षु जातमार्थस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिर:.. (३)
अग्नि में यजमान व्रत धारण करते हैं. अग्नि श्रेष्ठ पथप्रदर्शक हैं. वे श्रेष्ठ पथ दिखाते हैं.
अग्नि आर्यों की बढ़ोतरी चाहते हैं. अग्नि को हमारी वाणी प्राप्त हो. (३)
यस्माद्रेजन्त कृष्टयश्चर्कृत्यानि कृण्वत:.
सहस्रसां मेधसाताविव त्मनाग्निं धीभिर्नमस्यत.. (४)
हे यजमानो! आप बुद्धिपूर्वक अग्नि को नमन कीजिए. आप हजारों बुद्धिपूर्वक कार्यों
से उन की उपासना कीजिए, जिस से अग्नि कर्तव्यपरायण यजमानों के लिए शत्रुपक्ष को
बहुत पीड़ित कर सकें. (४)
प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मज्पना.
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अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि.. (५)
अग्नि उत्कृष्ट स्वर्गलोक में निवास करते हैं. वे इंद्र जैसी सामर्थ्य वाले हैं. वे पृथ्वी माता
पर श्रेष्ठ यज्ञ कार्य पूर्ण कराते हैं. वे स्वर्गिक सुख प्रदान करते हैं. (५)
अग्न आयू षि पवस आ सुवोर्जमिषं च न:. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (६)
हे अग्नि! आप हमें दीर्घायु बनाइए. आप हमें श्रेष्ठ अन्न, बल दीजिए. आप दुष्टों को
बाधित कीजिए. (६)
अग्निर्र्ऋषि पवमान: पाञ्चजन्य: पुरोहित:. तमीमहे महागयम्.. (७)
अग्नि ऋषि हैं. वे पवित्र, पुरोहित, पंच व सर्वद्रष्टा हैं. हम उन के गुण गाते हैं. (७)
अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्च: सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्.. (८)
हे अग्नि! आप पोषक अन्न व धन धारण करिए. आप हमें शक्ति व श्रेष्ठ संतान दीजिए
और पवित्र बनाइए. (८)
अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया. आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (९)
हे अग्नि! आप पवित्र एवं देवताओं को खुश रखने वाले हैं. आप अपनी जिह्वाओं
(लपटों) से देवताओं को बुलाइए और देवताओं के लिए यज्ञ कराइए. (९)
तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वर्द्दशम्. देवाँ आ वीतये वह.. (१०)
हे अग्नि! आप सर्वद्रष्टा हैं. हम आप को घी से सींचते हैं. आप अद्भुत हैं. हम आप से
देवताओं का आह्वान करने के लिए निवेदन करते हैं. (१०)
वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्त समिधीमहि. अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (११)
हे अग्नि! आप बुद्धिमान, यज्ञप्रेमी हैं और द्युतिमान हैं. हम विशाल यज्ञ में आप को
समिधाओं से प्रज्वलित करते हैं. (११)
चौथा खंड
अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि. विश्वासु धीषु वन्द्य.. (१)
हे अग्नि! आप की सभी यज्ञों में बुद्धिपूर्वक वंदना की जाती है. आप गायत्री छंद में
स्तुति गाने पर प्रसन्न होते हैं. आप अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए.
(१)
आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यम्. विश्वासु पृत्सु दुष्टरम्.. (२)
हे अग्नि! आप भरपूर धन दीजिए. आप शत्रुनाशक श्रेष्ठ सामर्थ्य दीजिए. आप सभी
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दुष्टों को दूर कीजिए. आप सभी वैभव हमें प्रदान कीजिए. (२)
आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम्. मार्डीकं धेहि जीवसे.. (३)
हे अग्नि! आप सुचेतना संपन्न, संपूर्ण पोषण (आयु पर्यंत) दाता व सुखदाता हैं. आप
हमें पूरे जीवन के लिए धन दीजिए. (३)
अग्नि 𑗒 हिन्वन्तु नो धियः सप्तिमाशुमिवाजिषु. तेन जेष्म धनंधनम्.. (४)
हे अग्नि! हमारी बुद्धियां आप को प्रेरित करें. युद्ध में घोड़े को प्रेरित करने की भांति हम
आप को प्रेरित करते हैं, जिस से हम जीवन संग्राम में सारे वैभव जीत सकें. (४)
यया गा आक्रामहै सेनायाग्ने तवोत्या. तां नो हिन्व मघत्तये.. (५)
हे अग्नि! संरक्षण शक्ति से हमें रक्षित कीजिए. दिव्य ज्ञान हेतु हम आप को आमंत्रित
करते हैं. आप हमें उत्तम कोटि का धन प्रदान कीजिए. (५)
आग्ने स्थूर 𑗒 रयिं भर पृथुं गोमन्तमश्विनम्. अङ्घि खं वर्तया पविम्.. (६)
हे अग्नि! आप हमें गोवान व अश्ववान बनाइए. आप हमें प्रचुर धन दीजिए. आकाश
आप के तेज से पवित्र हैं. आप दुर्गुणों को दूर भगाइए. (६)
अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्यं 𑗒 रोहयो दिवि. दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः.. (७)
हे अग्नि! आप लोगों के लिए ज्योति धारण कीजिए. आप स्वर्गलोक में सूर्य को
स्थापित कीजिए. जर्जर न होने वाले सूर्य सर्वत्र प्रकाशदाता हैं. (७)
अग्ने केतुर्विशामसि प्रेष्ठः श्रेष्ठ उपस्थसत्. बोधा स्तोत्रे वया दधत्.. (८)
हे अग्नि! आप प्रिय, सर्वोत्तम व ज्ञानदाता हैं. आप हमारे स्तोत्र जगाइए. आप हमारे
लिए आयु धारण करिए. (८)
अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्. अपा 𑗒 रेता 𑗒 सि जिन्वति.. (९)
हे अग्नि! आप मूर्धन्य, स्वर्गलोकवासी व पृथ्वी के पालनहार हैं. आप जलों को अपने में
समाहित किए रहते हैं. (९)
ईशिषे वार्यस्य हि दात्रस्याग्ने स्वः पतिः. स्तोता स्यां तव शर्मणि.. (१०)
हे अग्नि! आप वरणीय हैं. आप स्वर्ग के ईश्वर हैं. आप दाता व अधिष्ठाता हैं. हम आप
के सुख भोगें, सदैव आप के पूजक बने रहें. (१०)
उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते. तव ज्योती 𑗒 ष्यर्चयः.. (११)
हे अग्नि! हम ज्योतिपूर्वक आप की अर्चना करते हैं. हम आप को पवित्र, चमकदार
प्रकाशित ज्योति से भजते हैं. (११)
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